हरियाणा में भाजपा से पार पाना आसान नहीं, यहां जानें क्यों?

हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए सभी दलों की सेनाएं सज गई हैं। 21 अक्टूबर को होने वाले मतदान के लिए सभी दलों ने ताकत झोंक दी है। हालांकि इस मामले में भाजपा सबसे आगे दिख रही है।

अंशुमान तिवारी
चंडीगढ़: हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए सभी दलों की सेनाएं सज गई हैं। 21 अक्टूबर को होने वाले मतदान के लिए सभी दलों ने ताकत झोंक दी है। हालांकि इस मामले में भाजपा सबसे आगे दिख रही है।

भाजपा ने चुनाव तारीखों का ऐलान होने से पहले ही मतदाताओं से संपर्क साधना शुरू कर दिया था। भाजपा के ‘अबकी बार 75 पार’ के नारे का गणित भी बहुत गहरा है।

पार्टी ने चुनावों से कई माह पूर्व ही आपरेशन-75 की तैयारी शुरू कर दी थी। इस कारण भाजपा से पार पाना आसान नहीं है। लक्ष्य हासिल करने के लिए एक साथ कई चरणों की कार्ययोजना पर अमल किया गया।

गुटबाजी से जूझ रही कांग्रेस के सामने इस बार भाजपा को सत्ता से बेदखल करने का मुश्किल लक्ष्य है। इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के सामने इस बार अपने अस्तित्व को बचाने की चुनौती है। इनेलो से अलग होकर पूर्व सांसद दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व में बनी पार्टी जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) को भी अपना दमखम दिखाना है।

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भाजपा ने झोंकी पूरी ताकत

चुनाव नजदीक आने के साथ ही भाजपा के केन्द्रीय व राज्यस्तरीय नेता पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं। भाजपा के शीर्ष नेता पीएम नरेन्द्र मोदी जल्द ही हरियाणा के चुनाव प्रचार में कूदेंगे। भाजपा ने मोदी की चार बड़ी रैलियां कराने का फैसला किया है।

पार्टी का मानना है कि मोदी की रैलियों से पार्टी उम्मीदवारों की स्थिति और मजबूत होगी। पार्टी के दूसरे शीर्ष नेता अमित शाह भी चुनाव प्रचार में पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं।

उन्होंने हरियाणा की रैलियों में मुख्य रूप से कांग्रेस पर हमला बोला। उन्होंने राफेल मामले को लेकर कांग्रेस पर जमकर वार किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा विजयादशमी के मौके पर फ्रांस में राफेल लड़ाकू विमान का पूजन बर्दाश्त नहीं हुआ।

इस पार्टी को बस विरोध करना आता है, चाहे वह राफेल हो या अनुच्छेद 370 को हटाने का मामला। शाह ने कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि किसानों की भूमि हरियाणा में भाजपा 75 पार के लक्ष्य के साथ फिर सरकार बनाएगी।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस की तीन पीढिय़ा बदलीं मगर कांग्रेस सरकारें जम्मू-कश्मीर से अनुुच्छेद 370 नहीं हटा पाईं। मोदी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले इसे हटा दिया।

भाजपा की सोची-समझी रणनीति

भाजपा ने अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए विशेष रणनीति पर काम किया है। सबसे बड़ी रणनीति थी एक-एक करके भाजपा विरोधी दमदार चेहरों को अपना बनाना। भाजपा की पहली रणनीति थी चुनाव लडऩे के इच्छुक भाजपा विरोधी चेहरों को टिकट का आश्वासन दिए बिना ही अपने पाले में लाना।

दूसरी रणनीति प्रदेश के उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना जहां पर भाजपा का अपना चेहरा कमजोर था। ऐसे क्षेत्र नेशनल हाईवे नंबर-9 से सटे जिलों में अधिक है जहां वर्ष 2014 में भाजपा कमजोर रही थी।

भाजपा की तीसरी रणनीति थी चुनाव लडऩे के इच्छुक नए राजनीतिक खिलाडिय़ों को अपने पाले में लाना। इसके पीछे सोच चुनाव से पहले ही विपक्ष को कमजोर करने और खुद को मजबूत करने की थी। पार्टी की चौथी रणनीति उन सीटों पर ध्यान देने की रही जहां पर पार्टी का खुध का विधायक नहीं था।

भाजपा ने पहले इन सीटों पर मौजूदा विधायक को अपना बनाने का प्रयास किया। जहां पर मामला फंसा वहां पर दूसरे व तीसरे सबसे अधिक सशक्त चेहरों को भाजपाई बनाया गया। यह काम लोकसभा चुनाव से पहले से चल रहा था। इससे समझा जा सकता है कि भाजपा चुनावों को लेकर पहले से ही कितना गंभीर थी।

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सीएम मनोहरलाल जीत के प्रति आश्वस्त

राज्य में पांच साल तक भाजपा सरकार का नेतृत्व करने वाले मुख्यमंत्री मनोहरलाल जीत के प्रति आश्वस्त हैंं। उनका कहना है कि राज्य में भाजपा सब पर भारी है। इस बार दलों के बीच मुकाबला नहीं है। बस कुछ सीटों पर उम्मीदवारों में टक्कर है।

वैसे उनका यह भी कहना है कि मैं नहीं चाहता कि विपक्ष का पूरी तरह से सफाया हो। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष का होना जरूरी है। उनका कहना है कि कांग्रेस अपनी गलतियों की सजा भुगत रही है।

उन्होंने माना कि हरियाणा में भाजपा का मुकाबला किसी दल विशेष से नहीं बल्कि कुछ सीटों पर विधानसभावार उम्मीदवारों के साथ है। हालांकि ऐसे उम्मीदवारों की संख्या भी  अंगुली पर गिनने लायक ही है।

गुटबाजी से जूझ रही कांग्रेस

दूसरी ओर कांग्रेस अपनी ही पार्टी में गुटबाजी से जूझ रही है। भाजपा के सामने मुख्य तौर पर विपक्षी दल कांग्रेस की चुनौती है। पार्टी को मोदी-मनोहर मैजिक के सामने अपना चमत्कार दिखाना है।

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश प्रधान डॉ. अशोक तंवर के इस्तीफे से पार्टी को गहरा झटका लगा है। हालांकि हरियाणा कांग्रेस की अध्यक्ष कुमारी शैलजा का कहना है कि तंवर का चैप्टर अब खत्म हो गया है।

कांग्रेस के टिकट वितरण में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा और प्रदेश अध्यक्ष कुमारी शैलजा की ही चली है। इससे प्रदेश भर में तमाम सीटों पर पार्टी के कई बागी उम्मीदवार भी चुनाव मैदान में हैं। ये बागी उम्मीदवार कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवारों के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं।

हालांकि शैलजा इससे सहमत नहीं हैं। वे कहती हैं कि लोग बेरोजगारी, महिलाओं के साथ आपराधिक घटनाओं से त्रस्त हैं। धरातल पर कुछ काम नहीं हुआ है। सिर्फ जुमलेबाजी से इस बार वोट नहीं मिलने वाला।

उन्होंने सवाल किया क्या अनुच्छेद 370 का इश्यू हरियाणा के बेरोजगार युवाओं को अपराध और नशे की आदत से अलग करने से भी ज्यादा बड़ा है?

बगावत करने वाले सर्वाधिक कांग्रेसी

टिकट नहीं मिलने पर बगावत कर मैदान में उतरने वाले उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा कांग्रेसी हैं। इनमें अंबाला कैंट में चित्रा सरवारा, अंबाला सिटी में निर्मल सिंह, सफीदों में कर्मवीर सैनी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं।

इसके अलावा कांग्रेस से बागी हुए नरेश सेलवाल उकलाना, रामनिवास घोड़ेला बरवाला और रणजीत सिंह रानियां से लड़ रहे हैं। पार्टी से बगावत कर जहां देवेंद्र बबली टोहना, सतपाल सांगवान दादरी और ईश्वर सिंह गुहला से जननायक जनता पार्टी (जजपा) के टिकट पर मैदान में उतरे हैं, वहीं दूडा राम भाजपा के टिकट से फतेहाबाद से लड़ रहे हैं ।

में आने वाले चारों निर्दलीय नहीं माने

भाजपा से बगावत कर मैदान में उतरने वाले ज्यादातर उम्मीदवारों को पार्टी ने मना लिया है। लेकिन रेवाड़ी सीट से बतौर आजाद  उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे रणधीर सिंह कापड़ीवास ने मैदान से हटने से मना कर दिया है।

पिछले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीते चार विधायक दिनेश कौशिक, जसबीर देशवाल, रविंद्र मछरौली और रईस खान भाजपा में शामिल हो गए थे, लेकिन टिकट न मिलने से खफा दिनेश कौशिक पुंडरी, रविंद्र मछरौली समालखा, जसबीर देसवाल सफीदों और रईस खान पुन्हाना से फिर निर्दलीय लड़ रहे हैं। भाजपा नेताओं की तरफ से चुनाव से हट जाने के अनुरोध को इन चारों ने ठुकरा दिया है।

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इस बार 1168 प्रत्याशी मैदान में

इस बार हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों पर 1168 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे हैं। आंकड़े बताते हैं कि पहले चुनाव में जहां 471 उमीदवारों ने चुनाव मैदान में ताल ठोकी, वहीं 1996 के चुनावों में यह आंकड़ा अब तक का सबसे ज्यादा रहा।

1996 के विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक 2515 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे। पिछले 2014 के विधानसभा चुनाव में 1235 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे थे और इस तरह इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले कम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे हैं।

हरियाणा के जितने भी विधानसभा चुनाव हुए, उनमें पहले तीन चुनावों में एक हजार प्रत्याशी भी चुनाव मैदान में नहीं उतरे। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ते गए, उसी तरह विधायक बनने का सपना संजोने वालों की संख्या भी बढ़ी है।

किसी चुनाव में कम तो किसी में ज्यादा रही है, लेकिन लोग राजनीति में अपनी किस्मत आजमाने के लिए पीछे नहीं रहे हैं। अब 2019 के विधानसभा चुनावों में भी 1168 उम्मीदवारों ने विधायक बनने का सपना संजोया है।

हिसार में सर्वाधिक प्रत्याशी

किन-किन प्रत्याशियों का इस बार विधायक बनने का सपना पूरा होगा यह तस्वीर 24 अक्टूबर को होने वाली मतगणना से साफ होगी। राज्य के संयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. इंद्रजीत के मुताबिक सबसे ज्यादा 118 उम्मीदवार हिसार और सबसे कम 27 उम्मीदवार दादरी जिले में चुनाव लड़ रहे हैं। इसके अलावा सोनीपत जिले में 72, भिवानी जिले में 71 और फरीदाबाद जिले में 69 उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं ।

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