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दुर्भाग्य देश का: लापरवाही ने ले ली बच्चे की जान, परिवार में मातम

पंजाब के पठानकोट का एक मामला सामने आया है। पठानकोट में सात साल के मासूम को अचानक से सांस लेने में परेशानी हुई और उसकी मौत हो गई। देश में लॉकडाउन की वजह से सारी व्यवस्थाएं अस्त-व्यस्त है।

Vidushi Mishra
Updated on: 29 April 2020 6:32 AM GMT
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नई दिल्ली: पंजाब के पठानकोट का एक मामला सामने आया है। पठानकोट में सात साल के मासूम को अचानक से सांस लेने में परेशानी हुई और उसकी मौत हो गई। देश में लॉकडाउन की वजह से सारी व्यवस्थाएं अस्त-व्यस्त है। सात साल के बच्चे को सांस लेने में अचानक से परेशानी होने लगी, तो तुरंत उसके परिवार वाले उसे अस्पताल लेकर भागे। किसी तरह वे पहले अस्पताल पहुंचे, तो वहां डॉक्टर ही नहीं थे, फिर दूसरे तो वहां भी यहीं हाल, ऐसा करते-करते परिवार वाले उस बच्चे के लिए हुए 6 अस्पतालों के चक्कर काट चुके, तब 7वें अस्पताल में जब डॉक्टर मिले, लेकिन तब तक बच्चे की सांसे रुक गई थी।

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हेल्थ सिस्टम की नाकामी

अचम्भे की बात तो ये है कि जिन 6 अस्पतालों के परिवार वालों ने चक्कर लगाए, उनमें से 2 सिविल अस्पताल थे। इसे हेल्थ सिस्टम की नाकामी नहीं तो क्या कहेंगे कि 6 अस्पतालों में जाने के बाद भी एक बच्चे को जिंदगी नहीं बचा सके।

लंदन में रह रहे डॉक्टर धीरज सिंह मूल रूप से पठानकोट जिले के हैं। इस प्रशासनिक नाकामी पर डॉक्टर धीरज ने बताया कि बच्चा उनके पिता के यहां काम करने वाले उपिंदर जोशी का है, जो मूल रूप से बिहार के हैं। जोशी 1995 से पठानकोट में रह रहे हैं।

उन्होंने बताया कि मंगलवार सुबह जब जोशी के बच्चे को सांस लेने में तकलीफ हुई तो जोशी ने डॉक्टर धीरज को मदद के लिए फोन लगाया। कृष्णा नाम के इस बच्चे को जो समस्या थी उसके लिए लंदन बेस्ड डॉक्टर को इक्विपमेंट की जरूरत थी। लेकिन स्टेथोस्कोप समेत जरूरी उपकरण नहीं होने की वजह से वह परीक्षण नहीं कर सके।

इसके बाद परिवार वाले एक पास के अस्पताल पहुंचे, लेकिन वहां भी डॉक्टर ने चेकअप से मना कर दिया। इसके बाद वे बच्चे को लेकर एक प्राइवेट अस्पताल पहुंचे लेकिन यहां भी वही हाल रहा।

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जूनियर डॉक्टर ने ही बच्चे का चेकअप

डॉक्टर धीरज का कहना है, "एक डॉक्टर के रूप में मैंने अस्पताल स्टाफ से इमरजेंसी के बारे में बात करते हुए एक सीनियर डॉक्टर की जरूरत पर जोर दिया। लेकिन वे तैयार नहीं थे। इसके बाद मेरे भाई ने 108 ऐम्बुलेंस पर फोन किया और हम बच्चे को लेकर सुजानपुर सिविल अस्पताल पहुंचे।"

लेकिन वहां हालात इससे भी गैर-गुजरे थे। मजबूरी में हम लोगों ने ऐम्बुलेंस के ड्राइवर से पठानकोट सिविल अस्पताल छोड़ने के लिए कहा। डॉक्टर धीरज ने बताया कि यहां भी उन्होंने पूछा कि क्या ईएनटी (आंख-नाक और गला) स्पेशलिस्ट या सर्जन बच्चे को देख सकते हैं लेकिन एक जूनियर डॉक्टर ने ही बच्चे का चेकअप किया।

वहीं नर्सिंग स्टाफ ने कहा कि सीनियर डॉक्टर कोरोना के लिए बने आइसोलेशन वॉर्ड में हैं। इसके बावजूद कोई डॉक्टर बच्चे को देखने नहीं पहुंचा।

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इमरजेंसी केस देखने के लिए हमारे पास डॉक्टर नहीं

फिर "हम एक जाने-माने मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल पहुंचे लेकिन जैसे ही स्टाफ ने ऐम्बुलेंस का हूटर बजते देखा, उन्होंने कहा कि इमरजेंसी केस देखने के लिए हमारे पास डॉक्टर नहीं हैं"।

डॉक्टर धीरज ने बताया, 'एक बार फिर हम एक जाने-माने मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल पहुंचे लेकिन जैसे ही स्टाफ ने ऐम्बुलेंस का हूटर बजते देखा, उन्होंने कहा कि इमरजेंसी केस देखने के लिए हमारे पास डॉक्टर नहीं हैं।' एक अन्य अस्पताल पर बच्चे को एक फार्मासिस्ट ने देखा।

डॉक्टर धीरज ने आगे बताया कि, 'मैं किसी तरह बच्चे को संभालने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसे स्पेशलिस्ट की जरूरत थी। इसके बाद हम एक और मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल के लिए निकले लेकिन रास्ते में ही बच्चे ने दम तोड़ दिया।'

इस मासूम की मौत प्रशासन की लापरवाही की वजह हुआ है। लेकिन पठानकोट सिविल अस्पताल प्रशासन ने किसी तरह की लापरवाही से मना किया है।

पठानकोट के सिविल सर्जन डॉक्टर विनोद सरीन ने कहा कि अस्पताल स्टाफ की तरफ से कोई लापरवाही नहीं की गई। उनका कहना है कि पठानकोट सिविल अस्पताल में बच्चे को लाने से पहले ही मौत हो चुकी थी।

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Vidushi Mishra

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