बिहार चुनावः तलाशे जा रहे मुद्दे, चर्चा में रहेंगे मोदी-सुशांत और….

बिहार में भाजपा और जदयू फिर मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं। एनडीए इस बार नीतीश कुमार की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश में है।

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बिहार चुनाव का मुद्दा (Photo Social media)

नीलमणि लाल

पटना। बिहार में भाजपा और जदयू फिर मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं। एनडीए इस बार नीतीश कुमार की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश में है। वहीं राजद लालू यादव की पारंपरिक रणनीति के साए से निकलने की जद्दोजहद में है और उन मुद्दों को उठाने की कोशिश कर रहा है जो नीतीश सरकार के लिए एंटी इन्कम्बैंसी फैक्टर बनते हैं। सत्तारूढ़ जदलयू दलित कार्ड को उभारने की कोशिश कर रहा है तो भाजपा एक्टर सुशांत सिंह राजपूत व कंगना रानौत प्रकरण को भुनाने की फिराक में है।

नीतीश की बजाए मोदी

बताया जाता है कि भाजपा ने राज्य सरकार के कामकाज को लेकर पार्टी के ही लोगों द्वारा मंडल स्तर पर एक आंतरिक सर्वे कराया जिसकेके अनुसार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विश्वसनीयता लोगों के बीच घटी है। एनडीए के वोटरों को लग रहा है कि नीतीश कुमार कहीं न कहीं लालू प्रसाद के साथ हमदर्दी रखते हैं। ऐसा मानने की वजह भी है। नीतीश कभी भी लालू के खिलाफ उस अंदाज में हमलावर नहीं होते जिस तेवर में भाजपा के नेता लालू पर निशाना साधते हैं।

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रिपोर्ट के मुताबिक पंद्रह साल से शासन कर रहे नीतीश के कामकाज के प्रति भी लोगों में नाराजगी है। भाजपा के लिए यह चिंता की बात है और शायद इसी वजह से पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को भुनाने का निश्चय किया है। करीब सोलह हजार करोड़ रुपये से अधिक की योजनाओं के जरिए एनडीए बिहार विधानसभा चुनाव की राह आसान करने की कवायद में जुट गया है। मोदी केंद्रीय योजनाओं के लाभार्थियों से सीधा संवाद भी कर रहे हैं।

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बिहार की राजनीति में यह एक नया संकेत है। वे साथ ही यह बताने से भी नहीं चूक रहे कि इन योजनाओं से कितना रोजगार सृजित हुआ और आने वाले दिनों में आत्मनिर्भरता कितनी बढ़ सकेगी। यही वजह है कि भाजपा इस बार आत्मनिर्भर बिहार का नारा दे रही है।

सुशांत को मुद्दा बनाने की कोशिश

एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद उनके परिवारवालों को न्याय दिलाने नाम पर हुई राजनीति में भाजपा सबसे आगे दिखी। प्रदेश भाजपा के कला व संस्कृति प्रकोष्ठ ने तो बकायदा सुशांत की एक मुस्कुराती हुई तस्वीर और ‘न भूले हैं और न भूलने देंगे’ के स्लोगन के साथ तीस-तीस हजार स्टिकर और मास्क जारी कर उसे जगह-जगह चिपकाया और बांटा। इस प्रकोष्ठ ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी राजीव नगर चौक व नालंदा की प्रस्तावित फिल्म सिटी का नामकरण सुशांत के नाम पर करने की मांग की थी।

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भाजपा के इस कदम पर सवाल खड़े किये गए और सोशल मीडिया में भी इसकी खूब आलोचना हुई। लोगों ने कहा, महाराष्ट्र सरकार पर निशाना साधने की आड़ में भाजपा सुशांत की मौत पर राजनीति कर रही है ताकि चुनावी लाभ मिल सके। हालांकि बिहार के चुनाव प्रभारी व महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस का कहना है, सुशांत सिंह राजपूत का मुद्दा चुनावी मुद्दा नहीं है।

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यह तो पूरा देश चाहता है कि उनके परिवार को न्याय मिले। इसी प्रकरण पर हमलावर हुई फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत को भाजपा की ओर से बिहार में चुनाव प्रचार में उतारे जाने के संबंध में वे कहते हैं कि भाजपा को किसी स्टार की आवश्यकता नहीं है। पीएम मोदी ही हमारे स्टार हैं।

रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी

वैसे रिया चक्रवर्ती को जब गिरफ्तार किया गया तो लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान ने तो कहा कि इससे उनलोगों को मौन साधना पड़ेगा जिन्होंने रिया की तरफदारी की थी। भाजपा प्रवक्ता निखिल आनंद ने कहा कि महाराष्ट्र के राजनीतिक आकाओं ने रिया को बचाने की भरपूर कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ रहा। जदयू का कहना था कि रिया की गिरफ्तारी से साफ हुआ कि जांच सही दिशा में जा रही थी।

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वहीं राजद का कहना था कि तेजस्वी यादव ने तो सबसे पहले इस मामले में सीबीआई जांच की मांग की थी। साफ है कि सभी पार्टियां बिहार के राजपूत मतदाताओं को उनके हितैषी होने का भरोसा दिलाने की होड़ में हैं। सोलहवीं विधानसभा में इस समुदाय के उन्नीस विधायक थे और करीब चालीस विधानसभा क्षेत्र में इनका खासा प्रभाव है जो किसी भी दल के लिए बड़ा वोटबैंक साबित हो सकता है।

विकास को भुनाने की रणनीति

जदयू और भाजपा की एक ही रणनीति है – लालू के परिवार को भ्रष्ट और राजद राज को अपराध राज के रूप में दिखाना और नीतीश राज को विकास का राज साबित करना। इसी रणनीति के तहत जदयू और भाजपा नेता 2005 के बिहार की तस्वीर जनता के सामने पेश करते हैं। अब जाति की जगह सामाजिक गोलबंदी की रणनीति बनाई जा रही है तथा विकास पर बहस हो रही है।

Bihar Election

जमीनी टास्क की बात करें तो जदयू और भाजपा ने वरिष्‍ठ नेताओं को गांव-गांव जाकर जनसमर्थन जुटाने का काम दिया है। भाजपा ने तो 60 हजार ‘सप्त ऋषियों’ को तैयार किया है जो गाँव गाँव में जन समर्थन जुटाएंगे और मोदी की उपलब्धियों का प्रसार करेंगे। ये सप्त ऋषि वास्तव में प्रचार कार्यकर्ता ही हैं।

जदयू की यूएसपी हैं सिर्फ नीतीश

JDU ने पार्टी के तीन सीनियर नेताओं – संजय झा, अशोक चौधरी और ललन सिंह को पार्टी की रणनीति और प्रचार अभियान तैयार करने के काम में लगाया है। इस बार किसी बाहरी प्रोफेशनल की मदद नहीं ली जा रही है। जदयूं के पास फोकस करने के लिए नीतीश कुमार ही हैं और पार्टी का अपूरा अभियान नीतीश को केंद्र में रख कर तैयार किया जा रहा है। पार्ट्री का सन्देश यही है कि बिहार का विकास नीतीश की लीडरशिप में ही हुआ है। प्रचार के स्लोगन भी इसी तरह के हैं – ‘न्याय के साथ तरक्की – नीतीश की बात पक्की’, ‘नीतीश में विश्वास और बिहार में विकास।’

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बदली रणनीति

लोकसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने लालू के सामाजिक फॉर्मूले पर चलते हुए खुद को आजमा लिया है। तेजस्वी ने इस बार अपनी रणनीति बदली है। इस बार वह सबको साथ लेकर चलने की बात कर रहे हैं। राजद की यात्राओं और चुनावी मंचों से तेजस्वी ऐसी अब कोई बात नहीं करते, जिससे विवाद खड़ा हो और विभाजन की झलक दिखे। राजद की ओर से पिछले 15 साल की सरकार की कमियां-खामियां गिनाई-दिखाई जा रही हैं।

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