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Stamp Paper History: क्या आप जानते हैं स्टांप पेपर की शुरुआत कब हुई थी और इसका इस्तेमाल भारत में कब से किया जा रहा है? आइए जानते हैं इसका इतिहास

Stamp Paper Kya Hai: स्टैम्प पेपर एक कानूनी दस्तावेज होता है, जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के वित्तीय और कानूनी लेन-देन के लिए किया जाता है। आइए जानते हैं इसे सबसे पहले कहां इस्तेमाल किया गया था और भारत में इसकी शुरुआत कब हुई।

Shreya
Written By Shreya
Published on: 26 Feb 2025 9:00 AM IST (Updated on: 26 Feb 2025 9:01 AM IST)
Stamp Paper History: क्या आप जानते हैं स्टांप पेपर की शुरुआत कब हुई थी और इसका इस्तेमाल भारत में कब से किया जा रहा है? आइए जानते हैं इसका इतिहास
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Stamp Paper (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

Stamp Paper Ka Itihas: आपने अब तक कई बार अपने जीवन में स्टांप पेपर (Stamp Paper) का नाम सुना और देखा होगा, जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल भी जरूर किया होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में स्टांप पेपर कब अस्तित्व में आया और दुनिया में सबसे पहले इसे कहां इस्तेमाल किया गया था। स्टाम्प पेपर के वजूद से पहले भी क्या दस्तावेजों के सत्यापन की कोई प्रक्रिया थी? आइए जानते हैं इन सारे सवालों से जुड़े जवाब के बारे में विस्तार से।

स्टांप पेपर क्या होता है?

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

असल में, स्टैम्प पेपर एक कानूनी दस्तावेज होता है, जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के वित्तीय और कानूनी लेन-देन के लिए किया जाता है। यह सरकार द्वारा मुद्रांकित होता है और इसका उपयोग करों के भुगतान और कानूनी मान्यता प्राप्त करने के लिए किया जाता है। स्टांप पेपर की कीमतें अलग-अलग होती हैं, जो दस्तावेज़ के महत्व और प्रयोजन के अनुसार निर्धारित की जाती हैं।

इसका ऐतिहासिक महत्व है और वर्तमान में डिजिटल प्रणाली ने इसे और अधिक सुरक्षित बना दिया है। इसमें यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि स्टांप पेपर सही स्रोत से खरीदा जाए और सभी कानूनी आवश्यकताओं का पालन किया जाए।

स्टांप पेपर का इतिहास (History of Stamp Paper)

स्टांप पेपर की शुरुआत यूरोप में हुई थी। इंग्लैंड में पहली बार 1694 में स्टांप एक्ट लागू किया गया, जिसमें कानूनी दस्तावेजों पर शुल्क लगाने की प्रणाली स्थापित की गई। इसके बाद, यह प्रणाली अन्य देशों में भी अपनाई गई। भारत में स्टांप पेपर का उपयोग ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ।

1869 में भारतीय स्टांप अधिनियम लागू किया गया, जिसके तहत सभी कानूनी दस्तावेजों पर स्टांप शुल्क लिया जाने लगा। यह अधिनियम बाद में कई बार संशोधित किया गया और वर्तमान में भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 के तहत स्टांप ड्यूटी और स्टांप पेपर से संबंधित नियम लागू होते हैं।

हुनदी की प्रक्रिया (Hundi Process)

हुनदी प्रणाली भारतीय उपमहाद्वीप में पारंपरिक बैंकिंग और क्रेडिट व्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा थी। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार थी:

जारीकर्ता (द्रष्टा) द्वारा लिखित पत्र-

व्यापारियों या साहूकारों द्वारा लिखित एक दस्तावेज, जिसमें एक निश्चित राशि और भुगतान की शर्तें होती थीं।

प्राप्तकर्ता (स्वीकर्ता)-

जिसे यह रकम प्राप्त करनी होती थी, वह इस दस्तावेज़ को मान्यता देता था।

दलाल (बिचौलिए)-

कई बार व्यापारिक सौदों में दलाल शामिल होते थे, जो हुनदी की प्रामाणिकता की पुष्टि करते थे।

भुगतान प्रक्रिया-

जब तय तिथि पर भुगतान किया जाता था, तो दस्तावेज़ को रद्द कर दिया जाता था।

हस्तांतरण योग्य प्रणाली-

हुनदी को अन्य व्यापारियों को भी सौंपा जा सकता था, जिससे यह लेन-देन की एक प्रभावी प्रणाली बन गई।

आजादी से पहले स्टांप का पर्याय क्या था?

भारत में आजादी से पहले स्टांप पेपर का स्थान पारंपरिक दस्तावेज़ों और हुनदी प्रणाली ने लिया था। उस समय व्यापारिक और वित्तीय लेन-देन के लिए हुनदी का उपयोग किया जाता था, जो कि एक प्रकार का देय दस्तावेज होता था। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर दस्तावेजों की प्रमाणिकता के लिए राजा-महाराजाओं द्वारा मुद्रांकित पत्रों का उपयोग किया जाता था। ब्रिटिश शासन के दौरान औपचारिक स्टांप ड्यूटी प्रणाली लागू की गई, जिससे स्टांप पेपर का प्रचलन शुरू हुआ।

स्टांप पेपर के प्रकार और उनका उपयोग

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

पेपर मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:

1. जुडिशियल स्टांप पेपर (Judicial Stamp Paper) –

न्यायिक कार्यों में उपयोग किया जाता है, जैसे कि कोर्ट फीस, हलफनामे और कानूनी याचिकाएं।

2. नॉन-जुडिशियल स्टांप पेपर (Non-Judicial Stamp Paper) –

सामान्य वित्तीय और व्यापारिक लेन-देन के लिए उपयोग होता है, जैसे कि किरायानामा, बिक्री विलेख, अनुबंध आदि।

स्टांप पेपर के भिन्न मूल्य (रुपये में) और उनका उपयोग

1. सामान्य शपथ पत्र, घोषणापत्र, आवेदन पत्र के लिए ₹5, ₹10, ₹20, ₹50 मूल्य तक के स्टाम्प पेपर का इस्तेमाल किया जाता है।

2. किरायानामा, पावर ऑफ अटॉर्नी, गारंटी बांड के लिए ₹100, ₹500, ₹1000 मूल्य तक के स्टाम्प पेपर का इस्तेमाल किया जाता है।

3. ₹10,000 और उससे अधिक कीमत के स्टाम्प पेपर का इस्तेमाल भूमि खरीद-फरोख्त, व्यापारिक अनुबंध, संपत्ति हस्तांतरण के लिए किया जाता है।

स्टांप ड्यूटी और सरकारी राजस्व के बीच संबंध

स्टांप पेपर की बिक्री से सरकार को महत्वपूर्ण राजस्व प्राप्त होता है। इसे स्टांप ड्यूटी कहा जाता है। यह कर राज्यों द्वारा तय किया जाता है और इसकी दरें प्रत्येक राज्य में अलग-अलग हो सकती हैं। स्टांप ड्यूटी का उपयोग विभिन्न सरकारी विकास योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है। ऑनलाइन स्टांप पेपर की उपलब्धता से इसे और अधिक पारदर्शी बनाया गया है।

स्टांप पेपर की खरीद और नकली स्टांप पेपर से बचाव

स्टांप पेपर को अधिकृत विक्रेताओं, बैंकों और सरकारी पोर्टलों से खरीदा जा सकता है। जबकि नकली स्टांप पेपर से बचने के लिए सावधानियां बरतने की आवश्यकता होती है। जो कि इस प्रकार हैं-

सावधानियां

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

हमेशा अधिकृत विक्रेताओं से ही स्टांप पेपर खरीदें। स्टांप पेपर खरीदने से पहले इस पर अंकित क्रमांक और सुरक्षा विशेषताओं की जांच सावधानी पूर्वक की जानी चाहिए।असली स्टांप पेपर पर यूनिक क्रमांक, वॉटरमार्क और सरकारी मुहर होती है। नकली स्टांप पेपर में ये विशेषताएं स्पष्ट नहीं होतीं।

इसके अलावा असली स्टांप पेपर पर उच्च गुणवत्ता की छपाई होती है, जबकि नकली में यह फीकी या धुंधली हो सकती है। जहां तक संभव हो हमेशा डिजिटल स्टांप (ई-स्टांपिंग) प्रणाली का उपयोग करें, जो अधिक सुरक्षित है। वर्तमान में डिजिटल प्रणाली ने इसे और अधिक सुरक्षित बना दिया है।

स्टाम्प पेपर खरीदने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि यह महत्वपूर्ण दस्तावेज सही स्रोत से खरीदा जाए और सभी कानूनी आवश्यकताओं का पालन किया जाए। यदि संदेह हो तो विक्रेता का सत्यापन करें , विक्रेता की प्रमाणिकता की जांच करें और उसकी पृष्ठभूमि सुनिश्चित करें।



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