मछली को नहीं होती बंधन की चाह

फ़ेसबुक विश्वविद्यालय के ज्ञान में यह पढ़ा कि तैरती हुई मछलियों को गौर से देखते रहने से हृदय की गति पर नियंत्रण होता है। हालाँकि फ़ेसबुक विश्वविद्यालय के ज्ञान पर हमें विश्वास नहीं हो पाता ।

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मछली पालन पर योगेश मिश्रा का लेख

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योगेश मिश्रा

लखनऊ: बहुत दिन हुए हमें मछली पालने का विचार आया। मेरे दोस्त डॉ. राजेश जैन जी के यहाँ जाकर मैं एक्वेरियम में भागती, दौड़ती , ठहरी मछलियों को देखता था। सतीश महाना जी के कानपुर वाले घर गया, जो उनके यहाँ बहुत बड़े एक्वेरियम में मछलियाँ तालाब की मानिंद कूद रही थी। तीन चार साल पहले मछलियों को लेकर मेरे मन में अद्भुत आकर्षण था। फ़ेसबुक विश्वविद्यालय के ज्ञान में यह पढ़ा कि तैरती हुई मछलियों को गौर से देखते रहने से हृदय की गति पर नियंत्रण होता है। हालाँकि फ़ेसबुक विश्वविद्यालय के ज्ञान पर हमें विश्वास नहीं हो पाता । पर मानव मन की भी अपनी अलग तरह की कमज़ोरी होती है। बहुत जतन के बाद भी मैं इससे अपने को अलग नहीं कर सका।

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लिहाज़ा जो बात कहीं भी मन वाली दिखती है

लिहाज़ा जो बात कहीं भी मन वाली दिखती है। उसे पकड़ कर रख लेता हूँ। फ़ेसबुक विश्वविद्यालय के इस अविश्वसनीय ज्ञान में भी मैंने विश्वास ढूँढ लिया। लिहाज़ा घर में। मछली पालने को लेकर लोकतांत्रिक सहमति बनाने में लग गया। सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव घरेलू लोकतांत्रिक मोर्चे पर स्वीकार हो गया। डॉ. जैन जी ने हमें एक्वेरियम गिफ़्ट किया। वह चीन का था। पर चार साल पहले चीनी उत्पादों के प्रति मेरे में कोई वितृष्णा का भाव नहीं था। हालाँकि आज है। अब मैंने चीन में बने उत्पाद ख़रीदना बंद कर दिया है।

बाज़ार से छोटी मछलियाँ अरविंद लेकर आये

बाज़ार से छोटी मछलियाँ अरविंद लेकर आये। प्लास्टिक की थैली में पानी भर कर पाँच मछलियाँ आईं। सच नहीं जानता पर कहा जाता है कि रंगीन मछलियों के बीच एक काली मछली भी पालना चाहिए । मछलियों को दाना देने का काम मेरी माँ ने सँभाला। उनके रख रखाव की ज़िम्मेदारी अरविंद व संतोष के कंधे पर आनी थी। सो आ ही गयी। क्योंकि मेरे कार्यालयी छोड़ सभी कामों की ज़िम्मेदारी इन्हीं दोनों की होती है। जब मछली मेरी पहल से आयी हो तो उसका काम भी मेरे हिस्से आना था।

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pisciculture (PC: social media)

मेरा तो कुछ ही दिन में मछलियों से मन भर गया

मेरा तो कुछ ही दिन में मछलियों से मन भर गया। कभी कभी ड्राइंग रूम में बैठा रहा तब उन्हें देख लिया करता था। पर मैंने बहुत बार महसूस किया कि मौन के पलों में एक्वेरियम से निकलने वाली आवाज़ कितनी भारी पड़ती है। कुछ महीनों में ही एक मछली मर गयी। मरी हुई मछली देख मेरी बेटी बिफर पड़ा। वह एक्वेरियम हटाने की ज़िद करने लगी। उसे शांत कराने के बाद यह तय किया गया कि मछली के मरने जानकारी बेटी को न हो पाये। वह मछलियों की संख्या ही गिनती थी। हम लोगों ने संख्या बराबर एक सा बनाये रखने के फ़ार्मूले पर काम शुरू कर दिया।

कोरोना काल में जब हम लोग लॉकडाउन के दौर में घरों में बंद रहे

कोरोना काल में जब हम लोग लॉकडाउन के दौर में घरों में बंद रहे। दुबके रहे। तो हमें घर काटने को दौड़ता था। ऐसा नहीं कि घर के लोग रोज़ बाहर निकलते हों। पर न निकलने की बंदिश ने परेशान करना शुरू कर दिया।

मछली के घर में आने के बाद हमने मछली जल की है रानी….. से लेकर मछलियों की दुनिया के बारे में ख़ूब पढा। पढ़ा कि दुनिया में मछलियों की कम से कम 28,500 प्रजातियाँ पाई जाती हैं , जिन्हें अलग-अलग स्थानों पर 2,18,000 भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है।अभी भी 15,000 से अधिक मछली प्रजातियां हो सकती हैं जिन्हें अभी तक पहचाना नहीं गया है।

45 करोड़ से अधिक वर्षों से धरती पर रह रही हैं

मछलियाँ 45 करोड़ से अधिक वर्षों से धरती पर रह रही हैं। सभी मछली प्रजातियों में से 40 फ़ीसद ताजा पानी में रहती हैं। मछली की कुछ प्रजातियां उड़ सकती हैं (ग्लाइड) अन्य सतह को छोड़ सकती हैं। कुछ मछलियां चट्टान पर भी चढ़ सकती हैं। औसतन, एक फ्लाइंग फ़िश 160 फीट (50 मीटर) ग्लाइड कर सकती है, लेकिन उन्हें 660 फीट (200 मीटर) तक ग्लाइड करने के लिए जाना जाता है। और वे 19 फ़ीट (6 मीटर) ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं। मछली के पास एक विशेष अंग होता है , जिसे लेटरल लाइन कहा जाता है जो रडार की तरह काम करता है, जो उन्हें अंधेरे या धुंधले पानी में नेविगेट करने में मदद करता है।

सबसे बड़ी मछली व्हेल शार्क है जो लंबाई में पचास फीट तक होती है

सबसे बड़ी मछली व्हेल शार्क है जो लंबाई में पचास फीट तक होती है। व्हेल शार्क दुनिया की सबसे बड़ी मछली है। इसकी लंम्बाई दो स्कूल बसों जितनी बढ़ जाती है। इसका वजन लगभग 25,000 किलो होता है और यह मुख्य रूप से प्लवक खाती है। प्लवक खारे पानी में उगने वाली वनस्पती होती है।

व्हेल शार्क के लगभग 4,000 दांत होते हैं जो मात्र 3 मिलीमीटर आकार के होते हैं। शार्क ही एक ऐसी मछली है जिसकी पलकें होती हैं। एक ब्लू व्हेल मछली लगभग 6 महीने तक बिना कुछ खाये रह सकती है। ज्यादातर मछलियों में उनमें थोड़ा नमक होता है। हालांकि शार्क का मांस उतना ही नमकीन होता है जितना नमकीन समुद्र होता है।

सबसे छोटी मछली फिलीपीन गोबी है

सबसे छोटी मछली फिलीपीन गोबी है जो पूरी तरह से 1/3 इंच से भी कम होती है।मछली की कुछ प्रजातियों में केवल कार्टिलेज के बने कंकाल होते हैं। मछली में दृष्टि, स्पर्श, स्वाद की उत्कृष्ट इंद्रियां होती हैं। कई मछलियों में गंध और ‘सुनने’ की अच्छी शक्ति होती है। मछली भी दर्द महसूस करती है। स्तनधारियों और पक्षियों और मनुष्य की तरह सामना करती है।

कई वर्षों तक लंगफिश पानी से बाहर रह सकती है। इनमे गिल्स और फेफड़े दोनों होते हैं।कुछ मछलियां, जैसे कि सफेद शार्क, अपने शरीर के तापमान को बढ़ा सकती हैं। इससे उन्हें ठंडे पानी में शिकार करने में मदद मिलती है।सबसे ज्यादा उम्र की एक ऑस्ट्रेलियाई लंगफिश थी। 2003 में, यह 65 वर्ष की थी।

एक दूसरे को संदेश व्यक्त करने के लिए मछली विभिन्न प्रकार की कम-पिच वाली आवाज़ों का उपयोग करती हैं। हालांकि, मछली में वोकल कॉर्ड्स नहीं होते हैं। वे इसके लिए अपने शरीर के अन्य हिस्सों का उपयोग करती हैं। चूंकि एक मछली के जबड़े अपनी खोपड़ी से जुड़ा नहीं होता है, इसलिए कई मछलियां शिकार में अपने मुंह का भी इस्तेमाल करती है

कुछ मछली जैसे सफ़ेद शार्क बच्चे को जन्म देती है

ज्यादातर मछलियाँ अण्डे देती हैं लेकिन कुछ मछली जैसे सफ़ेद शार्क बच्चे को जन्म देती है।बॉक्स जेलीफिश को दुनिया की सबसे खतरनाक मछली कहा जाता है। इस मछली का जहर किसी भी मनुष्य के अंदर चला जाए तो उसकी तुरंत मौत हो सकती है। इलेक्ट्रिक ईल नाम की मछली में इतना करेंट होता है उससे एक इंसान की मौत तक हो सकती है।

इलेक्ट्रिक ईल और इलेक्ट्रिक रेज़ में घोड़े को मारने के लिए पर्याप्त बिजली होती है।

दुनिया में सबसे जहरीली मछली स्टोन फिश है। इसके काटने से सदमे, पक्षाघात, और यहां तक कि मृत्यु भी हो सकती है अगर कुछ घंटों के भीतर इलाज नहीं किया जाता है। बैटफिश एक अनोखी मछली है। इसे जब भी खतरे का आभास होता है ये बिलकुल गतिहीन हो जाती है। इस दौरान ये एक बहते हुए पत्ते की तरह नजर आती है। सेलफिश मछली दुनिया की सबसे तेज मछली है। ये सौ किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से तैर सकती है। फंगटूथ मछली केवल कुछ इंच ही लंबी होती है, लेकिन इसमें मनुष्यों के आकार के दांत होते हैं।

मछली पीछे की ओर तैर नहीं सकती हैं

ज्यादातर मछली पीछे की ओर तैर नहीं सकती हैं। जो तैर सकती हैं मुख्य रूप से ईल परिवार के सदस्य हो सकते हैं। सीहोरस एकमात्र मछली है जो सीधे तैरती है। मछलियां अपनी आंखें कभी बंद नहीं करती है। वे सोते समय भी अपनी आंखें खोल कर रखती है। मछलियां अपने अंदर का तापमान अपने आसपास के वातावरण अनुसार बदल लेती है। इसी वजह से इन्हें ठंडे खून वाले प्राणी भी कहा जाता है।

डॉल्फिन भारत की राष्ट्रीय मछली है

डॉल्फिन भारत की राष्ट्रीय मछली है। डॉल्फिन को दुनिया की सबसे प्यारी मछली भी कहा जाता है। डॉल्फिन पांच से आठ मिनट तक अपनी सांस रोक कर रख सकती है।

मछलियों के झुंड में जो मछली मध्य में होती है वही पूरे झुंड़ को नियंत्रण में रखती है। बाकी की मछलियां मध्य की मछली के निर्देश अनुसार चलती हैं। कुछ मछलियां, जैसे कि हेरबिवोर्स मछली(ग्रेज़र्स) में अक्सर जबड़े के दांतों की कमी होती है। लेकिन दांतों की तरह पीसने वाली मिलों को उनके गले में फारेनजील दांत कहा जाता है।अधिकांश मछलियों में अपने शरीर पर टेस्ट बड्स होती हैं।

साल्टवाटर मछली को ताजे पानी की मछली से ज्यादा पानी पीना पड़ता है

साल्टवाटर मछली को ताजे पानी की मछली से ज्यादा पानी पीना पड़ता है। चूंकि समुद्री जल एक मछली के शरीर में तरल पदार्थ की तुलना में नमकीन है, इसलिए मछली के अंदर पानी लगातार बहता रहता है। अगर वे खोए हुए पानी को बदलने के लिए ज्यादा पानी नहीं पीते हैं, तो खारे पानी की मछली की तरह ही वो भी सूख जाएंगी।अब तक का सबसे पुराना फिशहूक लगभग 42,000 साल पहले देखा गया था।

लिपस्टिक के अधिकांश ब्रांडों में फिश स्केल्स होते हैं।अधिकांश मछली को हम रंग में देख सकते हैं और खुद को छिपाने के लिए वह रंगों का उपयोग कर सकती हैं।कुछ मछली ध्रुवीकृत और पराबैंगनी प्रकाश देख सकती हैं।

पानी में मछली डूब सकती है। मनुष्यों की तरह, मछली को ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, इसलिए यदि पानी में पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं है, तो वो भी मर जाएंगी।

मछलियों के बारे इतने महत्वपूर्ण ज्ञान हमें एक्यूरियम आने के बाद हासिल हुए

मछलियों के बारे इतने महत्वपूर्ण ज्ञान हमें एक्यूरियम आने के बाद हासिल हुए। इन सारी जानकारी के बाद मछलियों के संसार के प्रति मेरा खिंचाव पहले से ज़्यादा हो गया। मैंने उनका ख़्याल रखना शुरू कर दिया।पर लाकडाउन के समय जब पूरे परिवार को घर में रहने की मजबूरी जीनी पड़ी तब मेरी पत्नी ने कहा कि मछलियों को छोटे से एक्वेरियम में कितनी दिक़्क़त होती होगी।

इन्हें तालाब व नदियों में रहना चाहिए । इन्हें भी एक्वेरियम की सीमा में बांध कर के हमने रखा है।इन्हें। दिक़्क़त होती तो होगी ही। पत्नी की यह बात मेरी समझ में में। आई। मेरे गहरे तक उतर गयी। सोचा मछलियों को वापस दुकानदार को दे दूँ। पर क्षणभर में ख़्याल आया कि वह किसी दूसरे को बेच देगा।

Aquarium
Aquarium (PC: social media)

एक्वेरियम में रहने की बंदिश इन्हें झेलनी पड़ेगी

फिर किसी दूसरे आकार प्रकार के एक्वेरियम में रहने की बंदिश इन्हें झेलनी पड़ेगी। फिर सोचा इन्हें गोमती के पानी में डाल दूँ। लेकिन इस बारे में देवेंद्र भट्ट ने जैसा बताया उसने मेरे को इस फ़ैसले को पलटने को मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा से मछलियाँ हमारे यहाँ की नदियों में नहीं पायी जाती हैं। हमारे यहाँ की नदी में डालते ही बड़ी मछली इन छोटी मछलियों को खा जायेंगी।

लिहाज़ एक हफ़्ते तक पूरे परिवार सहित हम सोचने लगे इन मछलियों का किया क्या जाये। हमें समय समय पर ज्योतिषीय सलाह देने वाले सुषैन निगम से मैंने संपर्क साधा। उसने कहा कि आप गोमती में उन्हें डाल दें। डालते समय यह ज़रूर कह दें कि मैं आप सब को आपकी दुनिया में वापस भेज रहा हूँ। हमारे सामने भी कोई रास्ता नहीं था।

एक दिन बाल्टी में सभी मछलियों को अरविंद पानी में डालकर लाये

सुषैन की बात मान लेने के सिवाय। एक दिन बाल्टी में सभी मछलियों को अरविंद पानी में डालकर लाये । मैं ऑफिस से घनश्याम भट्ट के साथ गोमती तट पर खाटूं श्याम मंदिर के क़रीब उतर कर उन्हें गोमती माता के हवाले कर आया। बाद के कई दिन जहां मैंने मछलियों को गोमती में उतारा था, वहां मैं उनके लिए कुछ न कुछ डाल आया करता था।

पर यह सिलसिला भी बंदरों गया। अब जब मछलियाँ मेरे घर और मेरे एक्वेरियम में नहीं हैं तब वो बहुत याद आती हैं। जब किसी के घर में एक्वेरियम में मछली देखता हूँ तो भगवान से मन ही मन प्रार्थना करता हूँ कि इन मछलियों को भी बंधन से मुक्ति मिले।

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विचार मेरी पत्नी के मन में भरा वैसा ही सब के मन में आये

जैसा विचार मेरी पत्नी के मन में भरा वैसा ही सब के मन में आये। मैंने बहुत पहले बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक कविता मछलियों को लेकर पढ़ी थी- ”एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली को बंधन की चाह हो।” पर जब मैंने घर की मछलियों को गोमती में उतारा और वह तेज़ी से न जाने कहाँ ग़ायब हो गयी। तब मेरी समझ में इतना तो आ ही गया कि किसी मछली को बंधन की चाह नहीं होती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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