कैदी के कान में जल्लाद के वो अंतिम शब्द-जो नहीं जानते होंगे आप

फांसी से पहले कैदी को नहाने और नए कपड़े पहननें को कहा जाता हैं। जिसके बाद उसे फांसी के फंदे तक लाया जाता है। फांसी देने से पहले व्यक्ति की आखिरी इच्छा पूछी जाती है। जिसमें परिवार वालों से मिलना, अच्छा खाना या अन्य इच्छाएं शामिल होती हैं।

Published by Shivakant Shukla Published: December 13, 2019 | 10:25 pm
Modified: December 13, 2019 | 10:28 pm
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नई दिल्ली: हैदराबाद और उन्नाव में दोनों युवातियों के साथ हुए दुष्कर्म के बाद जिंदा जला देने के मामले ने पूरे देश में आक्रोश का महौल पैदा कर दिया जिसके चलते जगह-जगह लोगों विरोध प्रर्दशन हो रहा है। इसी बीच खबर है कि जल्द ही निर्भया के आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई जा सकती है। हालांकि हैदराबाद पुलिस ने लेडी डाक्टर के साथ हैवानियत करने वाले आरोपियों को पुलिस ने इनकाउंटर करके इंसाफ दे दिया है। तो आइए इस मौके पर हम आपको बताते हैं कि कैसी होती है फांसी की प्रक्रिया…

रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ केस में फांसी की सज़ा दी जाती है

1973 के Code of Criminal Procedure में फांसी के लिए स्टैंडर्ड शब्दावली है। ‘hanged by the neck until death’ यानी मौत होने तक गर्दन से लटकाए रखना।1983 में सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश दिए कि सिर्फ ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ केस में फांसी की सज़ा दी जाएगी। मतलब केवल उन्हीं मामलों में जो बेहद घिनौने हों। जो अपराध इतने क्रूर हों जिनके लिए कोर्ट को लगे कि फांसी से नीचे की कोई भी सज़ा कम होगी। उदाहरण के लिए 2012 का निर्भया गैंगरेप और मर्डर केस में फांसी का वक्त करीब आ रहा है।

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फांसी की सजा फाइनल होने के बाद डेथ वॉरंट का इंतजार होता है। दया याचिका खारिज होने के बाद ये वॉरंट कभी भी आ सकता है। वॉरंट में फांसी की तारीख और समय लिखा होता है। मृत्युदंड वाले कैदी के साथ आगे की कार्यवाही जेल मैनुअल के हिसाब से होती है। बता दें, हर राज्य का अपना-अलग जेल मैनुअल होता है। जब किसी दोषी को फांसी दी जाती है तो उस समय कुछ नियमों का पालन करना जरूरी होता है वरना प्रकिया अधूरी मानी जाती है। इसके बाद बारी होती है डेथ वॉरंट जारी करने की जिसके बाद कैदी को ये बताया जाता है कि उसे फांसी दी जाने वाली है।

ऐसे होती है फांसी

डेथ वॉरंट की जानकारी जेल सुप्रीटेंडेंट को भी दी जाती है। अगर कैदी की जेल में फांसी की व्यवस्था नहीं है तो उसे नई जेल में शिफ्ट किया जाता है। फांसी का समय अलग-अलग निर्धारित होता है सुबह 6, 7 या 8 बजे लेकिन ये वक्त हमेशा सुबह का ही होता है। इसके पीछे कारण ये बताया जाता है कि सुबह बाकी कैदी सो रहे होते हैं। जिस कैदी को फांसी दी जानी है, उसे पूरे दिन मौत का इंतज़ार नहीं करना पड़ता।

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साथ ही परिवारवालों को अंतिम संस्कार का भी दिन में मौका मिल जाता है। जिसे फांसी होनी है उसके घर वालों को 10-15 दिन पहले सूचना दे दी जाती है ताकि परिवार के लोग कैदी से आखिरी बार मिल लें। जेल में कैदी की रोजाना पूरी चेकिंग होती है। उसे अन्य कैदियों से अलग सेल में रखा जाता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

फांसी के वक्त जल्लाद के अलावा तीन अधिकारी ही मौजूद होते हैं

फांसी वाले दिन सुप्रीटेंडेंट की निगरानी में कैदी को फांसी वाले सिथान तक लाया जाता हैं। फांसी के वक्त जल्लाद के अलावा तीन अधिकारी ही मौजूद होते हैं। ये तीनों अफसर जेल सुप्रीटेंडेंट, मेडिकल ऑफिसर और मजिस्ट्रेट होते हैं। सुप्रीटेंडेंट फांसी से पहले मजिस्ट्रेट को बताते हैं कि मैंने कैदी की पहचान कर ली है और उसे डेथ वॉरंट पढ़कर सुना दिया है। जिस पर कैदी ने हस्ताक्षर कर दिए है।

क्या होता है फांसी से पहले

फांसी से पहले कैदी को नहाने और नए कपड़े पहननें को कहा जाता हैं। जिसके बाद उसे फांसी के फंदे तक लाया जाता है। फांसी देने से पहले व्यक्ति की आखिरी इच्छा पूछी जाती है। जिसमें परिवार वालों से मिलना, अच्छा खाना या अन्य इच्छाएं शामिल होती हैं।

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जिस अपराधी को फांसी दी जाती है उसके आखिरी वक्त में जल्लाद ही उसके साथ होता है। बता दें कि सबसे बड़ा और सबसे मुश्किल काम जल्लाद का ही होता है। फांसी देने से पहले जल्लाद अपराधी के कानों में कुछ बोलता है जिसके बाद वह चबूतरे से जुड़ा लीवर खींच देता हैं। आखिरी वक्त जल्लाद कान में कहता है कि हिंदुओं को राम राम और मुस्लिमों को सलाम मैं अपने फर्ज के आगे मजबूर हूं। मैं आपके सत्य की राह पे चलने की कामना करता हूं।