Women’s Day Special: हाथों से नहीं पैरों से लिखी अपनी सफलता की कहानी

कामिनी का विवाह 1997 में आजमगढ़ के स्वतंत्र कुमार श्रीवास्तव के साथ हुआ था। स्वतंत्र बताते हैं कि उन्होंने कामिनी का एक लेख पत्रिका में पढ़ा था और उनके विचारों से वह बहुत प्रभावित हुए थे, इसलिए उन्होंने खुद ही शादी का प्रस्ताव भेजा था।

आशुतोष त्रिपाठी

                                                   मुश्किलें जरूर है, मगर ठहरी नही हूं मैं, मंज़िल से जरा कह दो, अभी पहुंची नही हूं मैं।।

लखनऊ: आपने ये शेर कई बार सुना होगा लेकिन जब इसे लखनऊ की कामिनी श्रीवास्तव पढ़ती हैं तो बात कुछ और ही होती है। आपने हाथों से खुद तकदीर लिखने वालों के बारे में तो बहुत सुना होगा, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी महिला से रूबरू कराने जा रहे हैं, जिन्होंने अपने पैरों से अपनी तकदीर लिखी है।

कामिनी श्रीवास्तव किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। महज चार साल कि उम्र में ही अपने दोनों हाथ गवां देवे के बावजूद अपने बुलंद हौसले से नामुमकिन को भी मुमकिन बना दिया और आज सरोजनी नगर में बाल विकास परियोजना अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। कामिनी ने अपनी कमजोरी को कभी भी कामयाबी के आड़े आने नहीं दिया। वो ऐसी कई महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो खुद को असहाय मानती हैं।

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हादसे में गँवाए थे दोनों हाथ

आज भी कामिनी कब उस पल को याद करती हैं तो उनकी आँखों में वो खौफनाक मंजर साफ़ देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि जब मात्र चार साल की थीं तब अपने बड़े भाई के साथ रेलवे लाइन पार करते समय वो रेल के इंजन से टकरा गईं, इस दुर्घटना में वह अपने दोनों हांथ और एक पैर की उंगलिया गंवा बैठी थी।

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जिसके बाद मानों उनकी ज़िन्दगी रुक सी गयी, लगातार दो वर्ष तक बिस्तर पर रहने से उनका आत्मविश्वास चूर-चूर हो चूका था, लेकिन ऐसे में उनके पिता ने उन्हें इस मुश्किल की घडी से बाहर निकाला और उनके पैरों में पेन पकड़ा दिया।

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बाल विकास परियोजना अधिकारी के पद पर हुई तैनात

पिता के अथक प्रयास के बाद कामिनी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और फैजाबाद विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र विषयों में डबल एमए किया।

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1982 में प्रतियोगी परीक्षा पास कर वह बाल विकास परियोजना अधिकारी के पद पर नियुक्त हुई। वो अपने सभी काम अपने पैरों से ही करती हैं, यहाँ तक की वह लैपटॉप पर भी तेजी से काम कर लेती हैं।

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कई पुरुस्कारों से हुई हैं सम्मानित

कामिनी ने सिर्फ खुद को ही आत्मनिर्भर नहीं बनाया बल्कि वो कई समाजसेवी संस्थओं से जुड़कर अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने का काम करती हैं। गरीब बच्चों के विकास के लिए काफी काम किया, इसके लिए उन्हें कई बार सम्मानित भी किया गया। 1997 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल द्वारा कामिनी को राज्य स्तर पर श्रेष्ठ दिव्यांग कर्मचारी के रूप में भी सम्मानित किया गया।

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पति बने प्रेरणा

कामिनी का विवाह 1997 में आजमगढ़ के स्वतंत्र कुमार श्रीवास्तव के साथ हुआ था। स्वतंत्र बताते हैं कि उन्होंने कामिनी का एक लेख पत्रिका में पढ़ा था और उनके विचारों से वह बहुत प्रभावित हुए थे, इसलिए उन्होंने खुद ही शादी का प्रस्ताव भेजा था।

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अपने पति के सुझाव पर कामिनी ने अपनी कविता लेखन के शौक को किताब का रूप दिया और खिलते फूल, महकता आंगन नामक किताब लिखी। जिसका लोकार्पण उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक ने किया।

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