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संसार को कल्याणमय क्रीडांगन बनाएं

विश्व परिवार की भावना और विश्व कल्याण की कामना ही सच्ची-सच्ची राष्ट्रीयता है। जिस तरह अनेकों घरों को मिलाने से गाँव, अनेकों गाँव व शहरों को मिलाने से शहर बनता वैसे ही अनेकों देशों के समूह को विश्व कहा जाता है। सभी घर तो अलग-अलग है पर मिलने से गाँव व शहर कहे जाते हैं

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sumanBy suman

Published on 16 May 2020 3:01 PM GMT

संसार को कल्याणमय क्रीडांगन बनाएं
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ब्रह्माकुमार राम लखन

विश्व परिवार की भावना और विश्व कल्याण की कामना ही सच्ची-सच्ची राष्ट्रीयता है। जिस तरह अनेकों घरों को मिलाने से गाँव, अनेकों गाँव व शहरों को मिलाने से शहर बनता वैसे ही अनेकों देशों के समूह को विश्व कहा जाता है। सभी घर तो अलग-अलग है पर मिलने से गाँव व शहर कहे जाते हैं वैसे ही देश व राष्ट्र अलग-अलग होते हुये भी सभी के मिलने से धरती शोभायमान लगती है। सभी इन्द्रियों के मेल से हमारा शरीर शोभायमान होता है वैसे ही तो अनेकों छोटे-बड़े देशों रूपी इन्द्रियों से वसुन्धरा सुशोभित है। किसी भी अंग-अवयव में पीड़ा होने पर पूरा शरीर बेचैन रहता है। इसी तरह देश और राज्यों के पीड़ित होने पर पृथ्वी भी संकटग्रस्त हो जाती है। इन्द्रियों की नियोगी होने पर पूरा शरीर बलिष्ठ बना रहता है वैसे ही सभी देशों की समृद्धि से धरा स्वर्ग कहलाती है। हमें ऐसा कार्य-व्यवहार करना चाहिये जिससे सर्व का भविष्य स्वर्णिम बन सके फलस्वरूप संसार ही कल्याणमय क्रीड़ांगन बन जायेगा।

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पृथ्वी पर विचरण करने वाले हर नर-नारी को विश्व परिवार की भावना से देखना चाहिये। हरेक देशवासी दूसरे देशवासियों को पड़ोसी के साथ-साथ सेवा-सहकर्मी समझ कर व्यवहार करें। सम्पूर्ण मानवता को पारिवारिक भावना से अपनाने से ही धरती पर स्वर्ग की कल्पना साकार होगी। तब ही सभी प्राणी सुख-शान्ति-आनन्द का अनुभव कर सकेंगे। सत्याचरण से ही संसार में सौहार्द कायम होगा। सत्य व्यवहार से ही पारस्परिक प्रेम और विश्वास बढ़ता है। असत्यता से अविश्वास और घृणा को बढ़ावा मिलता है। इसने ही मानवता में विभाजन रेखायें खीची हैं। अब राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों में भी सत्य पर आधारित व्यवहार व्यापार होना चाहिये। कूटनीतिक प्रचलन से दुनिया का पतन और विभाजन बढ़ता ही जा रहा है। असत्यता ने विश्व के टुकड़े-टुकड़े करके संसार को संकटग्रस्त कर दिया है। सभी रिश्तों-नातों से अठखेलियाँ करती हुई असत्यता दुःख-दर्द-अशान्ति बढ़ाती जा रही है। सत्यं-शिवं-सुन्दरम् से ही संसार के सभी लोग स्वच्छ व सुन्दर बन देवी-देवता कहे जा सकेंगे। असत्य, अन्तकरण को मलिन और चंचल बनाता है जबकि सत्य से जीवन निर्मल-निष्पाप और स्थिर होता रहता है।

संसार के सभी धर्म सम्प्रदायों के संस्थापक सत्य पर बल दिये हैं। फिर भी दुनिया बेईमानी के गर्त में गिरती जा रही है। टीचर और प्रीचर ही संसार में सत्य स्थापित कर सकते हैं। राजनेता, धर्मनेता व अभिनेता जब सत्यतापूर्ण प्रदर्शन करने लगेंगे तो व्यापार-व्यवसाय भी सत्यतापरक हो जायेंगे। यदि जीवन में सत्याचरण नहीं अपनायेंगे तो परम सत्य परमात्मा से विमुख हो जायेंगे। माता पिता सत्याचारी होंगे तो संतति स्वतः उनका अनुसरण करती रहेगी। घर ग्रहस्थ में सत्य की प्रतिष्ठा हो जाय तो सारा संसार ही कल्याणमय क्रीड़ांगन बन जायेगा।

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यह धरा अनन्त ऐश्वर्यों की खान है परन्तु तपस्या के बल से ही उसका सुचारु दोहन हो सकता है। आराम तलबी ही विलास-व्यसन की जननी है जो जीवन की क्षत-विक्षत कर देती है। तपस्या की पवित्रता से भौतिक विभूतियाँ प्राप्त होती हैं। जिससे हम देवत्व की ओर बढ़ सकेंगे। सद्विवेक से ही यह पृथ्वी सौभाग्य-समृद्धि और सम्पन्नता का द्वार खोलती है।

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