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डाक्टरों की 24 घंटे की सांकेतिक हड़ताल का, मिला-जुला रहा असर

नेशनल मेडिकल कमीशन बिल-2019 का विरोध करने के लिए आईएमए ने बुधवार सुबह छह बजे से अगले दिन सुबह छह बजे तक चिकित्सकों द्वारा सामान्य चिकित्सा सेवा नही देनेे लेकिन गंभीर मरीजों और आक्समिक चिकित्सा मरीजो को सेवा दिये जाने का आह्वान किया था।

SK Gautam

SK GautamBy SK Gautam

Published on 31 July 2019 4:56 PM GMT

डाक्टरों की 24 घंटे की सांकेतिक हड़ताल का, मिला-जुला रहा असर
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लखनऊ: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन नेशनल के आह्वान पर चिकित्सकों की 24 घंटे की सांकेतिक हड़ताल का बुधवार को मिलाजुला असर देखने को मिला। राजधानी लखनऊ में कई चिकित्सकों ने अपनी क्लीनक व नर्सिंग होम खुले रखे जबकि कई जगह हड़ताल का पूरा असर देखने को मिला।

गौरतलब है कि नेशनल मेडिकल कमीशन बिल-2019 का विरोध करने के लिए आईएमए ने बुधवार सुबह छह बजे से अगले दिन सुबह छह बजे तक चिकित्सकों द्वारा सामान्य चिकित्सा सेवा नही देनेे लेकिन गंभीर मरीजों और आक्समिक चिकित्सा मरीजो को सेवा दिये जाने का आह्वान किया था।

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एनएमसी बिल के अलोकतांत्रिक एवं तानाशाही प्रावधानों पर विरोध जताया

इस संबंध में बुधवार को आईएमए लखनऊ की जनरल बॉडी बैठक भी हुई, जिसमे कई चिकित्सकों ने हिस्सा लिया और एनएमसी बिल के अलोकतांत्रिक एवं तानाशाही प्रावधानों पर विरोध जताया । आईएमए लखनऊ के अध्यक्ष जीपी सिंह ने बताया कि इस बिल के द्वारा आने वाले समय मे गरीब जनता का स्वास्थ्य, अधकचरे, झोला छाप डॉक्टरों के हवाले कर दिया जायेगा ।

जिससे इलाज में अनगिनत कठिनाइयां आएंगी। इस बिल से निजी मेडिकल कालेज में चिकित्सा शिक्षा महंगी हो जायेगी, जिसका असर गरीब जनता पर पडेगा। उन्होंने सरकार से इस बिल को तत्काल प्रभाव से वापस लेने का अनुरोध किया।

आईएमए लखनऊ की सचिव डा. रमा श्रीवास्तव ने बताया कि अभी तक भारतीय चिकित्सा परिषद मे जाने माने प्रोफेसर और चिकित्सक देश की चिकित्सा शिक्षा के मानक तय करते थे लेकिन एनएमसी बिल में चिकित्सकों का प्रतिनिधित्व नहीं है और अब अफसरशाही के जरिये चिकित्सा शिक्षा को नियंत्रित किया जायेगा, जिससे चिकित्सा शिक्षा पर विपरीत असर पडेगा।

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इधर, आईएमए के आह्वान पर राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान लखनऊ के एमबीबीएस छात्रों ने काम बंद रखकर रैली की। इस रैली में उन्होंने लोगों को बिल के संदर्भ में जागरूक किया। छात्रों ने बताया कि कैसे एनएमसी बिल नॉन एमबीबीएस को मेडिकल प्रेक्टिस करने देगा और यह बिल मेडिकल फील्ड का निजीकरण कर देगा।

छात्रों ने नेक्स्ट एग्जाम का भी विरोध किया और पुरानी व्यवस्था लागू रखने मांग की

छात्रों ने मांग की एक स्टैंडिंग कमिटी का गठन हो जिसमें एमबीबीएस छात्र भी हो और इस कमेटी के द्वारा निर्णय लिया जाए कि एनएमसी बिल में क्या बदलाव करने सही रहेंगे। छात्रों ने नेक्स्ट एग्जाम का भी विरोध किया और पुरानी व्यवस्था लागू रखने मांग की। छात्रों का कहना था कि इस बिल के द्वारा देश की स्वास्थ्य सेवाओं को तबाह करने का पूरा इंतजाम हो चुका है।

एक तरफ सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में बहाली बंद है और डॉक्टरों के 50प्रतिशत से अधिक स्थान रिक्त पड़े हैं, डॉक्टरों की बढ़ती मांग की अनुपात में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की सीटों में वृद्धि करने की अपनी जिम्मेदारी से सरकार मुंह मोड़ चुकी है, वहीं निजी मेडिकल कॉलेजों को बढ़ावा देते हुए मेडिकल की पढ़ाई का पूरी तरह निजीकरण और बाजारीकरण करने का पूरा इंतजाम इस बिल में है।

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इसके अलावा महज छह महीने का ब्रिज कोर्स करा के होमियोपैथ और आयुर्वेद के चिकित्सकों को नेशनल मेडिकल रजिस्टर में जोड़ने का प्रावधान इस बिल में है। छात्रों ने सवाल किया कि क्या नेता, मंत्री और अफसर अपने परिवार का इलाज छह महीने का ब्रिज कोर्स किए चिकित्सकों से कराएंगे?

इन्हें अपने परिवार के लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में प्रशिक्षित विशेषज्ञ चाहिए, एम्स जैसी संस्थानों में वीआईपी सरकारी इलाज चाहिए, फिर गरीब जनता का इलाज अपर्याप्त प्रशिक्षण पाए छह महीने का ब्रिज कोर्स किए चिकित्सकों के भरोसे क्यों छोड़ दिया जाए ? उन्होंने सरकार से माँग की कि साल दर साल कम होते स्वास्थ्य बजट में बढ़ोत्तरी करके एमबीबीएस व पीजी की सरकारी सीटों में इजाफा किया जाए, सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को दुरुस्त करके रिक्त पदों को भरा जाए और इस जनविरोधी एनएमसी बिल को तत्काल वापस लिया जाए।

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