लाल कैसे पीले निकले ?

केरल की वामपंथी सरकार पर मार्क्सवादी चिंतन के आयात के साथ स्वर्ण तस्करी का अभियोग भी लग गया है|

के. विक्रम राव

केरल की वामपंथी सरकार पर मार्क्सवादी चिंतन के आयात के साथ स्वर्ण तस्करी का अभियोग भी लग गया है| मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी काबीना के एक प्रमुख मंत्री को इस अपराध में शामिल पाया गया| सरकार-विरोधी अभियान प्रारंभ चल रहा है| सहयोगी घटक, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के दैनिक ”जनयुगम” (20 जुलाई 2020) ने प्रमुखता से टिप्पणी प्रकाशित की है कि, ”एक माकपायी काबीना मंत्री ने अपराध में खास भूमिका अदा की|” टिप्पणीकर्ता हैं माकपा के सचिव के. प्रकाशबाबू| उधर माकपायी मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने अपने प्रमुख सचिव एम. शिवशंकरन ,आईएएस को तत्काल निकाल दिया| वे सीधे संलिप्त पाए गए थे|

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माजरा यह है कि गत 6 जुलाई को तिरुअनंतपुरम विमान स्थल पर सीमाकर अधिकारियों ने तीस किलो सोना पकड़ा था| यह बक्सा राजधानी-स्थित संयुक्त अरब अमीरात के दूतावास के नाम था| लोगों का कहना है कि गत कुछ वर्षों से बड़ी मात्रा में दुबई से सोना चोरी-छुपे लाया जाता रहा है| इसके मुख्य खरीददार मलयाली फिल्म उद्योग वाले हैं| शिक्षा मंत्री के.टी. जलील, जो मुस्लिम-बहुल मल्लप्पुरम जिले से हैं, का कहना है कि ईद के अवसर पर अरब राष्ट्र के मुसलमान खाद्य पदार्ध का तोहफा भेज रहे थे| पर ताज्जुब तो यह है कि खाद्य पदार्थ किस वक्त, कहाँ, कैसे पीले धातु में बदल गए ?

इस अजूबे की तहकीकात भारत सरकार की तीन संस्थाएं कर रही हैं: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA), प्रवर्तन निदेशालय (ED) तथा सीबीआई| खुद केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह निगरानी रखे हैं|

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अर्थात इसमें एक तरुणी है मुख्य अभियुक्त| नाम है स्वप्ना सुरेश| लावण्यमयी है| कम्युनिस्ट नेता के अनुसार मुख्यमंत्री के कार्यालय में उसका बेरोकटोक, बेझिझक आना-जाना है| सूरज ढलते ही उसके आवास पर पार्टियां होती हैं| इसमें, पड़ोसियों की गवाही के अनुसार, माकपा मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सदा विशेष अतिथि होते हैं| केरल हाई कोर्ट अगले सप्ताह स्वप्ना की अग्रिम जमानत की याचिका पर निर्णय देगी| फ़िलहाल वह भूमिगत है| माकपा के श्रमिक संगठन सेंटर ऑफ़ ट्रेड यूनियंस (सीटू) के एक वरिष्ठ नेता स्वप्ना को बचाने की हिमालयी कोशिश कर रहे हैं|

केरल विधान सभा में नेता (कांग्रेस) विपक्ष रमेश चेन्नीथाला (उर्फ़ रमेश रामकृष्ण नायर) जो कभी राज्य के गृह मंत्री थे, ने तो वामपंथी सरकार की खाट खड़ी कर दी| उनका कहना है कि ”मुख्यमंत्री विपक्ष को अक्सर दोषी मानते हैं| हम तो उन्हें बस आईना दिखाते हैं| कोविड -19 से निपटना इस वामपंथी सरकार की महती विफलता है, अब यह स्वर्ण तस्करी भी|”

इस समस्त प्रकरण की विडंबना यही है कि आज के यही सीएम पिनराई विजयन कभी पार्टी के विद्रोही हुआ करते थे| तब इन्होंने अत्यंत सुलभ तथा ईमानदार मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन को उखाड़ फेंकने में कोर कसर नहीं छोड़ी थी| दो बार माकपा केन्द्रीय नेताओं ने विजयन की चुगली पर इस अस्सी-वर्षीय नेता का चुनावी टिकट काट दिया था| केरल की सड़को पर जनांदोलन हुआ| विवश होकर पार्टी हाईकमान को अच्युतानंदन को टिकट देना पड़ा| माकपा की सरकार बन गयी| विजयन अपने ही मुख्यमंत्री की कब्र खोदने में लगे थे, पर नाकाम रहे|

समस्त केरल में यही नितान्त नेक और नैतिक व्यक्ति हैं। अस्सी सालों से कम्युनिस्ट हैं| सत्रह की किशोरावस्था में पार्टी के सदस्य बन गये थे। आज के नवउदारवादी दौर में भी अच्युतानंदन की अक्षुण्ण अवधारणा है कि कम्युनिस्ट को भ्रष्टाचारी नहीं होना चाहिए। पिनरायी विजयन सीबीआई की अदालत में चार अरब रूपये के गबन के मुकदमें में आरोपी रहे थे। प्रकाश करात तथा सीताराम येचुरी विजयन को तरजीह देते हैं क्योंकि सर्वहाराओं की पार्टी को उन्होंने मालामाल बना दिया है। भारी भरकम बैंक बैलेंस, बड़े होटल और मनोरंजन रिसार्ट, कई विशाल भूखण्ड तथा बहुमंजलीय इमारतें, दो टीवी नेटवर्क, बहुसंस्करणीय दैनिक, आलीशान निजी आवासीय बंग्ले आदि के अरबों की सम्पति की स्वामिनी केरल माकपा है। जनसाधारण की ज्वलन्त समस्याओं पर गहन मंथन माकपा सागरतटीय पंचसितारा होटलों में आयोजित करती है। संयोजक विजयन होते हैं। मगर ऐसी सम्पन्नता ने माकपा को विपन्न बना दिया लोकसभा चुनाव में| क्योंकि कई सीटें वह हार गई।

गौरतलब है कि विश्व में मतदान से कम्युनिस्ट कभी भी सत्ता पर नहीं आए। प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री थे ईएमएस नंबूद्रिपाद थे, जो 1957 में केरल में जीते। अमीर ब्राह्मण जमींदार कुटुम्ब के वारिस नम्बूद्रिपाद ने सब तज़कर पार्टी कार्यालय के एक कमरे में ही आधी बाहोंवाली कमीज़ और लुंगी पहनकर पूरा जीवन बिता दिया। उच्चकोटि के पुजारी परिवार में जन्में वे घोर अनीश्वरवादी थे।

एक और माकपाई मुख्यमंत्री हुए श्री ई. के. नयनार जो अपने किस्म के अनूठे थे। उनकी वित्तीय ईमानदारी और मुंहफटपना लाजवाब था।

एक बार की घटना है। हम श्रमजीवी पत्रकार लोग राजधानी तिरुअनन्तपुरम में मुख्यमंत्री निवास गये। उन्हें हमारे IFWJ अधिवेशन में आमंत्रित करना था। उनके समीप ही एक युवक खड़ा था जिसे नयनार डांट रहे थे। इतनी जोर से डांट रहे थे कि हर देखनेवाले को बुरा लगा। जब दुबारा डांटा तो हमने हल्के से प्रतिवाद किया। पूछा कि कारण क्या है? मुख्यमंत्री बोलेः ”मुझसे रूपये मांग रहा है। मैंने कहा कि पहली तारीख को आना दे दूंगा। उस दिन मुझे मेरा वेतन मिलेगा। नहीं मान रहा। आज ही लेने की जिद्द कर रहा है। ये मेरा बेटा है और जेब खर्च लेता है|”

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यहां प्रश्न राजनीतिक ईमानदारी और नैतिकता का है, जिसपर माकपा एकाधिकार का दावा करती है। पार्टी नेतृत्व की हरकतों से माकपा अब पहाड़ के नीचे आ गई है।

क्या वह तस्करी के इस मुद्दे पर अपनी नीयत साफ रखेगी?

दोषी पार्टीजन दण्डित होंगे?

आखिर अन्तःकरण की आवाज को माकपा नेतृत्व सुनेगा ?

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