चाचा- भतीजे की राजनीति में कभी ‘चाचा’ तो कभी ‘भतीजा’ पड़ा भारी

आजादी के बाद से ही देश की राजनीति में विरासत का जो दौर शुरू हुआ उसमें पिता-पुत्र से लेकर पिता-पुत्री, ससुर-दामाद से लेकर बहू-सास तक शामिल रहे है। पर इन दिनों महाराष्ट्र की राजनीतिं चाचा शरद पवार और भतीजे अजीत पवार को लेकर सुखियों में है।

Published by Aditya Mishra Published: November 28, 2019 | 9:13 pm
Modified: November 28, 2019 | 9:46 pm

श्रीधर अग्निहोत्री

श्रीधर अग्निहोत्री

लखनऊ:  आजादी के बाद से ही देश की राजनीति में विरासत का जो दौर शुरू हुआ उसमें पिता-पुत्र से लेकर पिता-पुत्री, ससुर-दामाद से लेकर बहू-सास तक शामिल रहे है। पर इन दिनों महाराष्ट्र की राजनीतिं चाचा शरद पवार और भतीजे अजीत पवार को लेकर सुखियों में है।

चाचा भतीजे की राजनीति में कौन किस पर भारी है इस बात पर बहस तो हो सकती है लेकिन चाचा भतीजे की इस राजनीति मेंं एक बात जरूर सामने निकलकर आई है कि चाचा भतीजे की राजनीति में भाजपा के रणनीतिकार चारों खाने चित्त हो गए हैं।

यह पहला मौका नहीं है इससे ठीक पहले हरियाणा में भी इसी तरह का कारनामा एक भतीजे ने किया जिसने अपने चाचा अभय चौटाला की परवाह किए बिना अपना दल बनाया और हरियाणा की मौजूद सरकार में डिप्टी सीएम बने बैठे है नाम है दुष्यंत चौटाला।

चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने भाजपा को समर्थन देकर देवेन्द्र फडऩवीस की सरकार बनवाई। लेकिन यह सरकार चंद दिनों की रही।

अजित पवार ने भाजपा नेतृत्व को भरोसा दिलाया था कि एनसीपी के काफी विधायक उनके साथ है लेकिन उनका यह दावा तब खोखला निकला जब शरद पवार की बुलाई बैठक में एनसीपी के सारे विधायक पहुंच गए।

हालांकि इससे पहले अजित पवार ने ही चाचा को गच्चा देकर डिप्टी सीएम तो बन गए लेकिन बहुमत के अभाव और परिवार के दबाव में वे इस्तीफा देकर वापस आ गए। अजित पवार का पैतरा काम नहीं आया।

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शिवपाल सिंह यादव-अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश की सियासत में चाचा भतीजे की आपसी जंग ने पार्टी सहित पूरे कुनबे को कहीं न रखा। २०१७ के विधानसभा चुनाव से 2016 में समाजवादी पार्टी में वर्चस्व की जंग को लेकर कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव में वर्चस्व की जंग को लेकर बात इतनी बढ़ी कि सीएम रहते हुए उन्हे अपने मंत्रिमंडल से भी बर्खास्त कर दिया।

यह पहला मौका था जब यादव परिवार में किसी वरिष्ठ सदस्य को इस पहले संगठन से फिर सरकार से बेदखल किया गया। बात इतनी बढ़ी कि समावादी पार्टी दो फाड़ हुई। नाराज शिवपाल ने अलग पार्टी बना ली नाम दिया प्रगतिशील समाज पार्टी(लोहिया)।

इस साल हुए चुनाव में प्रसपा ने चुनाव भी लड़ा लेकिन एक भी सीट न मिलने के बाद अब दोनों तरफ से एकजुटता के प्रयास हो रहे है। यादव कुनबे की आपसी कलह के चलते ही पहले विधानसभा फिर लोकसभा के चुनाव में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा।

 

अभय चौटाला-दुष्यंत चौटाला

हरियाणा की सियासत में देवीलाल परिवार का खासा दखल रहा है। लेकिन यहां भी आपसी कलह ने सब कुछ तीन तेरह कर दिया है। देवीलाल के पुत्र ओमप्रकाश चौटाला भी सीएम हुए जो इस समय अपने पुत्र अजय चौटाला के साथ भ्रष्टड्ढाचार के एक मामलें में जेल में है।

अजय चौटाला और स्वयं जेल में होने के कारण पार्टी की कमान ओमप्राकाश चौटाला ने अपने दूसरे पुत्र अभय चौटाला को दे रखी है। यहां भी चाचा भतीजे की नहीं बनी तो अजय चौटाला के पुत्र और अभय चौटाला के भतीजे दुष्यंत चौटाला ने जननायक जनता पार्टी का गठन किया और दस विधायक जितवाकर इस समय खट्टड्ढर सरकार में डिप्टी सीएम बने हुए है।

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प्रकाश सिंह बादल-मनप्रीत बादल

पंजाब की सियासत में बादल का एक लंबे समय तक खासा दबदबा रहा है। अकाली दल के मुखिया प्रकाश सिंह बादल जहां कई बार पंजाब के सीएम रहे तो उनके पुत्र सुखबीर बादल वहां के डिप्टी सीएम रहे और उनकी पत्नी हरसिमरत कौर जो इस समय मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री है। प्रकाश सिंह बादल के परिवार में भी खासी कलह रही।

जिसका नतीजा यह रहा कि उनके भतीजे मनप्रीत बादल की जब राजनीति आकांक्षाएं पूरी नहीं हुयी तो उन्होंने भी बगावत कर पंजाब पीपुल पार्टी का गठन कर लिया। अपनी उपेक्षा से आहत होने के बाद उन्होंने जो पार्टी बनाई उसे ज्यादा दिन चला नही पाएं तो अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया। हालांकि उन्होंने अपनी बागी तेवरों से अकाली दल को ज्यादा प्रभावित तो नहीं किया लेकिन कांग्रेस में अपना ठीहा जरूर बना लिया।

गोपीनाथ मुंडे-धनंजय मुंडे

भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता और महाराष्टड्ढ की भाजपा शिवसेना गठबंधन सरकार में डिप्टी सीएम रहे गोपी नाथ मुंडे(दिवंगत) वर्ष 2009 में जब बीड से विजयी हुए तो ज्यादातर लोगों ने सोचा कि विधानसभा चुनाव में वह अपने भतीजे धनंजय मुंडे को उतारेंगे।

लेकिन इसकी जगह उन्होंने अपनी बेटी पंकजा मुंडे को परली सीट से मैदान में उतारा। इससे चाचा-भतीजे के बीच मनभेद और गहरा गया तथा धनंजय मुंडे राकांपा में शामिल हो गए। बाद में वह विधान परिषद में नेता विपक्ष बने।

गोपीनाथ मुंडे के निधन के बाद पारिवारिक प्रतिद्वंद्विता अकसर सुर्खियों में आती रही। 2014 में पंकजा मुंडे ने परली से अपने चचेरे भाई को हरा दिया। वहीं 2019 में धनंजय मुडे ने बाजी पलटते हुए अपनी चचेरी बहन पंकजा को हरा दिया।

महाराष्ट्र में ऐसे और भी उदाहरण हैं। पिछले महीने हुए विधानसभा चुनाव में शिवसेना के जयदत्त क्षीरसागर को उनके भतीजे एवं राकांपा उम्मीदवार संदीप क्षीरसागर ने बीड सीट से हरा दिया।

बाल ठाकरे-राजठाकरे

महाराष्ट्र की राजनीति मौजूदा समय में चाचा के खिलाफ भतीजे की बगावत कोई नई बात नई नहीं है। यहां की राजनीति यह कोई नया अध्याय नहीं है। इससे पहले भी शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरें के खिलाफ उनके भतीजे ने अपनी उपेक्षा से उबकर वर्ष 2006 में उनसे किनारा करके महाराष्ट नवनिर्माण सेना का गठन किया।

राजठाकरे बाल ठाकरें का राजनीति उत्तराधिकारी बनना चाहते थे लेकिन बाल ठाकरें ने उनके बजाए अपने पुत्र उद्वव ठाकरे को ही चुना जो बाद में शिवसेना के प्रमुख बने। राजठाकरे ने बाद में अपनी अलग राह ली और महाराष्टड्ढ्र नवनिर्माण सेना का गठन कर सियासत शुरू कर दी। अब दोनों भाइयों की राहे जुदा है।

हालांकि राजनीतिक दृष्टि से महाराष्ट नवनिर्माण सेना का महाराष्टड्ढ्र की राजनीति में कोई खास दखल नहीं है। राजठाकरें के बारे में वहां के लोगों की यह धारणा आम है कि उनमें बाल ठाकरें जैसी आक्रामकता है।

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