लोकसभा चुनाव : माओवादियों के गढ़ में भाजपा की कड़ी चुनौती

Published by seema Published: May 10, 2019 | 2:16 pm
Modified: May 10, 2019 | 2:17 pm

लोकसभा चुनाव : माओवादियों के गढ़ में भाजपा की कड़ी चुनौती

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में लालगढ़ इलाका कभी माओवादियों का गढ़ हुआ करता था। अब यहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का दबदबा है जिसने परिवर्तन का वादा करके यहां से वामपंथियों को उखाड़ फेंका था। २०१९ के लोकसभा चुनाव में ममता को भाजपा से कड़ी चुनौती मिल रही है। यहां फिर से बदलाव आता दिख रहा है। वैसे तो पूरे इलाके में टीएमसी के झंडे लगे हुए हैं। सरकारी-निजी बिल्डिंगों के अलावा पुलिस चौकियां भी पार्टी के नीले रंग में रंगी हुई हैं लेकिल जनता के बीच चर्चा भाजपा द्वारा टीएमसी को मिल रही चुनौती की है। टीएमसी के नेता स्वीकार करते हुए पिछले साल पंचायत चुनावों के बाद झारग्राम जिले में भाजपा को मिल रहे समर्थन से पार्टीजन हैरान हैं। झारग्राम जिले में टीएमसी को 79 में से 28 ग्राम पंचायतों पर हार का सामना करना पड़ा था।

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2014 में टीएमसी की उमा सोरेन ने झारग्राम से माकपा के पुलिन बिहारी बास्के को हरा कर वामपंथ को उखाड़ फेंका था। इस बार टीएमसी ने बिरभा सोरेन, माकपा ने देबलिना हेम्ब्राम और भाजपा ने कुनार हेम्ब्राम को टिकट दिया है। इसी तरह बांकुड़ा भी कभी वामपंथियों का गढ़ हुआ करता था। अब यहां भाजपा की लहर तेज है और टीएमसी परेशान है। राज्य के कई हिस्सों में वामपंथियों की ताकत कमजोर पड़ गयी है लेकिन बांकुड़ा में अब भी उसका जनाधार अच्छा है लेकिन भाजपा यहां खेल बिगाड़ सकती है। माकपा और भाजपा दोनों ही उस तथ्य को भुना रहे हैं कि टीएमसी प्रत्याशी सुब्रत मुखर्जी कोलकाता से हैं और दोनों दल दावा कर रहे हैं कि अगर वह चुनाव जीतते हैं तो वह यहां बहुत कम ही नजर आएंगे।

ममता बनर्जी ने अपने मंत्रिमंडल के मंत्री मुखर्जी को अभिनेत्री से नेता बनीं मुनमुन सेन की जगह उतारा है। मुनमुन सेन ने 2014 में टीएमसी की लहर का लाभ लेते हुए नौ बार के सांसद रहे माकपा के बासुदेव आचार्य को हराया था। सुब्रत मुखर्जी कहते हैं कि जिस तरह गुजरात के नरेंद्र मोदी वाराणसी को विकसित कर रहे हैं, मैं भी उसी तरह से बांकुरा का ख्याल रखूंगा। उन्होंने कहा कि वह जिले से अनभिज्ञ नहीं हैं और पंचायत विभाग जिसके वह मंत्री हैं उसकी 13 परियोजनाएं फिलहाल यहां चल रही हैं। मुखर्जी 2009 में टीएमसी प्रत्याशी के तौर पर बासुदेब आचार्य से हार गए थे लेकिन 2004 के चुनावों में जिस अंतर से आचार्य जीते थे उसको कम करने में सफल रहे थे। आचार्य को 2004 में कुल डाले गए मतों का 60 प्रतिशत हासिल हुआ था लेकिन 2009 में यह नीचे खिसक कर 47.66 प्रतिशत पर आ गया।

टीएमसी ने 2016 के विधानसभा चुनावों में बांकुड़ा लोकसभा क्षेत्र की सात में से पांच सीटों पर जीत हासिल की थी और रेवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) व कांग्रेस ने एक-एक सीट जीती थी। भाजपा सभी सीटों पर बड़े अंतर के साथ तीसरे स्थान पर रही थी। भाजपा प्रत्याशी सुभाष सरकार ने भले ही इस बार यह सीट टीएमसी से छीनने का भरोसा जताया है लेकिन मुखर्जी ने भाजपा को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी स्वीकार करने से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि कैसे एक पार्टी जिसे पिछले राज्य चुनावों में मामूली वोट मिले थे उसे टीएमसी का मुख्य प्रतिद्वंद्वी माना जा सकता है। वह अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी माकपा को भाजपा के मुकाबले ज्यादा बड़ी चुनौती मानते हैं। माकपा प्रत्याशी अमीय पात्रा मानते हैं कि पिछले साल के पंचायत चुनाव में भाजपा का वोट शेयर बढ़ा था लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि इसका यह मतलब नहीं कि वह लोकसभा चुनाव में कुछ लाभ ले पाएगी।