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नरसंहार से जुड़ा ये आंदोलन : कहानी इतनी दर्दनाक, सुनकर सहम जाएंगे

ऐसे समय में आम देशवासियों की आवाज का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस ने 1920 के अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित कर दिया था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की पूरी टीम ने एकजुटता के साथ यह आंदोलन शुरू किया लेकिन गांधी की शर्त थी अहिंसा। वह जानते थे कि अंग्रेज सिपाहियों से भिड़कर नहीं जीता जा सकता लेकिन जनबल की ताकत से विदेशी हुकूमत को झुकाया जा सकता है।

राम केवी

राम केवीBy राम केवी

Published on 12 Feb 2020 9:54 AM GMT

नरसंहार से जुड़ा ये आंदोलन : कहानी इतनी दर्दनाक, सुनकर सहम जाएंगे
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रामकृष्ण वाजपेयी

एक ऐतिहासिक नरसंहार हुआ था। जिसे जलियांवाला बाग नरसंहार भी कहते हैं। 1919 में यहां निहत्थे आंदोलनकारियों को घेर कर अंग्रेज अफसरों ने गोलियों से भून दिया था। इस कायरतापूर्ण घटना पर पूरा देश फूट फूटकर रोया था। सब स्तब्ध थे। इस नरसंहार कांड ने झकझोर दिया था। क्रांतिकारियों की सशस्त्र टीम के बलिदानी जत्थे खून का बदला खून से लेने पर अड़ गए थे। पूरा देश सिहर उठा था।

ऐसे समय में आम देशवासियों की आवाज का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस ने 1920 के अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित कर दिया था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की पूरी टीम ने एकजुटता के साथ यह आंदोलन शुरू किया लेकिन गांधी की शर्त थी अहिंसा। वह जानते थे कि अंग्रेज सिपाहियों से भिड़कर नहीं जीता जा सकता लेकिन जनबल की ताकत से विदेशी हुकूमत को झुकाया जा सकता है।

आंदोलन शुरू हुआ तो उसे व्यापक समर्थन मिला। सरकारी, गैर सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, अध्यापक छात्र, घरों से निकल कर महिलाएं, बच्चों के साथ असहयोग आंदोलन में एकजुट हो गईं। पूरा देश एक लय में बह रहा था लेकिन इस अहिंसात्मक आंदोलन में कुछ ऐसे लोग भी जुड़ गए थे जो अहिंसा के पुजारी तो नहीं थे लेकिन सीधे टकराने की हिम्मत न जुटा पाने के कारण असहयोग आंदोलन से जुड़ गए थे।

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कुछ लोगों के मन में भयानक प्रतिशोध का दावानल सुलग रहा था। गांधी इस सब से बेखबर असहयोग आंदोलन को आगे बढ़ता देख कर प्रफुल्लित थे। आंदोलन फैलता जा रहा था प्रदर्शन तेज होते जा रहे थे। गांव गांव तक आंदोलन के साथ एकजुटता दिखा रहे थे।

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उफ्फ ये क्या हो गया

तभी अचानक 4/5 फरवरी का वह मनहूस दिन आया जब गोरखपुर के चौरीचौरा स्थान पर पुलिस के लाठीचार्ज और फायरिंग के बाद लोगों के मन में दबा प्रतिशोध का दावानल फट गया और भीड़ ने अहिंसा के उपदेश भुलाकर गांधी की शर्त को तोड़कर हिंसा का जवाब भयानक हिंसा से देते हुए चौरीचौरा थाने को फूंक दिया और इस नरसंहार में 22-23 लोगों की मौत हो गई। जो कि थाने को फूंकने के लिए लगाई गई आग में जिंदा ही जल गए थे।

नरसंहार

गांधी जी के लिए यह मर्मांतक पीड़ा का क्षण था। उनका सींचा पौधा विदेशी हुकूमत के जहर का शिकार हो चुका था उनकी सारी शिक्षाएं बेकार हो चुकी थीं। हिंसा का जवाब हिंसा गांधी के सिद्धांत में कहीं था ही नहीं उन्होंने पांच दिन के शुद्धिकरण उपवास की घोषणा की और 12 फरवरी को इस आंदोलन को वापस ले लिया। हालांकि बाद में चौरीचौरा कांड के लिए गांधीजी को भी छह वर्ष की सजा हुई लेकिन असहयोग आंदोलन की वापसी के दिन के रूप में 12 फरवरी का दिन आज भी याद किया जाता है।

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