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हाल-ए-बंगाल: राजनीतिक हथियार बना एनआरसी

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raghvendraBy raghvendra

Published on 4 Oct 2019 8:07 AM GMT

हाल-ए-बंगाल: राजनीतिक हथियार बना एनआरसी
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कोलकाता: पश्चिम बंगाल में नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस (एनआरसी) की कार्रवाई शुरू होने से पहले ही इसकी दहशत फैल चुकी है। टीएमसी का आरोप है कि विदेशी घुसपैठिया घोषित होने के डर से राज्य के विभिन्न हिस्सों में कम से कम एक दर्जन लोगों ने आत्महत्या कर ली है। मुख्यमंत्री और टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी इस परिस्थिति के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराते हुए बार-बार कह चुकी हैं कि उनकी सरकार बंगाल में एनआरसी लागू नहीं होने देगी। लेकिन लोगों को उनकी बातों पर भरोसा नहीं हो रहा है। यही वजह है कि जमीन, मकान और जन्म व मृत्यु प्रमाणपत्र जैसे जरूरी दस्तावेजों के लिए सरकारी दफ्तरों के बाहर लंबी-लंबी कतारें लगने लगी हैं। खासकर बांग्लादेश से लगे सीमावर्ती इलाकों में तो हालात बेहद गंभीर है।

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पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से शरणार्थियों के आने का सिलसिला देश की आजादी जितना ही पुराना है। वहां से लाखों की तादाद में आने वाले लोगों को राज्य सरकारों ने सीमावर्ती इलाकों में बसाया है और तमाम राजनीतिक दल उनका इस्तेमाल वोट बैंक के तौर पर करते रहे हैं। एनआरसी के मुद्दे पर राज्य में टीएमसी और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार तेज हो रहा है। आलम यह है कि राज्य सरकार को रेडियो, टीवी और अखबारों पर विज्ञापन जारी कर अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील करनी पड़ रही है।

असम में जारी एनआरसी की अंतिम सूची से 19 लाख से ज्यादा लोगों के नाम बाहर रहने के बाद से ही बंगाल के खासकर मुलसमानों में भारी आतंक है। हाल के दिनों में कई मुस्लिम संगठनों ने मुस्लिम बहुल इलाकों में सेमिनारों का आयोजन कर और पर्चे बंटवा कर लोगों से अपने नागरिकता संबंधी दस्तावेज दुरुस्त करने की अपील की है। उसके साथ ही भाजपा के तमाम नेता भी बार-बार बंगाल में एनआरसी लागू होने की बात दोहराते रहे हैं। इससे आम लोगों में अफरा-तफरी मची है। लोग जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल करने और कागजात में हुई गड़बडिय़ों को दुरुस्त करने के लिए सुबह से ही सरकारी दफ्तरों में पहुंच रहे हैं। कोलकाता के अलावा असम और बांग्लादेश की सीमा से लगे दूसरे इलाकों में भी यही स्थिति है।

राजनीतिक समीकरण

2011 में हुई जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 2 करोड़ 46 लाख यानी लगभग 27 प्रतिशत मुसलमान हैं। राज्य के तीन जिलों, मुर्शिदाबाद, मालदह और उत्तर दिनाजपुर में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। इसके अलावा दक्षिण दिनाजपुर, बीरभूम, बद्र्धमान, नदिया, उत्तर चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना, हावड़ा और कोलकाता में मुसलमानों की तादाद 20 से 40 प्रतिशत है। कुल मिला कर राज्य विधानसभा की कुल 294 सीटों में से लगभग 80-90 सीटें ऐसी हैं, जहां मुसलमान चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। लगभग 40-45 सीटों पर मुसलमानों का बहुमत है।

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कम्युनिस्टों की भूमिका

माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ने पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से आए लोगों को नई जगहों पर टिकाने, घर वगैरह बनाने में मदद की है। इस पार्टी के स्थानीय काडर ने जन्म सर्टिफिकेट, राशन कार्ड वगैरह हाथों हाथ बनवाने का काम भी किया और इस बल पर उन इलाकों में बेहद लोकप्रिय भी हुई। समझा जा सकता है कि जो मुसलमान बांग्लादेश से आए हैं, उनमें से ज़्यादातर के पास ये कागजात होंगे।

दोनों ओर बांग्ला

मौजूदा बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल पहले एक ही थे। अंग्रेजों ने पहली बार 1905 में उन्हें अलग किया, जिसके खिलाफ इतना जबरदस्त आंदोलन चला कि सरकार को अपना फैसला 1911 में वापस लेना पड़ा। भारत विभाजन के समय मुस्लिम बहुल होने कारण वह इलाका पाकिस्तान को मिला जो बाद में बांग्लादेश बन गया। इसे इससे भी समझा जा सकता है कि बांग्ला भाषा की मांग करने वालों पर 21 फरवरी, 1952, को ढाका विश्वविद्यालय में हुई गोलीबारी पाकिस्तान विरोधी आंदोलन की नींव बन गई थी।

टीएमसी और भाजपा में ठनी

एनआरसी पर फैले आतंक के लिए टीएमसी और भाजपा एक-दूसरे को दोषी ठहराने में जुटे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती हैं, ‘मेरी सरकार किसी भी हालत में बंगाल में एनआरसी लागू नहीं करने देगी। अगर भाजपा एनआरसी को लेकर इतनी उतावली है तो वह त्रिपुरा में यह कवायद क्यों नहीं करती? वहां लागू होने की स्थिति में मुख्यमंत्री बिप्लब भी सूची से बाहर हो जाएंगे।’ टीएमसी अध्यक्ष कहती हैं कि असम में असम समझौते के प्रावधानों की वजह से ही एनआरसी लागू किया गया। बंगाल या देश के दूसरे हिस्सों में एनआरसी लागू करने की कोई वजह नहीं हैं। ममता ने कोलकाता में एनआरसी के खिलाफ आयोजित एक रैली का भी नेतृत्व किया था।

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दूसरी ओर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, ‘बंगाल में पहले नागरिकता (संशोधन) विधेयक लागू किया जाएगा और उसके बाद ही एनआरसी की कवायद शुरू होगी। उक्त विधेयक के जरिए तमाम हिंदुओं को भारतीय नागरिकता दी जाएगी। यहां से एक भी हिंदू को बाहर नहीं निकाला जाएगा।’ भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा है कि लोगों में फैले आतंक को दूर कर नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर आम राय बनाने के लिए संगठन के कार्यकर्ता घर-घर जाकर अभियान चलाएंगे। आम जनता को बताया जाएगा कि अवैध बांग्लादेशी मुसलमान घुसपैठियों को निकालने के लिये एनआरसी जरूरी है।

पुरानी है घुसपैठ की समस्या

पश्चिम बंगाल में घुसपैठ की समस्या असम से भी ज्यादा पुरानी और गंभीर है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के लोगों की बोली, रहन-सहन और रीति-रिवाजों में समानता की वजह से सीमा पार से आने वाले लोगों की पहचान मुश्किल है। 1947 के विभाजन के समय सीमा पार से शरणार्थियों के आने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह आज भी जस का तस है। इससे राज्य की आबादी का ग्राफ, सामाजिक तानाबाना और आर्थिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। वर्ष 1947 से 1971 के बीच बंगाल में सीमा पार से आने वाले सत्तर लाख शरणार्थियों ने राज्य की आबादी का ग्राफ तो बदला ही, भावी राजनीति की दशा-दिशा भी तय कर दी। 1971 के बाद भी शरणार्थियों के आने का सिलसिला जस का तस है. तमाम राजनीतिक दल उनका इस्तेमाल अपने वोट बैंक की तरह करते रहे हैं। बड़े पैमाने पर होने वाली इस घुसपैठ ने इस राज्य की अर्थव्यवस्था और राजनीति के ढांचे व स्वरूप को इस कदर बिगाड़ दिया कि यह अब तक सही रास्ते पर नहीं लौट सकी है।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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