पतंजलि की जन्म भूमि को भागीरथ की तलाश, यहां के बारे में नहीं जानते होंगे ये बातें

संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 177 देशों द्वारा 21 जून 2015 को योग को मान्यता देने के बाद हर वर्ष विश्व में योग दिवस मनाया जा रहा है।

Published by Aradhya Tripathi Published: June 20, 2020 | 8:42 pm

गोंडा: ‘तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है‘ प्रख्यात जनवादी कवि अदम गोंडवी की ये लाइनें दुनिया को योग रुपी संजीवनी औषधि प्रदान करने वाले महर्षि पतंजलि के सम्मान और गुणगान के तमाम दावों की पोल खोल रही हैं। आज योग के व्यापारी करोड़ों का व्यापार कर रहे हैं। लेकिन योग के प्रणेता की जन्मस्थली का कोई पुरसाहाल नहीं है। दुनिया के पांच पुरातन वैज्ञानिकों में से एक पतंजलि गोनर्द में जन्मे एक ऐसे योगी है,

जिन्हें आज पूरी दुनिया योग के जन्मदाता के रुप में जानती है। यहीं से निकल कर योग ने पूरे विश्व में डंका बजाया और करोड़ों लोगों को निरोगी और दीर्घायु जीवन दिया है। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 177 देशों द्वारा 21 जून 2015 को योग को मान्यता देने के बाद हर वर्ष विश्व में योग दिवस मनाया जा रहा है। लेकिन सरकार और प्रशासनिक की उपेक्षा के चलते योग के प्रणेता की जन्म स्थली विकास से वंचित है और उसे सदियों से भगीरथ रुपी किसी चिकित्सक की तलाश है।

गोंडा (गोनर्द) में हुआ जन्म, राजा पुष्यमित्र के पुरोहित रहे

महर्षि पतंजलि का जन्म क्षेत्र के कोंडर गांव में होने का साक्ष्य धर्मग्रंथों में मौजूद है। महर्षि पतंजलि ने स्वयं व्याकरण महाभाष्य में अपनी जन्मस्थली का जिक्र किया है। पतंजलि के कई नामों गोणिकापुत्र, नागनाथ, अहिपति, चूर्णिकार, फणिभुत, शेषाहि, शेषराज और पदकार के अलावा एक नाम गोनर्दीय भी हैं। वर्तमान गोंडा जनपद का पौराणिक नाम गोनर्द ही है। अयोध्या तथा श्रावस्ती के बीच स्थित भू-भाग को गोनर्द क्षेत्र है और अयोध्या से 22 किमी की दूरी पर गोंडा जिले के वजीरगंज कस्बे के करीब कोंडर गांव उनका जन्म स्थान माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार पतंजलि अपने शिष्यों को परदे से शिक्षा दे रहे थे। किसी ने उनको देखा नहीं था। एक शिष्य ने पर्दा हटाकर उन्हें देखना चाहा तो वे सर्पाकार में गायब हो गए।

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लोगों का मत है कि वे कोंड़र झील होते हुए विलुप्त हुए थे जिससे झील का आकार आज भी सर्पाकार है। उनके जन्म स्थल पर शिलापट लगा एक चबूतरा, सम्मय माता मंदिर व राम जानकी मंदिर है। जो स्थानीय लोगों के सहयोग से बना है। पतंजलि के समय निर्धारण में इनका काल आज से करीब 200 ई. पूर्व माना जाता है। पतंजलि के ग्रंथों में लिखे उल्लेख से उनके काल का अंदाजा लगाया जाता है कि संभवतः राजा पुष्यमित्र शुंग के शासन काल 195 से 142 ई. पूर्व इनकी उपस्थिति थी। पुष्यमित्र कण्व वंश के संस्थापक ब्राह्मण राजा के अश्वमेध यज्ञों की घटना भी ई.पू. द्वितीय शताब्दी की है। पतंजलि की एकमात्र रचना महाभाष्य है। शंकराचार्य को दर्शन शास्त्र में जो स्थान ‘शारीरिक भाष्य‘ के कारण प्राप्त है, वही स्थान पतंजलि को महाभाष्य के कारण व्याकरण शास्त्र में प्राप्त है। पतंजलि ने इस ग्रंथ की रचना कर पाणिनी के व्याकरण की प्रामाणिकता पर मुहर लगा दी है।

शेषावतार माने जाते हैं पतंजलि

प्रसिद्ध द्रविड़ लेखक राम चन्द्र दीक्षित ने पंतजलि चरित में पतंजलि को शेष नाग का अवतार माना है। उन्होंने कहा है कि एक बार जब श्री हरि विष्णु शेष शय्या पर गहरी निद्रा में थे तो भगवान शिव ने अपना तांडव नृत्य प्रारम्भ किया। गहरी निद्रा में होने के बवजूद उनका ध्यान उस शिव नृत्य की ओर आकर्षित हुआ। उस नृत्य को देखते हुए श्री विष्णु को इतना आनन्द प्राप्त हुआ कि वह उनके शरीर में नहीं समा रहा था। तब उन्होंने अपने शरीर को बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। श्री विष्णु का शरीर में वृद्धि से शेष को उनका भार असहनीय हो गया। वे अपने सहस्र मुखों से फुंकार करने लगे। उसके कारण लक्ष्मी जी घबराईं और उन्होंने श्री विष्णु को नींद से जगाया। जागने पर ही उनका शरीर संकुचित हुआ।

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तब राहत की श्वांस लेते हुए शेष जी ने पूछा कि प्रभू यह कैसी परीक्षा थी। इस पर भगवान विष्णु ने शेष को शिवजी के तांडव नृत्य के बारे में बताया। तब शेष बोले वह नृत्य एक बार मैं देखना चाहता हूं। इस पर उन्होंने कहा इसके लिए तुम्हें पृथ्वी पर अवतार लेना होगा। तदनुसार शेष जी अवतार लेने हेतु उचित स्थान की खोज में निकल पड़े। रास्ते में गोनर्द नामक स्थान पर उन्हें पुत्र प्राप्ति की इच्छा से तपस्या करती हुई गोणिका नामक एक महिला दिखाई पड़ी। शेष जी ने मन ही मन उसे मातृ रूप में स्वीकार कर लिया। जब गोणिका सूर्य को अर्ध्य देने हेतु सिद्ध हुई, तब शेष जी सूक्ष्म रूप धारण उसकी अंजलि में जा बैठै और उसकी अंजलि के जल के साथ नीचे आते ही उसके सम्मुख बालक के रूप में खड़े हो गए। गोणिका ने उन्हें अपना पुत्र मानकर गोदी में उठा लिया और बोली मेरी अंजलि से पतन पाने के कारण मैं तुम्हारा नाम पतंजलि रखती हूं।

एक पौराणिक कथा के अनुसार बहुत समय पहले की बात है सभी ऋषि-मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंचे और बोले भगवन आपने धन्वन्तरि का रूप ले कर शारीरिक रोगों के उपचार हेतु आयुर्वेद दिया। किन्तु अभी भी पृथ्वी पर लोग काम, क्रोध और मन की वासनाओं से पीड़ित हैं। अधिकतर लोग शारीरिक ही नहीं, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी विकारों से दुखी होते हैं। इनसे मुक्ति का उपाय क्या है? भगवान आदिशेष सर्प की शैया पर लेटे हुए थे; सहस्त्र मुख वाले आदिशेष सर्प जागरुकता का प्रतीक है। उन्होंने ऋषि मुनियों की प्रार्थना सुन कर जागरूकता स्वरुप आदिशेष को महर्षि पतंजलि के रूप में पृथ्वी पर भेज दिया। इस तरह योग का ज्ञान प्रदान करने हेतु पृथ्वी पर महर्षि पतंजलि ने अवतार लिया।

पतंजलि का अष्टांग योग सूत्र

मान्यता है कि भगवान शिव ही आदियोगी हैं। उन्होंने सात ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के सात सूत्र बन गए। कालान्तर में इन सात रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल आईं। एक समय ऐसा आया कि योग की तकरीबन 1700 विधाएं तैयार हो गयीं। योग में आई जटिलता को देख कर पतंजलि ने पूरे योग शास्त्र को मात्र 200 सरल सूत्रों में समेट दिया। महर्षि पतंजलि के योग साधनाओं में अष्टांग योग सर्वाधिक प्रचलित है। पतंजलि ने योग की समस्त विद्याओं को आठ अंगों में श्रेणीबद्ध कर दिया है। योग सूत्र की रचना के कारण ही पतंजलि को योग का पिता कहा जाता है। अष्टांग योग के यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि आदि आठ अंग हैं। वर्तमान में योग के आसन, प्राणायाम और ध्यान अंग ही प्रचलन में हैं। महर्षि पतंजलि का योगसूत्र योग दर्शन का प्रथम व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन है।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया है। इसके जहां भारत समेत पूरी दुनिया जोर-शोर से अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस मनाती है। वहीं योग की प्रेरणा देने वाले महर्षि पतंजलि और उनकी जन्म स्थली को भूलते जा रहे हैं। यही कारण है कि योग गुरु महर्षि पतंजलि की जिले के कोंडर ग्राम में स्थित जन्मभूमि घोर उपेक्षा की शिकार है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 150 किलोमीटर और भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या से 22 किमी दूर स्थित पतंजलि की जन्मभूमि पर दूरदराज से आने वाले आगन्तुकों के लिए न कोई आश्रम, धर्मशाला है और न ही पेयजल, विद्युत, आवागमन तथा स्वास्थ्य जैसी की सुविधाएं। उनके जन्म स्थल पर शिलापट लगा एक चबूतरा, सम्मय माता मंदिर व राम जानकी मंदिर है जो स्थानीय लोगों के सहयोग से बना है। सवा दो बीघा जमीन मंदिर के नाम है उस पर भी अतिक्रमण है। पुजारी रमेश दास मंदिर की देख रेख व पूजा पाठ करते हैं।

जन्म भूमि न्यास कर रहा प्रयास

स्वैच्छिक संस्था पतंजलि जन्मभूमि न्यास योग ऋषि की जन्मभूमि को संरक्षित करके विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने के लिए करीब दो दशक से संघर्ष कर रहा है। न्यास के संस्थापक अध्यक्ष डा. स्वामी भगवदाचार्य द्वारा बीते वर्षों में संयुक्त राष्ट्र संघ के महा सचिव, प्रधान मंत्री सहित केंद्र व राज्य सरकार के कई मंत्रियों को पत्र भी लिखे गए। तीन साल पहले सपा शासनकाल में तत्कालीन जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन ने पतंजलि की जन्मस्थली के विकास के लिए अपर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था।

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किन्तु यह सिर्फ कागजी साबित हुई और समिति द्वारा कोई रिपोर्ट नहीं दी गई। राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद शासन के निर्देश पर जनपद, तहसील और विकास खण्ड स्तर पर तो योग दिवस का आयोजन किया गया। किन्तु कोंडर ग्राम में कभी कोई सरकारी आयोजन नहीं हुआ। इसका परिणाम है कि योग के मामले में भारत को विश्वगुरु बनाने की नींव रखने वाले महर्षि पतंजलि की जन्म स्थली की दशा और दिशा में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आया है।

रिपोर्ट- तेज प्रताप सिंह

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