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जन्मदिन विशेष: जब 'ठाकरे' की कार में निकल गया मंत्री का पेशाब, पढ़ें 5 रोचक किस्से

जब दिलीप कुमार ने पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान 'निशान-ए-इमतियाज़' स्वीकार कर लिया था तो उस वक्त बाल ठाकरे ने विरोध में शिव सैनिकों को उनके यहां 'अंडरवियर' में प्रदर्शन करने भेजा था।

Aditya Mishra
Updated on: 22 Jan 2021 2:08 PM GMT
जन्मदिन विशेष: जब ठाकरे की कार में निकल गया मंत्री का पेशाब, पढ़ें 5 रोचक किस्से
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मुंबई: महाराष्ट्र के प्रसिद्ध राजनेता बाल ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1926 में पुणे में रहने वाले एक मराठी परिवार में हुआ था। उनका परिवार सामाजिक कार्यों में बहुत अधिक रूचि रखता था और जातिवादी का धुर विरोधी था।

जिसका असर बाला साहेब के जीवन पर भी देखने को मिला। बाल ठाकरे ने शिवसेना के नाम से एक प्रखर हिन्दू राष्ट्रवादी दल का गठन किया था, जिसकी कमान आज मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के हाथों में है।

लोग उन्हें प्यार से बालासाहेब ठाकरे भी कहते हैं। बाल ठाकरे ने मराठी एकता को कायम करने और मुंबई को महाराष्ट्र की राजधानी बनाने के लिए बहुत संघर्ष किया।

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Bal Thakre बाल ठाकरे फोटो: सोशल मीडिया)

बाल ठाकरे ऐसे ही नहीं कहलाते हिन्दू हृदय सम्राट

यही वजह है कि लोग उनके निधन के बाद भी आज तक उन्हें याद करना नहीं भूलें हैं। महाराष्ट्र के अंदर एक बड़ा तबका है जिनके दिल में आज भी बालासाहेब ठाकरे बसते हैं। लोगों की यादों में आज भी वे जिंदा हैं। कोई भी शुभ काम हो लोग उनके निवास स्थान मातोश्री जाकर माथा टेकना नहीं भूलते हैं।

बाल ठाकरे का विवाह मीना ठाकरे से हुआ था। दोनों की तीन संतानें हैं। उद्धव ठाकरे उनके सबसे छोटे बेटे हैं। बाला साहेब ठाकरे ने अपनी आजीविका की शुरूआत मुंबई के प्रसिद्ध समाचारपत्र फ्री प्रेस जर्नल में कार्टूनिस्ट के रूप में शुरू की थी।

तो आइए आज हम बाल ठाकरे के जन्मदिन के मौके पर उनके जीवन से जुड़े कुछ रोचक किस्सों के बारें में बताने जा रहे हैं। जिसके बारें में बेहद कम लोग ही जानते होंगे।

Bal Thakre बाल ठाकरे फोटो: सोशल मीडिया)

1. जब ठाकरे ने अमिताभ से कहा था- “मैं कभी किसी चीज़ पर दुख प्रकट नहीं करता”

ये बात शायद कम लोग ही जानते होंगे। 1995 में मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों के काफ़ी दिनों बाद मणि रत्नम ने इस पर एक मूवी बनाई थी जिसका नाम 'बॉम्बे रखा था।'

इस मूवी के एक सीन में शिव सैनिकों को मुसलमानों को बेरहमी से मारते-पिटते और लूटपाट करते हुए दिखाया गया था।

मूवी में ठाकरे से मिलता जुलता एक कैरेक्टर भी है। जिसे मूवी के सबसे आखिर में इस हिंसा पर दुख प्रकट करते हुए दिखाया गया है। उसके साथ एक मुस्लिम नेता को भी दुख जताते हुए दिखाया गया है।

ठाकरे ने इस सीन को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी और कहा था कि वो इस फ़िल्म के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा था कि वो उसे मुंबई में प्रदर्शित नहीं होने देंगे। जिसके बाद शिव सैनिकों ने महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों में विरोध प्रदर्शन किया था।

इस फ़िल्म के वितरक अमिताभ बच्चन बाल ठाकरे के फ्रेंड थे। वो उनसे मिलने के लिए गये और पूछा कि क्या शिव सैनिकों को दंगाइयों के रूप में दिखाना उन्हें बुरा लगा है?

इस पर बाल ठाकरे नेकहा, "बिल्कुल भी नहीं। मुझे जो चीज़ बुरी लगी वो था दंगों पर ठाकरे के चरित्र का दुख प्रकट करना। मैं कभी किसी चीज़ पर दुख नहीं प्रकट करता।"

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Bal Thakre बाल ठाकरे और अमिताभ बच्चन (फोटो: सोशल मीडिया)

2-दिलीप कुमार के घर पर शिव सैनिकों को भेजकर अंडर वियर में करवाया था प्रदर्शन

एक वक्त ऐसा भी था जब बाल ठाकरे और फ़िल्म अभिनेता दिलीप कुमार के बीच काफी गहरी दोस्ती हुआ करती थी। दोनों का एक दूसरे के घर खूब आना जाना था।

लेकिन जब दिलीप कुमार ने पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान 'निशान-ए-इमतियाज़' स्वीकार कर लिया तो ठाकरे ने उसके विरोध में शिव सैनिकों को उनके यहां 'अंडरवियर' में प्रदर्शन करने भेजा था।

दिलीप कुमार ने अपनी बायोग्राफी 'द सब्सटेंस एंड द शैडो' में बाल ठाकरे और उनकी पत्नी मीना ताई के तारीफ़ में काफी सारी बातें भी लिखी हैं। दिलीप कुमार ने ये भी लिखा है कि उनके लिए दोनों की सरलता का हिस्सा बनना हमेशा एक आनंददायक चीज़ हुआ करती थी।

मीना ताई हमें अक्सर अपने घर पर खाने पर बुलाती थीं। अपने अलग अंदाज़ में मीना ताई उन्हें ज़मीन से जोड़े रखती थीं। एक वही थीं जो हम जैसे पुराने दोस्तों से हमेशा संपर्क में रहती थीं।

Dilip Kumar बाल ठाकरे और दिलीप कुमार (फोटो: सोशल मीडिया)

3.जब पार्टी में 'शैंपेन का इंतजाम नहीं होने पर गुस्सा हो गए था ठाकरे

ये बात ज्यादातर लोग जानते हैं कि बाल ठाकरे सिगार और बीयर पीने के बेहद शौकीन थे। उन्हें सार्वजनिक तौर पर शराब पीने में कोई परेशानी नहीं थी।

बात 1995 की है। जब उनकी पार्टी चुनाव जीत कर आई थी और उसकी ख़ुशी में एक पार्टी दी गई थी। उस वक्त उन्होंने इस बात पर ऐतराज़ किया कि वहां जीत की ख़ुशी में 'शैंपेन' का प्रबंध क्यों नहीं है?

ये पार्टी मुंबई के बहुत बड़े बिल्डर निरंजन हीरानंदानी के पिता डॉक्टर एल एच हीरानंदानी ने दी थी। जब ठाकरे वहाँ पहुंचे तो 'वेटर्स' फलों का जूस और 'सॉफ़्ट ड्रिंक' सर्व कर रहे थे।

ठाकरे ने अपने भाषण में कहा कि डॉक्टर हीरानंदानी बहुत बड़े ईएनटी डाक्टर हैं। 'ई' का अर्थ होता है, 'इयर' यानि कान। मेरे कानों में संगीत की स्वरलहरी सुनाई दे रही है।

'एन' का अर्थ होता है 'नोज़' यानि नाक। मेरी नाक में पकवानों की बहुत अच्छी संगंध पहुंच रही है। 'टी' का अर्थ होता है 'थ्रोट' यानि गला। गले को तर करने के लिए भी तो कुछ दीजिए।"

"डॉक्टर हीरानंदानी उनका आशय समझ गए। वो बोले, यहाँ पर मुख्यमंत्री भी मौजूद हैं। उनकी उपस्थिति में शराब कैसे परोसी जा सकती है। ये सुनते ही ठाकरे ने अपना सिर उठाया और कमरे के दूसरे कोने में खड़े हुए मुख्यमंत्री का नाम लेकर जोर से चिल्लाने लगे।

जब मुख्यमंत्री उनके पास आये तो उनका नाम पूछा तुम शैंपेन नहीं लेते हो। काफी देर तक उनके बीच बातचीत होती रही। इसका नतीजा ये हुआ कि वहां पर बाद में ठाकरे की वजह से पार्टी में शैंपेन का प्रबंध कराया गया और लोगों ने जमकर उसका मजा लिया।

4. जब ठाकरे की कार में निकल गया था मंत्री का पेशाब

ये बात चंद लोग ही जानते होंगे। दरअसल एक बार रजनी पटेल की पार्टी में महाराष्ट्र के तत्कालीन क़ानून मंत्री शराब के नशे में इतने बदहवाश हो गए कि ठाकरे ने उन्हें अपनी कार में उनके घर छोड़ने की पेशकश की। लेकिन तब तक मंत्री का अपने ऊपर नियंत्रण पूरी तरह से समाप्त हो चुका था।

ठाकरे की कार में ही उनका पेशाब निकल गया। ठाकरे बहुत मज़े लेकर वो क़िस्सा सुनाते थे कि उनको अपनी कार से पेशाब की बदबू निकालने में महीनों लग गए। कुछ दिनों बाद वही मंत्री ओबरॉय होटल की एक पार्टी में फिर नशे में आ गए। ठाकरे ने उन्हें इस बार लिफ़्ट देने से साफ़ मना कर दिया।

Bal Thakre जन्मदिन विशेष: जब ठाकरे की कार में निकल गया मंत्री का पेशाब, पढ़ें 5 रोचक किस्से(फोटो: सोशल मीडिया)

5. दक्षिण भारतीयों के खिलाफ चलाया था 'पुंगी बजाओ और लुंगी हटाओ' अभियान

बाल ठाकरे को मुंबई में दक्षिण भारतीय लोगों की उपस्थिति कभी भी रास नहीं आई थी। वह शुरू से इसके खिलाफ थे। उन्होंने उनके ख़िलाफ़ 'पुंगी बजाओ और लुंगी हटाओ' अभियान चलाया था।

वो तेज़ी से बोली जाने वाली तमिल भाषा का उपहास करते हुए उन्हें 'यंडुगुंडू' कह कर पुकारते थे। वो अपनी पत्रिका मार्मिक के हर अंक में उन दक्षिण भारतीय लोगों के नाम छापा करते थे जो मुंबई में नौकरी कर रहे थे और जिनके चलते स्थानीय लोगों को जॉब नहीं मिल पा रही थी।

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