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लोकसभा चुनाव 2019: क्या है नोटा और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

जब नोटा की व्यवस्था हमारे देश में नहीं थी, तब चुनाव में अगर किसी को लगता था कि उनके अनुसार कोई भी उम्मीदवार योग्य नहीं है, तो वह वोट नहीं करता था और इस तरह से उनका वोट जाया हो जाता था। ऐसे में मतदान के अधिकार से लोग वंचित हो जाते थे।

Aditya Mishra

Aditya MishraBy Aditya Mishra

Published on 13 March 2019 10:06 AM GMT

लोकसभा चुनाव 2019: क्या है नोटा और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
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नई दिल्ली: एसएसी-एसटी एक्ट में केंद्र सरकार द्वारा संशोधन कर फिर से उसके मूल स्वरूप में किये जाने पर सवर्ण समुदाय के लोगों में गुस्सा है। सवर्णों के बीच इस कदर आक्रोश है कि उनमें से अधिकांश लोग इस बार लोकसभा चुनाव में नोटा का इस्तेमाल करने की बात कर रहे हैं। उनका मानना है कि कि एसएसी-एसटी एक्ट को लेकर मोदी सरकार का रवैया भी कांग्रेस की तरह ही है, इसलिए उनके पास सिर्फ नोटा का ही विकल्प बचता है। तो आइये जानते हैं कि आखिर नोटा क्या है और किस तरह से होता है इसका इस्तेमाल?

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क्या है 'नोटा'?

नोटा (नन ऑफ द अबव) मतदाता को यह अधिकार देता है कि वह किसी खास सीट से चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार के लिए मतदान नहीं करें। साल 2009 में चुनाव आयोग ने नोटा संबंधी विकल्प को उपलब्ध कराने की मंशा जाहिर की थी। इसी पर नागरिक अधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने भी नोटा के समर्थन में एक जनहित याचिका दायर की। 27 सितंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया और चुनाव आयोग को ईवीएम में नन ऑफ़ अबव यानी नोटा का बटन उपलब्ध कराने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि नोटा का बटन देने से राजनीति दलों पर भी अच्छे चुनाव प्रत्याशी खड़े करना का दबाव रहेगा।

क्यों पड़ी नोटा की जरूरत?

जब नोटा की व्यवस्था हमारे देश में नहीं थी, तब चुनाव में अगर किसी को लगता था कि उनके अनुसार कोई भी उम्मीदवार योग्य नहीं है, तो वह वोट नहीं करता था और इस तरह से उनका वोट जाया हो जाता था। ऐसे में मतदान के अधिकार से लोग वंचित हो जाते थे। इसलिए निर्वाचन आयोग ने ऐसी व्यवस्था की कि वोटिंग प्रणाली में एक ऐसा तंत्र विकसित किया जाए ताकि यह दर्ज हो सके कि कितने फीसदी लोगों ने किसी को भी वोट देना उचित नहीं समझा है। यानी अब चुनावों में आपके पास एक और विकल्प होता है कि आप इनमें से कोई नहीं का भी बटन दबा सकते हैं। यानी आपको इनमें से कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है। ईवीम मशीन में NONE OF THE ABOVE यानी NOTA का गुलाबी बटन होता है।

ये है नोटा की ताकत

दरअसल, भारत निर्वाचन आयोग ने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में इनमें से कोई नहीं अर्थात नोटा (None of the above, or NOTA ) बटन का विकल्प उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। नोटा उम्मीदवारों को खारिज करने का एक विकल्प देता है। ऐसा नहीं है कि वोटों की गिनती की समय उनके वोटों को नहीं गिना जाता है। बल्कि नोटा में कितने लोगों ने वोट किया, इसका भी आकलन किया जाता है।

चुनाव के माध्यम से पब्लिक का किसी भी उम्मीदवार के अपात्र, अविश्वसनीय और अयोग्य अथवा नापसन्द होने का यह मत केवल यह सन्देश मात्र होता है कि कितने प्रतिशत मतदाता किसी भी प्रत्याशी को नहीं चाहते हैं।

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कब सबसे पहले इस्तेमाल हुआ नोटा?

नोटा का इस्तेमाल सबसे पहले 2013 में छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, मध्यप्रदेश और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के विधानसभा चुनाव में हुआ। इस चुनाव में 15 लाख लोगों ने नोटा का पहली बार इस्तेमाल किया। इसके बाद 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भी नोटा का इस्तेमाल किया गया। 2015 तक देशभर के सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नोटा का इस्तेमाल शुरू हो गया।

किसने डिजाइन किया नोटा का चिन्ह?

18 सितंबर 2015 को भारतीय चुनाव आयोग ने आधिकारिक रुप से नोटा का चिन्ह घोषित किया। इस चिन्ह को अहमदाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन ने बनाया। चुनाव आयोग ने घोषित किया कि यह चिन्ह सभी चुनाव प्रत्याशियों के आखिर में होगा।

किस-किस देश में इस्तेमाल होता है नोटा

नोटा का इस्तेमाल स्पेन, कोलंबिया, इंडोनेशिया, कनाडा, नार्वे, यूक्रेन, ब्राजील, बांग्लादेश, फिनलैंड, स्वीडन, चिली, फ्रांस, बेल्जियम में होता है।

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