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इतिहास का काला सच! बैरागी बेटे ने अवैध संबंधों से किया इंकार तो कातिल बन गई मां

जी हां! आज हम इतिहास के उस काले अध्याय के पन्ने को पलटने जा रहे हैं, जिसका संबंध भक्त पूरनमल से रहा है। भक्त पूरन मल के किस्से, कहानियां व नाटक-नौटंकी के माध्यम से भी लोगों को दिखाया व सुनाया जाता है।

Shivakant Shukla

Shivakant ShuklaBy Shivakant Shukla

Published on 10 Feb 2020 9:26 AM GMT

इतिहास का काला सच! बैरागी बेटे ने अवैध संबंधों से किया इंकार तो कातिल बन गई मां
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दुर्गेश पार्थसारथी

अमृतसर: कहते हैं इतिहास कभी किसी को माफ नहीं। अच्छे-बुरे कर्मों का लेखाजोखा अपने पन्नों में समेट कर रखता हैऔर आने वाली पीढ़ियों को चीख-चीख कर बताता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके कर्म सुनहरे अच्छरों में लिखे जाते हैं तो कुछ ऐसे भी होते हैं जिनका अध्याया शुरू होते ही लोग ‘‘ थू-थू’’ करना शुरू कर दते हैं। यह सिलसिला साल-दोसाल नहीं बल्कि पीढ़ी चलता रहा है और इसका खामियाजा उस कुल साथ-साथ जाति, समाज एवं उस स्थान को भी भुतना पड़ता है जिससे उसका संबंध होता है। जी हां! आज हम इतिहास के उस काले अध्याय के पन्ने को पलटने जा रहे हैं, जिसका संबंध भक्त पूरनमल से रहा है। भक्त पूरन मल के किस्से, कहानियां व नाटक-नौटंकी के माध्यम से भी लोगों को दिखाया व सुनाया जाता है।

बुढ़ापे का इश्‍क ले डूबा कुल

विक्रमी संवत 1806 के आसपास इतिहास के पन्नों में दर्ज ऐसे ही एक चरित्र का नाम है लूना! जी हां यह वही लूना है जिसके सौंदर्य पर मुग्‍ध हो कर स्यालकोट ‘जो अब पाकिस्तान में है’ केराजा सलवान ने उसे अछूत औरत से अपनी चहेती रानी बना दिया। वहीं लूना जिसे योगी शिरोमणि गुरु गोरखनाथ के प्रिय शिष्य भक्त पूरनमल जैसे महापुरुष की सौतेली मों होने का गौरव प्राप्त था। मगर उस लूना ने अपने कुकृत्यों से मां जैसे पवित्र रिश्ते को कलंकित करने की कोशिश की।

कवि शिवकुमार बटालवी ने लूना को बनाया नायिका

हालांकि पंजाबी के अमर कवि शिवकुमार बटालवी ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘लूना’ में लूना को नायिका के रूप में प्रतिष्ठित कर उसके माथे पर सदियों पूर्व लगे कलंक को धोने की कोशिश की थी। मगर चरित्र की जली चादर पर लगे कुकर्मों के स्याह धब्बे शब्दों के साबुन धो न सके। लूना के कुकर्मों की गवाही आज सदियां गुजर जाने के बाद भी इतिहास चीख-चीख कर देता है। और व शर्मशार कर देने वाली चीज अब भी सुनाई देते है मान्यताओं व भ्रांतियों में।

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कुछ साल पहले तक रानी लूना के महल के खंडहर उस इतिहास की काली दास्तान सुनाते थे, मगर इधर कुछ साल पहले तक अभिशाप का पर्याय बने ये खंडहर जमी दो हो चुके हैं, लेकिन उस गांव के माथे पर गोदना की तरह चिपका उसका काला इतिहास आज भी चैन नहीं लेने देता उस गांव की मांटी को और उस गांव के वाशिंदों को।

खता लम्‍हों की भुगत रही सदियां

अमृतसर जिले की तहसील अजनाला के अंतर्गत जिला मुख्यालय से करीब 8 किमी पूवोत्तर दिशा में फतेहगढ़ रोड पर स्थित गांव स्थित हैपक्का शहर। करीब दो से तीन हजार की आबादी वाला यह गांव । इस गांव की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही है कि यह कभी इतिहास प्रसिद्ध रानी लूना के गांव के रूप में ख्याति प्राप्त था। आज से साल पहले इस त्रासदी से मुक्ति पाने के लिए गांव के लनोगों ने इस गांव का पूराना नाम ‘चम्यारी’ से बदल कर पक्का शहर रख दिया।

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यहां के लोगों का मानना है कि यह गांव लूना द्वारा किए गए सदियों पूर्व कुकृत्यों के कारण अभिशप्त सा हो कर रह गया था। यदि कोई व्यक्ति इस गांव का नाम सुबह-सुबह ले लेता था तो उसे दिनभर रोटी नसीब नहीं होती थी। यहीं नहीं, लोग तो यहां तक बताते हैं कि एक जमाना वह भी जब लोग इस गांव रिश्ता तक करना पसंद नहीं करते थे। हलांकि समय के साथ-साथ सबकुछ दल रहा है फिर भी शदियों से चली आ रही सोच को बदलने में वक्त लगता है और ऐसा ही कुछ इस गांव के साथ भी है। यानि लम्‍हों की खता सदियों को भुगतना पड़ रहा है।

प्रचलित हैं कई किंबदंतियां

इस गांव में रानी लूना के जन्म को लेकर तरह-तरह की विचारधाराएं प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वह यहां दूर किसी पहाड़ी राजा के घर जन्मी थी। कुल पुरोहित ने उसकी जन्म कुंडली देख कर बताया कि यह लड़की बड़ी हो कर राजकुल को कंलंकित करेगी। फलतः राजा ने पूर्वानुमाति कलंक से बचने के लिए लड़की को लकड़ी के संदूक में आभूषणों के साथ रावी दरिया में प्रवाहित कर दिया।

चुंकि उस समय रावी नदी की एक शाखा चम्यारी गांव के पास से होकर निकलती थी, जो अब भी गांव से लगभग डेढ किमी कीदूरी पर ‘सक्की नाले’ के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। संदूक जब पानी के साथ बहता हुआ किनारे से गुजरा तो उसे गांव के हरिजनों ने पकड़ा एवं लड़की का पालन पोषण किया जो बड़ी हो कर लूनाके नाम से प्रसिद्ध हुई।

राजा सलवान की दूरी पत्‍नी थी लूना

गांव में प्रचलित एक और मान्यता से पता चलता है कि लूना इसी गांव के हरिजन की कन्या थी। इस विचार भिन्नताओं में यह हर जगह बताया गया है कि वह बचपन से ही अति सुंदर थी। जब वह बड़ी हुई तो उसे रूप माधुर्य के चर्चे दूर-दूर तक फैल गए। उस समय यह सारा क्षेत्र स्याल कोट के राजा सलवान के राज्य के अंतर्गत आता था।

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बताया जाता है एक बार जब राजा शिकार खेलते हुए इधर से गुर रहे थे तो लूना के सौंदर्य की कहानी उनके कानों तक पहुंची, और जब लूना राजा के आदेश पर उनके सामने लाई गई तो राजा सलवान उसकी सुंदरता पर मुग्ध हो गए और लूना से शादी कर ली। हलांकि इससे पहले भी राजा की एक रानी और थी जिससे एक पुत्र भी था पूरणमल जो बाद में अपनी सिद्धियों की बदौलत भक्त पूरणमल के नाम से विख्यात हुआ।

सौतेले बेटे को दिल दे बैठी लूना

राजा सलवान ने यह शादी बुढापे में की थी और उनका बुढ़ापे का इश्क लूना के लिए अभीशॉप और इतिहास के लिए कलंग बन गया। जब लूना की निगाह घर में ही स्थित हम उम्र सौतेले बेटे पूरण पर पड़ी तो वह उसे दिल दे बैठी। रानी पूरण को बेटा नहीं, बल्कि पति के रूप में स्थापित कर उससे अवैध संबंध बनाना चहती थी, मगर बैरागी बेटा पूरण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। इसके बाद शुरू हुआ यातनाओं और षड्यंत्रों का दौर। पूरण जितना इनकार करता, रानी उतना ही उसपर जुल्म ढाती। यहां तक कि उसने उसे कई मौत के मुंह में धकेला। मगर पूरण ने पावन रिश्ते पर आंच नहीं आने दी। यह सारा किसा आज भी देश के कोने-कोने में किसी न किसी रूप में कहा और सुना जाता है।

इतिहास का स्‍याह अध्‍याय बन गई लूना की कहानी

चूंकि लूना राजा की चहेती थी और राजा उसकी हर ख्वाहिश को पूरा करवाता था। चम्यारी गांव मेंही उसके रहने के लिए महल बनवाकर राजसी ठाट की हर सुविधा प्रदान किया। उस समय यह गांव स्यालकोट राज्य का एक अहम हिस्सा था। या यूं कहें कि लूना यहीं से राज्य का संचालन भी किया करती थी। समय बदला, सदियां बीती और सभी क्या लूना, क्या सलवान और क्या पूरणमल सब के सब याद बन कर इतिहास के पन्नों में दर्ज होते चले गए। और उन्हीं साथ लिखी गई उनके कर्मों की इबारत। पूरण की भक्ति एवं मां-बेटे के पावन रिश्ते की अटलता, लूना की हवस को काल का प्रवाह भी नहीं बदल सका।

मिट चुकी हैं निशानियां

इतना अर्सा बीत जाने के बाद भी लूना का महल जहां से वह स्यल कोट राज्य का संचालन करती थी, आज जमींदोज हो चुका है। कुछ साल पहले तक यह दो मंजिला महल उस समय की स्थाप्तय कला का बेमिशाल नमूना था। या यूं कहें कि यह महल भी लूना की ही तरह हसीन रहा होगा। महल से थोड़ी दूर पर एक कूआं व सुरंग है। सुरंग में दो-तीन छोटे-छोटे कमरे थे, जिनमें से एक कमरे का हिस्सा कुएं की निचली सतह पर खुलता है।

बताया जाता है कि रानी इन्हीं कमरों कुंए के पानी से स्नान करती थी। कुआं अब भी चालू हालत हैं। हलांकि इतिहास का ‘चश्मदीद गवाह’ रहे लूना के महल का अब नाम ही बचा है। गांव के लोगों का कहना है कि वे इस कलंकित इतिहास से पीछा छुड़ाना चाहते है। इसी वजह उन्होंने अपने अपने गांव का नाम तक बदल दिया, लेकिन ऐतिहासिक कलंक ही ऐसा है कि सदियों बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहा।

Shivakant Shukla

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