आम की तरह पीली व सेब की तरह रेड शिमला मिर्च, दिला रही अच्छा दाम

नेट हाउस में एमएससी एग्रीकल्चार के विद्यार्थियों की ओर से शिमला मिर्च के लगाए गए तीन तर ह केइन पौधों में लगे लाल, पीले व हरे रंग की मिर्च हर किसी को आकर्षित कर रही है। अपने तीन रंगों के कारण जहां यह मिर्च आकर्षण का केंद्र बनी है, वहीं इसका स्वाद भी ला जवाब है।

दुर्गेश मिश्र

अगर आपने आम की तरह पीली और एप्पल की तरल रेड शिमला मिर्च का स्वाद नहीं लिया है तो इसके लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। क्योंकि, अब इसकी खेती खालसा काॅलेज के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट के स्टूडेंट्स अमृतसर स्थित काॅलेज कैंपस में ही करने लगे हैं। वह भी विशुद्ध रूप से आर्गेनिक। नेट हाउस में एमएससी एग्रीकल्चार के विद्यार्थियों की ओर से शिमला मिर्च के लगाए गए तीन तर ह केइन पौधों में लगे लाल, पीले व हरे रंग की मिर्च हर किसी को आकर्षित कर रही है। अपने तीन रंगों के कारण जहां यह मिर्च आकर्षण का केंद्र बनी है, वहीं इसका स्वाद भी ला जवाब है।

243 एसक्वायर फिट में की खेती:

एमएससी एग्रीकल्चर वेजीटेवल केरिसर्च टालय के स्टूडेंट्स ईस्मीत सिंह कहते हैं कि अपने प्रोफेर्स डा गुरबख्श सिंह व मनेंद्रजीत सिंह के निर्देशन मेंरिसर्च टायल के तौर पर 243 एसक्वायर फिट में बने नेट हाउस मेंशिमला मिर्च के 540 पौधे लगाए। उन्होंने बताया कि खाद के तौर पर कंपोस्ट व वर्मिग खादों का ही इस्तेमाल किया गया है। यहां तक कि कीटनाशाके रूप में भी पूरी तरह से तैयार आर्गेनिक दवाओं का ही छीडकाव किया गया है।

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दो माह में देने लगते हैं फल

ईस्मीत ने बताया कि उन्होंने अक्टूबर में इन पौधो का प्लांटेशन किया और इसके दो माह बाद दिसंबर में इनकी हार्वेस्टिंग शुरू कर दी थी। पहली बार वह 15 से 20 दिन के अंतराल पर फलोंकी तेाडाई होती है! इसके बाद 20 से 25 दिन के अंतर पर शिमला मिर्च के फलों की तोडाई की जाती है। इसका उत्पादन 50 से 60 किलो तक होता है।

मार्केट में मिलता है अच्छा दाम

स्टूडेंट्स का कहना है कि एप्पल व मैंगो कलर केइन शिमला मिर्चों का स्वाद आम शिमला मिर्चसेविल्कुल भिन्न व इसका उत्पादन पूरी तरह सेआर्गेनिक होने के कारण यह 80 से सौ रूपये पर केजी के हिसाब से आसानी से बिक जाता है। इसका इस्तेमाल सब्जियों के अलावा, बर्गर, न्यूडल्स व कई अन्य व्यंजनों में किया जाता है।

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आर्गेनिक खेती के लिए किया जाता है प्रोत्साहित

एग्रीकल्चर के विद्यार्थियों को पूरी तरह से आर्गेनिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। प्रारंभिक तौर पर इन विद्यार्थियों को काॅलेज के फर्मा में ही नेट व पोली हाउस में आर्गेनिक विधि से फल व सब्जियां उगाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। शिक्षा पूरी करने के बाद अगर येस्टूडेंट्स फार्मिंग करना चाहें तो इन्हेंखेती बाडी विभाग से सब्सीडी पर फंड्स भी मुहैया करवाया जाता है। (प्रोडाक्टर गुरबख्श सिंह, एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट ‘आर्गेनिक’)

गोमूत्र से तैयार किया है केमिकल

यह खेती एग्रीकल्चर एमएससी रिसर्च के विद्यार्थियों द्वारा टालय के तौर पर की गई है। इसमें पूरी तरह से आर्गेनिक खादों व कीटनाशकों का इस्तेमाल किया गया है। शिमला मिर्च में लगने वाले रस चूसक कीडों को मारने के लिए ग्रीन व रेड चीली, अरंड की पत्तियांव गोमूत्र से तैयार घोल के मिश्रण से तैयार दवाओं का छिडकाव किया गया है। इसके अच्छे परिणाम भी आने लगें है। उम्मीद है काॅलेज निकलने वाले विद्यार्थी इसके लिए दूसरों को भी प्रेरित कर पर्यावरण संरक्षण के लिए हाथ बढाएंगे।
(मनेंद्र जीत सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, खालसा काॅलेज, अमृतसर)

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