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पुण्यतिथि विशेष: मुंबई के शेर कहे जाते थे बाला साहेब, हिंदुत्व के थे प्रतीक

बाला साहब ठाकरे की आज पुण्यतिथि है। एक अखबार के कार्टूनिस्ट से लेकर महाराष्ट्र की राजनीतिक मंच पर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाल ठाकरे मराठी गौरव और हिंदुत्व के प्रतीक थे। ठाकरे अक्सर खुद बड़ी जिम्मेदारी लेने की बजाय किंगमेकर बनना ज्यादा पसंद करते थे।

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Updated on: 17 Nov 2020 4:51 AM GMT
पुण्यतिथि विशेष: मुंबई के शेर कहे जाते थे बाला साहेब, हिंदुत्व के थे प्रतीक
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मुम्बई के शेर कहे जाते थे बाला साहेब, आज है पुण्यतिथि
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लखनऊ: कभी मुम्बई पर एकछत्र राज करने वाले बाला साहब ठाकरे की आज पुण्यतिथि है। एक अखबार के कार्टूनिस्ट से लेकर महाराष्ट्र की राजनीतिक मंच पर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाल ठाकरे मराठी गौरव और हिंदुत्व के प्रतीक थे। ठाकरे अक्सर खुद बड़ी जिम्मेदारी लेने की बजाय किंगमेकर बनना ज्यादा पसंद करते थे। ठाकरे वर्षों तक महाराष्ट्र की राजनीति पर छाए रहे। उनके पास कोई पद या ओहदा नहीं था, लेकिन उनके प्रभाव का यह आलम था कि उनके निवास स्थान 'मातोश्री' ने राजनीतिक नेताओं से लेकर, फिल्मी सितारों, खिलाड़ियों और उद्योग जगत की दिग्गज हस्तियों की अगवानी की।

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अखबार के कार्टूनिस्ट

अपने एक इशारे से मुम्बई की रौनक को सन्नाटे में बदलने की ताकत रखने वाले बाल ठाकरे ने आरके लक्ष्मण के साथ अंग्रेजी दैनिक फ्री प्रेस जर्नल में 1950 के दशक के अंत में कार्टूनिस्ट के तौर पर अपना करियर शुरू किया था, लेकिन 1960 में उन्होंने कार्टून साप्ताहिक ‘मार्मिक’ की शुरुआत करके एक नए रास्ते की तरफ कदम बढ़ाया। इस साप्ताहिक में ऐसी सामग्री हुआ करती थी, जो मराठी लोगों में अपनी पहचान के लिए संघर्ष करने का जज्बा भर देती थी।

मराठी मंत्र

ठाकरे की यह बात कि ‘महाराष्ट्र मराठियों का है,’ स्थानीय लोगों में इस कदर लोकप्रिय हुआ कि उनकी पार्टी ने वर्ष 2007 में भाजपा के साथ पुराना गठबंधन होने के बावजूद राष्ट्रपति के चुनाव में अपनी एक अलग राय बनाई और संप्रग की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया, जो महाराष्ट्र से थीं।

bala sahab thakre

1966 में बनाई शिवसेना

ठाकरे ने 19 जून 1966 को शिवसेना की स्थापना की और मराठियों की तमाम समस्याओं को हल करने की जिम्मेदारी अपने सिर ले ली। उन्होंने मराठियों के लिए नौकरी की सुरक्षा मांगी, जिन्हें गुजरात और दक्षिण भारत के लोगों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था। शिव सेना का इस्तेमाल वह विभिन्न कपड़ा मिलों और अन्य औद्योगिक इकाइयों में मराठियों को नौकरियां आदि दिलाने में किया करते थे। उनके इन्हीं प्रयासों ने उन्हें ‘हिंदू हृदय सम्राट’ बना दिया।

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ठाकरे ने खुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन शिवसेना को एक पूर्ण राजनीतिक दल बनाने के बीज बोए। उनके शिव सैनिकों ने बॉलीवुड सहित विभिन्न उद्योगों में मजदूर संगठनों पर नियंत्रण करना शुरू किया और एक राजनीतिक राह पकड़ ली। 80 के दशक में मराठी समर्थक मंत्र के सहारे शिव सेना ने बृहन्मुंबई नगर निगम पर कब्जा कर लिया। भाजपा के साथ 1995 में गठबंधन करना ठाकरे के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मौका था और इसी के दम पर उन्होंने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा। वे खुद कहते थे कि वे ‘रिमोट कंट्रोल’ से सरकार चलाते हैं।

मुसलमानों को कहा था कैंसर

पाकिस्तान और मुस्लिम समुदाय को अकसर निशाने पर रखने वाले बाल ठाकरे ने एक बार मुस्लिम समुदाय को ‘कैंसर’ तक कह डाला था।

उन्होंने कहा था, ‘इस्लामी आतंकवाद बढ़ रहा है और हिंदू आतंकवाद ही इसका जवाब देने का एकमात्र तरीका है। हमें भारत और हिंदुओं को बचाने के लिए आत्मघाती बम दस्ते की जरूरत है।'

सबसे बड़ा झटका

ठाकरे को 2005 में अपने जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा जब उनके भतीजे राज ने शिवसेना को छोड़ दिया और 2006 में अपनी राजनीतिक पार्टी एमएनएस बना ली। इसके बाद वे धीरे धीरे नेपथ्य में चले गए। इसी साल उन्होंने वीडियो रिकार्डेड भाषण के जरिए अपने समर्थकों को संबोधित किया और सार्वजनिक जीवन से संन्यास का एलान किया। उन्होंने कहा- 'शारीरिक तौर पर मैं काफी कमजोर हो गया हूं... मैं चल नहीं सकता... मैं अब थक गया हूं।' उन्होंने अपने समर्थकों से उनके पुत्र उद्धव और पोते आदित्य का साथ देने का आग्रह किया और इसके साथ ही शिवसेना के उत्तराधिकार की बेल को सींच दिया।

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