जानिए क्यों पीएम मोदी ने कहा छोटा परिवार रखना भी ‘देशभक्ति’

पीएम मोदी ने कहा जो छोटे परिवार की अहमियत समझ रहे हैं और लोगों को समझा रहे हैं, उन्हें सम्मानित करने की जरूरत है । छोटा परिवार रखने वाले भी देशभक्त की तरह हैं । पीएम मोदी ने कहा कि किसी भी बच्चे के आने से पहले ये सोचें कि क्या हम उसके लिए तैयार हैं । बच्चे की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार हैं ।

नई दिल्ली: स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से जनता को संबोधित करते हुए देश में मौजूद समस्याओं में से एक बढ़ती जनसंख्या की समस्या पर भी चिंता जाहिर की । उन्होंने कहा कि तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर हमें आने वाली पीढ़ी को सोचना होगा। सीमित परिवार से न सिर्फ हम खुद का बल्कि देश का भी भला करेंगे ।

किसी भी बच्चे के आने से पहले ये सोचें कि क्या हम उसके लिए तैयार हैं

पीएम मोदी ने कहा जो छोटे परिवार की अहमियत समझ रहे हैं और लोगों को समझा रहे हैं, उन्हें सम्मानित करने की जरूरत है । छोटा परिवार रखने वाले भी देशभक्त की तरह हैं । पीएम मोदी ने कहा कि किसी भी बच्चे के आने से पहले ये सोचें कि क्या हम उसके लिए तैयार हैं । बच्चे की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार हैं ।

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भारत में बढ़ती जनसंख्या एक बड़ी समस्या है । देश के विकास की राह में ये सबसे बड़ी रुकावट है छोटा परिवार रखना भी देशभक्ति जिस तेजी से हमारे देश की जनसंख्या बढ़ी है, उतनी तेजी से संसाधनों का विकास नहीं हुआ है।

आजादी के बाद देश में सबसे पहली जनसंख्या जनगणना 1951 में हुई थी। 1951 में हुई जनसंख्या में जम्मू कश्मीर की आबादी शामिल नहीं की गई थी।  1951 में देश की आबादी 36 करोड़ थी। उस वक्त सिर्फ 18 फीसदी लोग साक्षर थे।

1951 की जनगणना के मुताबिक भारत-पाकिस्तान बंटवारे की वजह से भारत के 72 लाख 26 हजार मुस्लिम हिंदुस्तान छोड़कर पाकिस्तान चले गए जबकि 72 लाख 49 हजार हिंदू और सिख पाकिस्तान छोड़कर हिंदुस्तान चले आए।

आजादी के बाद तेजी से बढ़ी जनसंख्या

1961 में हुई जनगणना में देश की आबादी बढ़कर 43 करोड़ 92 लाख हो गई।  इसके बाद देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ी। 1971 मे देश की जनसंख्या बढ़कर 54 करोड़ 81 लाख हो गई। इसके बाद अगली जनगणना 1981 में हुई।

 1981 में देश की आबादी 68 करोड़ 33 लाख थी

1991 में हुई जनगणना में ये आंकड़ा बढ़कर 84 करोड़ 64 लाख हो गया। 2001 में हुई जनगणना में देश की आबादी 100 करोड़ के पार कर गई. 2001 में देश की आबादी थी 102 करोड़। इसके बाद 2011 में जनगणना हुई देश की आबादी बढ़कर 121 करोड़ हो गई. एक अनुमान के मुताबित फिलहाल देश की आबादी 133 करोड़ के करीब है।

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जनसंख्या वृद्धि की यही रफ्तार जारी रहती है तो हम अगले दो साल में चीन को भी पछाड़ देंगे। पिछले वर्षों में चीन ने अपनी जनसंख्या नियंत्रित की है और ये करीब 140 करोड़ के आसपास बनी हुई है।

अर्थव्यवस्था के लिहाज से क्यों चिंताजनक है बढ़ती आबादी

एक आंकड़े के मुताबिक भारत की आबादी हर साल करीब 1.8 परसेंट के हिसाब से बढ़ रही है।  बढ़ती आबादी के हिसाब से प्रति व्यक्ति आय बनाए रखने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है। बढ़ती जनसंख्या का विपरित प्रभाव देश की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ता है। ऊंचा जन्म दर और कम औसत उम्र कुल आबादी पर निर्भरता का बोझ बढ़ा देता है. जिसका अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

एक आंकड़े के मुताबिक भारत की 35 फीसदी आबादी 14 साल से कम उम्र की है. ये पूरी आबादी दूसरों पर निर्भर है।  देश की अर्थव्यवस्था में इनका कोई योगदान नहीं है। आर्थिक नजरिए से इन्हें अनप्रोडक्टिव कंज्यूमर्स कहा जाता है। इनकी वजह से अर्थव्यवस्था की गति प्रभावित होती है।

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बढ़ती आबादी का असर प्रति व्यक्ति आय पर पड़ता है

1950-51 और 1980-81 में भारत की आबादी 3.6 परसेंट के हिसाब से बढ़ रही थी। जबकि उस वक्त प्रति व्यक्ति आय में सालाना सिर्फ 1 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज हो रही थी आर्थिक नजरिए से भारत की आबादी 2.5 फीसदी की दर से ज्यादा बढ़ रही थी।

बढ़ती आबादी की वजह से खाद्यान्न का संकट पैदा होता है । खाद्यान्न की कमी का सीधा असर लोगों की प्रोडक्टिविटी पर पड़ता है। बढ़ती आबादी बेरोजगारी का संकट पैदा करती है। इतनी बड़ी आबादी के लिए रोजगार पैदा करना आसान नहीं है।

भारत में बढ़ती आबादी की वजह से लोगों के रहने सहने की क्षमता प्रभावित होती है. बढ़ती आबादी लो स्टैंडर्ड का जीवन जीने को मजबूर करती है।

भारत की बढ़ती आबादी की वजह से गरीबी बढ़ी है। देश के ऊपर बेरोजगारी का बोझ बढ़ा है. इससे सामाजिक समस्याएं बढ़ी हैं. जमीन पर बोझ बढ़ा है।