केरल का उल्टा अध्यादेश

केरल की वामपंथी सरकार को हुआ क्या है ? उसने ऐसा अध्यादेश जारी करवा दिया है, जिसे अदालतें तो असंवैधानिक घोषित कर ही देंगी, उस पर अब उसके विपक्षी दलों ने भी हमला बोल दिया है।

CPI

केरल की वामपंथी सरकार पर डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लेख (Photo by social media)

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

नई दिल्ली: केरल की वामपंथी सरकार को हुआ क्या है ? उसने ऐसा अध्यादेश जारी करवा दिया है, जिसे अदालतें तो असंवैधानिक घोषित कर ही देंगी, उस पर अब उसके विपक्षी दलों ने भी हमला बोल दिया है। इस अध्यादेश का उद्देश्य यह बताया गया है कि इससे महिलाओं और बच्चों पर होनेवाले शाब्दिक हमलों से उन्हें बचाया जा सकेगा। केरल पुलिस एक्ट की इस धारा 118 (ए) के अनुसार उस व्यक्ति को तीन साल की जेल या 10 हजार रु. जुर्माना या दोनों होंगे, ”जो किसी व्यक्ति या समूह को धमकाएगा, गालियां देगा, शर्मिंदा या बदनाम करेगा।” इस तरह के, बल्कि इससे भी कमजोर कानून को 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। वह 2000 में बने सूचना तकनीक कानून की धारा 66 ए थी।

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अदालत ने उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध माना था

अदालत ने उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध माना था। केरल के इस अध्यादेश में तो किसी खबर या लेख या बहस के जरिए यदि किसी के प्रति कोई गलतफहमी फैलती है या उसे मानसिक कष्ट होता है तो उसी आरोप में पुलिस उसे सीधे गिरफ्तार कर सकती है। पुलिस को इतने अधिकार दे दिए गए हैं कि वह किसी शिकायत या रपट के बिना भी किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। क्या केरल में अब रुस का स्तालिन-राज या चीन का माओ-राज कायम होगा ? जाहिर है कि यह अध्यादेश बिना सोचे-समझे जारी किया गया है।

संघीय कानून के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में भी चली गई थी

बिल्कुल इसी तरह का गैर-जिम्मेदाराना काम केरल की वामपंथी सरकार ने ‘नागरिकता संशोधन कानून’ के विरुद्ध विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके किया था। वह संघीय कानून के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में भी चली गई थी। देश की दक्षिणपंथी सरकारों पर जिस संकीर्णता का आरोप हमारे वामपंथी लगाते हैं, वैसे ही और उससे कहीं ज्यादा संकीर्णता अब वे खुद भी दिखा रहे हैं। केरल की कम्युनिस्ट सरकार इस कानून के सहारे अनेक पत्रकारों, लेखकों और विपक्षी नेताओं को डराने और कठघरों में खड़ा करने का काम करेगी। आश्चर्य तो इस बात का है कि आरिफ मोहम्मद खान जैसे राज्यपाल ने, जो अनुभवी राजनीतिज्ञ और कानून के पंडित हैं, ऐसे अध्यादेश पर दस्तखत कैसे कर दिए ?

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उन्होंने पहले भी राज्य सरकार को कुछ गलत पहल करने से रोका था और इस अध्यादेश को भी वे लगभग डेढ़ माह तक रोके रहे लेकिन केरल या केंद्र के सभी वामपंथी और विपक्षी नेताओं ने भी मुंह पर पट्टी बांधे रखी तो उन्होंने भी सोचा होगा कि वे अपने सिर बल क्यों मोल लें ? उनके दस्तखत करते ही कांग्रेसी और भाजपा नेताओं तथा देश के बड़े अखबारों ने इस अध्यादेश की धज्जियां उड़ाना शुरु कर दीं। इसके पहले कि सर्वोच्च न्याालय इसे रद्द कर दे, केरल सरकार इसे अपनी मौत मर जाने दे तो बिल्कुल सही होगा।

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