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ये ह्यूमन कंप्यूटर: नाम शकुन्तला देवी, जाने क्यों कहा जाता हैं इन्हें ऐसा

गणितज्ञ, ज्योतिषी, लेखिका, बांसुरी वादक और मानव कंप्यूटर- ऐसी खूबियाँ किसी विलक्षण प्रतिभा वाले ही व्यक्ति में ही हो सकती हैं और शकुन्तला देवी ऐसी ही विलक्षण प्रतिभावाली थीं।

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NewstrackBy Newstrack

Published on 31 July 2020 11:59 AM GMT

ये ह्यूमन कंप्यूटर: नाम शकुन्तला देवी, जाने क्यों कहा जाता हैं इन्हें ऐसा
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नई दिल्ली: गणितज्ञ, ज्योतिषी, लेखिका, बांसुरी वादक और मानव कंप्यूटर- ऐसी खूबियाँ किसी विलक्षण प्रतिभा वाले ही व्यक्ति में ही हो सकती हैं और शकुन्तला देवी ऐसी ही विलक्षण प्रतिभावाली थीं।

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शकुन्तला देवी ऐसी गणितज्ञ थीं कि उन्होंने 13 अंक वाले दो नंबरों का गुणन केवल 28 सेकंड में बता कर 1982 में अपना नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज करा लिया था। उनकी ज्योतिष विद्या का ये हाल था कि बड़े-बड़े नेता उनसे सलाह लेते थे।

बंगलुरु के एक साधारण परिवार में 4 नवम्बर 1929 को जन्मीं शकुन्तला देवी बचपन से ही अद्भुत प्रतिभा की धनी और गणितज्ञ थीं। शकुन्तला देवी के पिता सर्कस में करतब दिखाते थे। तीन साल की उम्र में जब अपने पिता के साथ ताश खेल रही थीं तभी उनके पिता ने पाया कि उनकी बेटी में मानसिक योग्यता के सवालों को हल करने की क्षमता है।

6 साल की उम्र में दिखाया कमाल

शकुंतला ने 6 वर्ष की उम्र में मैसूर विश्वविद्यालय में एक बड़े कार्यक्रम में अपनी गणना क्षमता का प्रदर्शन किया। वर्ष 1977 में शकुंतला ने 201 अंकों की संख्या का 23वां वर्गमूल बिना कागज़ कलम के निकाल दिया। उन्होने 13 अंकों वाली 2 संख्याओं का गुणनफल 26 सेकंड बता दिया था। गरीबी के कारण शकुन्तला दस साल की उम्र में पहली बार स्कूल गयीं। माँ बाप के पास स्कूल की फीस - दो रुपया प्रति माह - देने के लिए भी पैसे नहीं थे लिहाजा तीन माह के बाद ही उन्हें स्कूल से चलता कर दिया गया। इसके बाद शकुन्तला ने स्कूली पढ़ाई नहीं की।

यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन

उन्होंने चार साल की उम्र से पहले ही यूनिवर्सिटी ऑफ मैसूर में एक बड़े कार्यक्रम में हिस्सा लिया और यही उनकी देश-विदेश में गणित के ज्ञान के प्रसार की पहली सीढ़ी बनी। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि पड़ोस के बच्चे भी उनकी मदद मांगने आते थे और धीरे-धीरे लोगों तक उनकी इस विशेष प्रतिभा की खबर पहुंचने लगी।

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बात करते करते सीखीं भाषाएं

शकुन्तला देवी ने बिना कोई पढ़ाई किये कई भाषाएँ सीखीं थीं। उनका कहना था कि लोगों से बात करते कटे उन्होंने ये सब सीख डाला। उन्होंने कहा था – मैं अंग्रेज़ी भी बोलती हूं, अंग्रेज़ी में उपन्यास भी लिखे हैं। तमिल में कहानियां भी लिखी हैं। ये भाषाएँ मैं बात करते करते सीख गई। अपनी प्रतिभा को भगवान की देन बताने वाली शकुंतला देवी गणित को एक कॉन्सेप्ट और लॉजिक मानती थीं। उन्होंने अपने इस हुनर का प्रदर्शन दुनिया भर के कॉलेज, थिएटर, रेडियो और टेलीविज़न शो पर भी किया।

फैक्ट फाइल

- अमेरिका में 1977 में शकुंतला ने कंप्यूटर से मुक़ाबला किया और 188132517 का घनमूल बता कर जीत हासिल की।

- 1980 में उन्होंने लंदन के इंपीरियल कॉलेज में 13 अंकों वाली दो संख्या का गुणनफल तत्काल निकाल कर दिखा दिया।

- शकुंलता देवी पर 1988 में कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर आर्थर जेंसन ने अध्ययन किया।

- ह्यूमन कंप्यूटर कहलाई जाने वाली शकुंतला देवी गणित के अलावा कुकरी पर भी किताबें लिख चुकी हैं।

- उन्होंने वर्ष 1977 में दी वर्ल्ड ऑफ होमोसेक्सुअल्स किताब लिखी जिसे भारत में समलैंगिकता पर पहली किताब भी कहा जाता है।

- 1969 में फ़िलीपीन्स विश्वविद्यालय ने उन्हें वुमेन ऑफ़ दी इयर का दर्जा देते हुए सम्मानित किया था। उन्हें रामानुजन गणित ज्ञाता का भी पुरस्कार दिया गया।

- बंगलुरु में 21 अप्रैल 2013 को उनकी मृत्यु हो गयी। उस समय उनकी आयु 83 साल की थी।

- उनकी एक बेटी अनुपमा बनर्जी भी है। 4 नवंबर 2013 को गूगल ने अपने डूडल को उनके नाम पर करते हुए सम्मानित किया था।

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