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डॉ संपूर्णानंद: विद्वान राजनेता जिन्होंने राजनीति को देश सेवा का माध्यम बनाया

काशी में 1 जनवरी, 1891 को पैदा होने वाले डॉ. संपूर्णानंद हिंदी और संस्कृत के पक्षधर थे । इन दोनों भाषाओं के मूर्द्धन्य विद्वान भी थे। काशी का संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय उनकी ही देन है।

Roshni Khan

Roshni KhanBy Roshni Khan

Published on 1 Jan 2021 4:59 AM GMT

डॉ संपूर्णानंद: विद्वान राजनेता जिन्होंने राजनीति को देश सेवा का माध्यम बनाया
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डॉ संपूर्णानंद: विद्वान राजनेता जिन्होंने राजनीति को देश सेवा का माध्यम बनाया (PC:social media)
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लखनऊ: पांच साल तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने वाले डॉ संपूर्णानंद को विद्वान राजनेता माना जाता रहा है। उन्होंने राजनीति को देश की सेवा का माध्यम बनाया। वे उन बिरले लोगों में शामिल थे जिन्होंने राजनीति और साहित्य की साधना की। दोनों क्षेत्रों में समान अधिकार से काम किया।

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काशी में 1 जनवरी, 1891 को पैदा होने वाले डॉ. संपूर्णानंद हिंदी और संस्कृत के पक्षधर थे । इन दोनों भाषाओं के मूर्द्धन्य विद्वान भी थे। काशी का संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय उनकी ही देन है। आजादी के आंदोलन के दौरान कई बार जेल की यातनाएं सहने वाले डॉ संपूर्णानंद का नाम आज भी काफी आदर के साथ लिया जाता है।

अध्यापक के रूप में भी किया कार्य

संपूर्णानंद के पिता का नाम विजयानंद था, जो खुद भी काफी विद्वान और जानकार व्यक्ति थे। संपूर्णानंद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी के प्रसिद्ध हरिश्चंद्र स्कूल और क्वींस कॉलेज में हुई थी। प्रयाग को समय उच्च शिक्षा का बड़ा केंद्र माना जाता था। संपूर्णानंद जी की भी उच्च शिक्षा प्रयाग में ही पूरी हुई।

उन्होंने यहां से बीएससी और फिर एलटी की परीक्षा अच्छे अंकों में पास की। पढ़ाने में उनकी काफी दिलचस्पी थी। नतीजतन, बाद में वे वृंदावन के प्रेम महाविद्यालय में अध्यापक बन गए।

विविध विषयों का गहन अध्ययन

विज्ञान का छात्र होते हुए भी संपूर्णानंद ने धर्म, दर्शन, ज्योतिष, शिक्षा, साहित्य और वेदांत आदि का गहन अध्ययन किया था। हिंदी में वैज्ञानिक निबंधों की कमी उन्हें काफी खलती थी। इसी कारण उन्होंने इस दिशा में काफी काम किया।

हालांकि उनके निबंधों के विषय काफी जटिल हुआ करते थे मगर उनके लिखने की शैली सरल एवं प्रवाहमयी होने के कारण छात्रों को उनकी बात आसानी से समझ में आ जाया करती थी।

लेखन व संपादन

उन्होंने महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित ‘मर्यादा’ मासिक पत्रिका का संपादन भी किया। इसके साथ ही ‘नेशनल हेराल्ड’तथा ‘कांग्रेस सोशलिस्ट’ जैसे पत्रों में भी वे नियमित रूप से लिखा करते थे। उनके लेखन में आधुनिकता और प्राचीन परंपरा का अद्भुत समन्वय दिखाई पड़ता है।

Sampurnanand Sampurnanand (PC:social media)

हमेशा हिंदी के रहे पक्षधर

अंग्रेजी का अच्छा जानकार होने के बावजूद डॉक्टर संपूर्णानंद हमेशा हिंदी के पक्षधर रहे। 1940 में वे अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति भी चुने गए। काशी की विख्यात संस्था नागरी प्रचारिणी सभा से भी उनका गहरा जुड़ाव था। वे लंबे समय तक इस संस्था के अध्यक्ष और फिर संरक्षक रहे।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तक समाजवाद पर उन्हें मंगला प्रसाद पुरस्कार भी दिया गया था। लोगों के बीच उनका काफी सम्मान था। आदर से लोग उन्हें बाबूजी कहकर पुकारा करते थे।

संपूर्णानंद का सियासी सफर

डॉ संपूर्णानंद के दौर में राजनीति आज जैसी कलुषित नहीं थी। ईमानदारी को काफी महत्व दिया जाता था। संपूर्णानंद ने भी राजनीति को देश सेवा का माध्यम बनाया। 1936 में संयुक्त प्रांत की अंतरिम विधानसभा का गठन होने पर वे इसके सदस्य चुने गए।

शिक्षा के प्रति उनका जबर्दस्त रुझान था । इसी कारण उन्हें शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी दी गई थी। शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए काफी काम किया।

पांच साल रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री

अपने दौर में डॉ. संपूर्णानंद सियासत का प्रमुख चेहरा बन गए थे। इसी कारण उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी सौंपी गई। वे 1955 से 1960 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।

इसके बाद उन्होंने पांच साल तक राजस्थान के राज्यपाल का पद भी संभाला। जेल में बंद पुराने तथा भले बंदियों के लिए उन्होंने राजस्थान में 1963 में खुली जेल का प्रयोग शुरू किया, जिसे बाद में पूरे देश में लागू किया गया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी

सियासी मैदान में सक्रिय होने के बावजूद उन्होंने समाजवाद, जीवन और दर्शन, महात्मा गांधी, चितरंजन दास, अंतरिक्ष यात्रा,सम्राट हर्षवर्धन, चिद्विलास और गणेश आदि पुस्तकों की रचना की। उन्होंने कुछ समय तक अंग्रेजी की टुडे पत्रिका के संपादक की भी जिम्मेदारी संभाली।

डॉ संपूर्णानंद को बहुमुखी प्रतिभा का धनी माना जाता है। ‌ वे राजनेता होने के साथ ही साहित्यकार, विचारक, लेखक, स्वतंत्रता सेनानी, संपादक और पत्रकार सब कुछ थे। उन्होंने सभी क्षेत्रों में समान अधिकार से काम किया। काशी से अपनी जीवन यात्रा शुरू करने वाले डॉ संपूर्णानंद का निधन 10 जनवरी, 1969 को काशी में ही हुआ।

काशी में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना

डॉक्टर संपूर्णानंद के प्रयासों से ही काशी में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। पहले इस विश्वविद्यालय का नाम वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय था मगर बाद में इसका नाम बदलकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय कर दिया गया। संस्कृत भाषा के उन्नयन और प्रसार के लिए यह विश्वविद्यालय में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है।

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इस विश्वविद्यालय में देश-विदेश से विद्यार्थी पढ़ने आते हैं। इस विश्वविद्यालय में अध्ययन करके निकले छात्रों ने प्राचीन साहित्य, दर्शन और ज्योतिष के क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। इसका सबसे बड़ा श्रेय डॉ संपूर्णानंद को ही दिया जाता है।

रिपोर्ट- अंशुमान तिवारी

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