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जब कोरोना से कन्फ्यूज होकर खुद पर ही हमला करने लगता है इम्यून सिस्टम

कोरोना वायरस से लड़ने के लिए आते हैं टी सेल्स। जैसे ही COVID-19  से लड़ने के लिए टी सेल्स सक्रिय होते हैं, ये साइटोकाइन रिलीज करते हैं।

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ShreyaBy Shreya

Published on 20 April 2020 1:03 PM GMT

जब कोरोना से कन्फ्यूज होकर खुद पर ही हमला करने लगता है इम्यून सिस्टम
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हमारा इम्यून सिस्टम हमारी बाहरी बीमारियों, बैक्टीरियाज और वायरस से लड़ने में मदद करता है। लेकिन क्या हो अगर इम्यून सिस्टम कन्फ्यूज होकर खुद को नुकसान पहुंचाने लगे। पढ़ने में अजीब लगता है, लेकिन कोरोना वायरस के ऐसे भी मामले सामने आ रहे हैं। इस तरह के केसेस को साइटोकाइन स्टॉर्म सिंड्रोम (Cytokine storm syndrome) कहा जाता है।

जब शरीर के इम्यून सिस्टम को बीमारी, बैक्टीरिया या वायरस कन्फ्यूज कर देता है तो शरीर में जो साइटोकाइन प्रोटीन मौजूद होता है, उसमें गड़बड़ी आ जाती है। जिससे ये बीमारी, बैक्टीरिया या वायरस को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं पर भी हमला करने लग जाता है।

बाहरी बीमारियों से शरीर की करता है रक्षा

बता दें कि आमतौर पर साइटोकाइन शरीर में मौजूद एक इम्यून प्रोटीन होता है जो बाहरी बीमारियों से शरीर की रक्षा करता है। लेकिन कोरोना के मामले में इसमें गड़बड़ी भी देखी जा रही है। बर्मिंघम स्थित अलाबामा यूनिवर्सिटी के डॉ. रैंडी क्रॉन का कहना है कि साइटोकाइन एक तरह का प्रतिरोधक प्रोटीन होता है जो शरीर से संक्रमण और कैंसर जैसी बीमारियों को भगाने में मदद करता है। लेकिन इसके अनियंत्रित होने पर यह व्यक्ति को काफी गंभीर रुप से बीमार कर सकता है या जान भी ले सकता है।

मृतकों में पाई गईं साइटोकाइन स्टॉर्म सिंड्रोम की समस्या

अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीस कंट्रोल (CDC) के अनुसार, अमेरिका में कोरोना के चलते मारे गए लोगों में से सबसे ज्यादा बुजुर्ग शामिल थें। जिनमें से 85 साल के ऊपर वायरस से मारे गए लोगों में से 27 फीसदी तक लोगों की मौत की वजह साइटोकाइन स्टॉर्म सिंड्रोम ही था। लेकिन साइटोकाइन से पहले बुजुर्गों की अन्य बीमारियों को भी देखना जरुरी होगा।

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वहीं 65 से 84 साल के बीच मारे गए लोगों में से 3 से 11 फीसदी की जान साइटोकाइन स्टॉर्म सिंड्रोम की वजह से गई है। जबकि 55 से 64 साल के बीच के लोगों में से 1 से 3 फीसदी लोगों की जान इसी से गई है। इसके अलावा 20 से 54 साल के बीच के लोगों में करीब 1 फीसदी से कम लोगों की मौत की वजह साइटोकाइन स्टॉर्म सिंड्रोम हैं।

फेफड़ों की कोशिकाओं पर हमला करते हैं वायरस

डॉ. क्रॉन ने बताया कि कोरोना वायरस हमारे शरीर की कोशिकाओं को अपने रहने, उन्हें बीमार करने और आखिरी में उन्हें खाकर नए वायरस पैदा करने के लिए इस्तेमाल करता है। कोरोना वायरस हमारे फेफड़ों की कोशिकाओं को इसलिए उपयोगी समझता है क्योंकि ये कोशिकाएं शरीर में मौजूद इम्यून सिस्टम को थोड़ी देर में रिस्पॉन्स करती हैं। जब कोरोना वायरस शरीर के इम्यून सिस्टम से छिपते हुए फेफड़ों की कोशिकाओं में जाता है तो वहीं से शरीर के अंदर शुरू होता है जीवन और मौत का असली युद्ध।

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कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सक्रिय होते हैं टी सेल्स

कोरोना वायरस से लड़ने के लिए आते हैं टी सेल्स। जैसे ही COVID-19 से लड़ने के लिए टी सेल्स सक्रिय होते हैं, ये साइटोकाइन रिलीज करते हैं। इनके चलते और टी सेल्स बनते हैं और वे और अधिक साइटोकाइन रिलीज करने लगते हैं। यानि कोरोना से लड़ने के लिए टी-सेल्स काफी ज्यादा मात्रा में बनने लगती हैं। फिर ये वायरस पर हमला करना शुरु करती है।

बता दें कि टी सेल्स का एक और प्रकार साइटोटॉक्सिक टी सेल्स भी है। साइटोटॉक्सिक टी सेल्स कोरोना वायरस और उससे संक्रमित कोशिकाओं को खोज-खोजकर मार डालते हैं। इससे कोरोना कोशिकाओं को खाकर ज्यादा वायतरस नहीं पैदा कर पाता है।

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टी सेल्स को ही भ्रमित करता है कोरोना

यहीं पर कोरोना वायरस साइटोटॉक्सिक टी सेल्स को भ्रमित करने की कोशिश शुरु करता है। क्योंकि जब हमारे शरीर में साइटोटॉक्सिक टी सेल्स वायरस से लड़ाई कर रहे होते हैं तो उसी समय एक अलग प्रकार का रसायन निकलता रहता है, जो टी सेल्स को यह इंडिकेट करता है कि अब दुश्मन निष्क्रिय हो चुके हैं, अब बस करो।

लेकिन कोरोना वायरस शरीर से निकलने वाले इस रसायन की मात्रा को कम-ज्यादा करने लगता है, जिससे ये टी सेल्स भ्रमित हो जाते हैं। इस परिस्थिति में ये और विकराल रुप ले लेते हैं। जिसके चलते ये टी सेल्स दुश्मन वायरस और उससे संक्रमित कोशिकाएं को मारने के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाओं को भी मारने लगते हैं।

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