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मुसीबतों के बीच से निकलकर तमिलनाडु में चमका बन सितारा अकिलन

अकिलन तमिल भाषा के साहित्यकार, उपन्यासकार, लघु कहानी लेखक, पत्रकार, व्यंग्यकार, यात्रा लेखक, नाटककार तथा पटकथा लेखक भी रहे। अकिलन ने अपना अधिकांश लेखन कार्य अकिलन नाम से किया और इसी नाम से प्रसिद्धि भी पाई। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी जाना जाता है।

राम केवी

राम केवीBy राम केवी

Published on 27 Jun 2020 9:46 AM GMT

मुसीबतों के बीच से निकलकर तमिलनाडु में चमका बन सितारा अकिलन
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रामकृष्ण वाजपेयी

अकिलन का जन्म 27 जून 1922 में तमिलनाडु में हुआ था। इनका पूरा नाम पेरुंगळूर वैद्य विंगम अखिलंदम था जिसे संक्षेप में पी. वी. अखिलंदम करके भी जाना जाता है। अकिलन की कर्मभूमि और कर्मक्षेत्र तमिलनाडु रहा। इन्होंने तमिल साहित्य को समृद्ध करने में अतुलनीय योगदान दिया। 'नेंजिन अलैगल', 'पावै विलक्कु', 'चित्तिरप्पावै', 'वेंगैयिन मैंदन', 'कयल विषि', 'वेत्री तिरुनगर' आदि इनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

अकिलन का जन्म तमिलनाडु के पेरुंगलूर में हुआ था। उनके पिता फ़ॉरेस्ट रेंजर थे। पिता की इच्छा थी कि उनका बेटा आई.सी.एस. बने, लेकिन वर्ष 1038 में इनके पिता की अचानक मृत्यु हो गई। इसके बाद अकिलन और उनका परिवार आर्थिक परेशानियों व निराशाओं से घिर गया।

संघर्षों से मिला नया जन्म

इन्हीं संघर्ष भरे दिनों की अनुभूतियाँ अकिलन की प्रेरणा बनीं। पिता के निधन के तकरीबन एक वर्ष बाद 1939 में उनकी सबसे पहली कहानी अर्थकष्ट से मृत्यु सामने आई। अकिलन की दिशा बदल चुकी थी। वह अध्ययनशील तो थे ही अब चिंतक के रूप में उनका जन्म हो रहा था। कवि सुब्रह्मण्यम भारतीय एवं बंकिमचंद्र चटर्जी की रचनाओं ने उनके मानस को झकझोर दिया और उसमें राष्ट्रीयता की चिंगारी सुलग उठी।

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1940 में मैट्रिक करते ही अपने मित्रों को लेकर उन्होंने 'शक्ति युवा संघ' बनाया और जी-जान से स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। जब देश में 'भारत छोड़ो आंदोलन' की ललकार गूंजी तो अकिलन ने मुक्त भाव से सरकार विरोधी कहानियाँ लिखनी शुरू कर दीं।

रेलवे में नौकरी और इस्तीफा

वर्ष 1945 में अकिलन रेलवे मेल सर्विस में सॉर्टर के काम पर नियुक्त हो गये। लेकिन चिंतन और लेखन इसके बाद भी जारी रहा और 23 वर्ष की आयु में इनका अपना पहला उपन्यास 'पेन' प्रकाशित हुआ। जिसे प्रतिष्ठित तमिल मासिक 'कलैमगल' ने प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार दिया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत की स्वाधीनता के लिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने ब्रिटिश सेनाओं के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया इससे अकिलन बहुत प्रभावित हुए और उनके मन में नेताजी के प्रति विशेष लगाव और आदर भाव उत्पन्न हुआ।

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इसके बाद आईएनए के तमाम सैनिकों और सेनानायकों से अकिलन के घनिष्ठ संबंध बने। और इन सबकी भावनात्मक अभिव्यक्ति उपन्यास 'नेंजिन अलैगल' में दिखाई दी।

यह उपन्यास वर्ष 1951 में प्रकाशित हुआ और 1955 में तमिल अकादमी द्वारा पुरस्कृत हुआ। लेकिन 1958 में 'पावै विलक्कु' लिखने के दौरान किंचित कारणों से उन्होंने अचानक नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और त्रिची से मद्रास (वर्तमान चेन्नई) चले गए।

ऐतिहासिक उपन्यास

अकिलन ने कुछ ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे। वर्ष 1961 में प्रकाशित 'वेंगैयिन मैंदन' उनका पहला ऐतिहासिक उपन्यास था, जिसे 1963 में 'साहित्य अकादमी' ने पुरस्कृत किया। फिर 1965 में 'कयल विषि' निकला। इस पर उन्हें 1968 में 'तमिल विकास परिषद' का पुरस्कार मिला।

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अकिलन का तीसरा ऐतिहासिक उपन्यास है 'वेत्री तिरुनगर', जो 1966 में प्रकाशित हुआ था। 1973 में प्रकाशित 'एंगे पोगीरोम' उनका एक सामाजिक उपन्यास है, जिसमें समाज और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का चित्रण किया गया है। अकिलन को इसी कृति पर 1976 में 'राजा अण्णमलै चेट्टियार पुरस्कार' भी मिला था।

कई देशों में छा गया नाम

साहित्यमर्मियों के मत से 'पावै विलक्कु' और 'चित्तिरप्पावै' उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ हैं। 'चित्तिरप्पावै' के कारण अकिलन का नाम तमिलनाडु ही नहीं, श्रीलंका, मलेशिया और सिंगापुर में बसे लाखों तमिल भाषियों तक पहुँच गया। यह उपन्यास गद्य की काव्यमयता का सुंदर उदाहरण है और आधुनिक तमिल उपन्यास साहित्य की प्रौढ़ता का प्रतीक माना जाता है।

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अकिलन तमिल भाषा के साहित्यकार, उपन्यासकार, लघु कहानी लेखक, पत्रकार, व्यंग्यकार, यात्रा लेखक, नाटककार तथा पटकथा लेखक भी रहे। अकिलन ने अपना अधिकांश लेखन कार्य अकिलन नाम से किया और इसी नाम से प्रसिद्धि भी पाई। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी जाना जाता है।

अकिलन की प्रमुख कृतियां

उपन्यास- मंगिय निलवु (1944), पेन (1947), तुनैवि (1951), संदिप्पु (1952), अवलुक्कु (1953), वेंगयिन मैंदन (1961), पुदु वेल्लम् (1964), कयल विषि (1965), वेत्री तिरुनगर (1966), चित्तिरप्पावै (1968), कोल्लैकारन (1969), एंगे पोगिरोम (1973)

कहानी- सक्तिवेल (1946), सांति (1952) नेल्लूर अरिसी (1967), एरिमलै (1970), पसियुम रूसियुम (1974)

निबंध, मणमक्कलुक्कु (1953), कदैकलै (1972)

नाटक- वाषविल इनबम (1955)

और तमिल भाषा के इस महान् साहित्यकार अकिलन का 31 जनवरी, 1988 को निधन हो गया। इसी के साथ तमिल साहित्य में अकिलन नाम अमर हो गया।

राम केवी

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