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देश में पिछड़ो के असली नेता मुलायम सिंह यादव, PM मोदी फर्जी ओबीसी: मायावती

कहते हैं राजनीति में न कोई स्‍थाई दोस्‍त होता है, न दुश्‍मन। यहां सब कुछ सिर्फ सत्‍ता का केंद्र ही होता है, चाहे वह दोस्‍ती हो या फिर दुश्‍मनी। लेकिन जब बात राजनीति की हो तो यह कहावत ज्यादा चरितार्थ हो जाती है।

Dharmendra kumar

Dharmendra kumarBy Dharmendra kumar

Published on 19 April 2019 1:55 PM GMT

देश में पिछड़ो के असली नेता मुलायम सिंह यादव, PM मोदी फर्जी ओबीसी: मायावती
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राजेश कुमार सिंह

कहते हैं राजनीति में न कोई स्‍थाई दोस्‍त होता है, न दुश्‍मन। यहां सब कुछ सिर्फ सत्‍ता का केंद्र ही होता है, चाहे वह दोस्‍ती हो या फिर दुश्‍मनी। लेकिन जब बात राजनीति की हो तो यह कहावत ज्यादा चरितार्थ हो जाती है। जी हां,कभी राजनीति में एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे शुक्रवार को एक ही मंच पर साथ साथ दिखें।करीब 24 साल बाद समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायाम सिंह यादव और बहुजन समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो बहन मायावती ने समाजवादी पार्टी के गढ़ मैनपुरी में एक साथ मंच साझा किया। करीब ढाई दशक पहले मुलायम ने कांशीराम के साथ मंच साझा किया था। शायद ये दिन अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा। इस ऐतिहासिक क्षण में जब धरतीपुत्र के नाम से मशहूर और सियासत के तमाम दांवपेच से वाकिफ मुलायम सिंह यादव मंच पर पहुंचे तो मायावाती ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। लेकिन जब मंच से मुलायम सिंह यादव को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने संयुक्त रैली में मायावती का आभार जताया और ये कहा कि हम और मायावतीजी लंबे समय के बाद एक मंच पर साथ आए है। इसलिए सभी से कहना चाहुंगा कि मायावतीजी का सम्मान करना हम सब उनका एहसास कभी नही भूंल पाएंगे। लेकिन जब बीएसपी सुप्रीमो मायावती जी का बोलने का मौका आया तो उन्होंने ये कहा मुलायम सिंह ही औबीसी के असली और वास्तविक नेता है।वे बीजेपी की तरह नकली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह फर्जी रूप से पिछड़े वर्ग के नेता नही है।

इधर सियासी गलियारों और बुद्धिजीवियों में सबसे ज्‍यादा एक ही बात की चर्चा है कि क्‍या दलित और यादव अपनी शत्रुता को भूला देंगे.......लेकिन रैली में जुटें ऐतिहासिक भीड़ ने ये साबित कर दिया है की चुनाव के नतीजे मिल का पत्थर साबित हो सकता है।हालांकि विश्लेषकों के मुताबिक इस रैली के जरिए मायावती की कोशिश है कि उनके कोर वोटर दलित और समाजवादी पार्टी के कोर वोटर यादव भी अपनी शत्रुता को भूला कर बीजेपी को केंद्र की सत्ता से बाहर करने के लिए साथ आएं।मुलायव सिंह के साथ मंच साझा कर मायावती ने ये संदेश भी देने की कोशिश की गेस्ट हाउस कांड उनके लिए अब बीते दिनो की बात हो गई है।

आखिर क्यों टूटे गेस्ट हाउस कांड के बाद रिश्ते

1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई और 1993 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन को जीत मिली थी और मुलायम सिंह यादव सीएम बने थे। हालांकि, दो ही साल में दोनों पार्टियों के बीच रिश्ते खराब होने लगे। इसी बीच मुलायम सिंह को भनक लग गई कि मायावती बीजेपी के साथ जा सकती हैं।मायावती लखनऊ स्थित गेस्ट हाउस में विधायकों के साथ बैठक कर रहीं थीं। इतने में एसपी के कार्यकर्ता और विधायक वहां पहुंचे और बीएसपी के कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट करने लगे। आरोप है कि मायावती पर भी हमला करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने खुद को एक कमरे में बंद करके खुद को बचा लिया। इस घटना के बाद मायावती ने समर्थन वापस लेने के ऐलान कर दिया। इसके बाद मायावती बीजेपी से समर्थन से सीएम बन गईं।

सीएम बनने के बाद मायावती ने मुलायम सिंह सरकार द्वारा उद्योगपतियों को दिए गए लाइसेंस को निरस्‍त कर दिया। उन्‍होंने कई जांच भी शुरू कर दी। वर्ष 2003 में जब मुलायम सिंह यादव मुख्‍यमंत्री बने तो उन्‍होंने भीमराव अंबेडकर पार्क के निर्माण कार्य को रोक दिया। यही नहीं पार्क की बिजली की सप्‍लाई को भी बंद कर दिया गया। इससे मायावती का ड्रीम प्रॉजेक्‍ट अधर में लटक गया। वर्ष 2007 में मायावती दोबारा जोरदार बहुमत के साथ सत्‍ता में आईं और उन्‍होंने अपने ड्रीम प्रॉजेक्‍ट को बंद करने वाले सभी आदेश वापस ले लिए। मायावती ने मुलायम के काल में भर्ती किए गए 22 हजार पुलिसकर्मियों की भर्ती को भी निरस्‍त कर दिया। उन्‍होंने मुलायम परिवार के सदस्‍यों को पुलिस भर्ती में घोटाले के लिए जेल भेजने की भी धमकी दी। इसके बाद वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान मुलायम सिंह ने प्रण किया था कि वह 'अगर सत्‍ता में आए तो मायावती और कांशीराम समेत सभी दलित नेताओं की मूर्ति और पार्क को बुलडोजर से ढहा देंगे। हालांकि चुनाव के बाद अखिलेश यादव मुख्‍यमंत्री बने और उन्‍होंने कैग, सतर्कता आयोग की तमाम रिपोर्ट के बाद भी मायावती के मंत्रियों के खिलाफ कोई भी ऐक्‍शन लेने से इंकार कर दिया।

अखिलेश ने मायावती की मूर्ति लगवाई

यही नहीं लखनऊ में मायावती की मूर्ति तोड़े जाने के बाद 24 घंटे के अंदर अखिलेश सरकार ने उसे दोबारा लगवा दिया। इससे राज्‍य में दलित-ओबीसी जातियों के बीच संघर्ष होने से रुक गया। इस घटना के कई साल बाद वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव और वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से सबक लेते हुए वर्ष 2018 में मायावती और अखिलेश ने राज्‍य में फूलपुर, गोरखपुर और कैराना के उपचुनाव में बीजेपी को हराने के लिए हाथ मिला लिया। तीनों जगहों पर गठबंधन को जीत मिली। इसी के बाद दोनों के बीच लोकसभा चुनाव में गठबंधन बनाने पर सहमति बनी।

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चौकीदारी की नाटकबाजी भी मोदी को नहीं बचा पाएगी- मायावती

मायावती ने कहा, "नकली पिछड़ा व्यक्ति कभी भी देश भला नहीं कर सकता। नकली पिछड़े लोगों से धोखा खाने की जरूरत नहीं है। असली-नकली कौन है, इसकी पहचान कर ही अपने गठबंधन को कामयाब बनाना है। पिछड़ों के असली नेता मुलायम जी को ही चुनकर भेजना है।'"आजादी के बाद काफी लंबे समय तक देश में ज्यादातर सत्ता कांग्रेस और उसके बाद भाजपा या अन्य पार्टियों के हाथ में रही। भाजपा की संकीर्णवादी, सांप्रदायिक नीतियों की वजह से उनकी सरकार वापस चली जाएगी। उनकी चौकीदारी की नाटकबाजी भी नहीं बचा पाएगी।'"मोदी ने पिछले चुनाव में कई चुनावी वादे किए थे। उन्होंने कहा था कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद विदेशों में जमा काला धन वापस देश के हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख रुपए डाले जाएंगे। क्या किसी को भी ये रुपए मिले?'"कांग्रेस पार्टी क्या कर रही है। वे पूरे देश में घूम-घूमकर कह रहे हैं कि सत्ता में आने के बाद गरीबों को आर्थिक मदद की जाएगी। इस थोड़ी सी आर्थिक मदद से आपका भला नहीं होने वाला। हम गरीबों को स्थायी नौकरी देंगे।''

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हमने दिल्ली पासा लाया-अखिलेश

अखिलेश ने कहा, "आज ऐतिहासिक क्षण है। मायावती ने जनता से अपील की है कि नेताजी को बहुमत से जिताएं। मुझे पूरा भरोसा है कि नेताजी ने जिस तरह से हमें जगाने का काम किया, उन्हें मैनपुरी की जनता ऐतिहासिक मतों से जिताने जा रही है।''"इस देश की खेती और किसान आत्मा है। लोगों के रोजगार खत्म हो गए। यह चुनाव दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यकों के लिए है। हमें नया प्रधानमंत्री बनाना है। जब नया प्रधानमंत्री बनेगा, तभी देश नया बनेगा। भाजपा ने नोटबंदी-जीएसटी लाकर देश को अंधेरे में डाल दिया।''"अगर ग्रामीण जनता का किसी ने विकास हुआ है तो सपा-बसपा की सरकार ने किया है। हमने दिल्ली पास कर दी। क्या आपका फर्ज नहीं कि सपा-बसपा-रालोद के लिए दिल्ली पास लाकर दिखाएं।''हालांकि सभा में माया-मुलायम के अलावा अखिलेश यादव भी मौजूद रहे। लेकिन रालोद प्रमुख अजित सिंह संयुक्त रैली में नजर नहीं आए।

इधर दूसरी ओर मैनपुरी की सभा से पहले महागठबंधन की तीन रैलियां सहारनपुर, बदायूं और आगरा हो चुकी हैं। इनमें से आगरा की रैली में मायावती चुनाव आयोग की रोक के कारण नहीं पहुंची थीं, उनकी जगह उनके भतीजे आकाश आनंद ने सभा को संबोधित किया था। अखिलेश और मायावती आज ही बरेली में भी एक सभा करेंगे।

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गठबंधन की संयुक्त रैलियां

20 अप्रैल को रामपुर और फिरोजाबाद में, 25 अप्रैल कन्नौज, 1 मई को फैजाबाद, 8 मई को आजमगढ़, 13 मई को गोरखपुर में गठबंधन की रैली होंगी। लोकसभा चुनाव के लिए महागबंधन की आखिरी रैली 16 मई को वाराणसी में होगी। गठबंधन की ओर से 11 सीटों के लिए हो रहीं 11 साझा रैलियों में से मैनपुरी, कन्नौज, बदायूं, फिरोजाबाद और आजमगढ़ अभी मुलायम सिंह के परिवार के पास हैं। सहारनपुर और आगरा बसपा के खाते में है।

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