बड़ी खबर: यूपी में रोजाना हो रहा है 50 हजार पीपीई किट का उत्पादन

कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण लागू लाकडाउन से जहां देश के उद्योग-धंधों को खासा नुकसान पहुंचा है तो वहीं कुछ ऐसे नए उत्पादों के उद्योग भी शुरू हुए है, जिनकी संख्या देश में नही के बराबर थीे।

लखनऊ। कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण लागू लाकडाउन से जहां देश के उद्योग-धंधों को खासा नुकसान पहुंचा है तो वहीं कुछ ऐसे नए उत्पादों के उद्योग भी शुरू हुए है, जिनकी संख्या देश में नही ंके बराबर थीे। ऐसा ही एक उद्योग है पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) का निर्माण। विश्व में पीपीई किट के निर्माण में चीन के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच चुके भारत में इस समय पीपीई किट की उत्पादन क्षमता रोजाना 3 लाख है और इसमे केवल यूपी में ही रोजाना 50 हजार पीपीई किट का निर्माण हो रहा है। पीपीई किट के निर्माण में यूपी ने बहुत कम समय में अहम स्थान हासिल किया है।

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प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए

यूपी के प्रमुख सचिव (एमएसएमई) नवनीत सहगल ने बताया कि यूपी के एमएसएमई विभाग ने पीपीई इकाइयों की स्थापना को प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए हैं।

उन्होंने बताया कि लाकडाउन के समय में जब सभी उद्योगों में उत्पादन बंद हो चुका था उस समय यूपी के एमएसएमई विभाग ने पीपीई उत्पादन इकाइयों को प्रोत्साहित किया।

बीते दो महीने में ही यूपी में पीपीई किट बनाने वाली 58 फैक्ट्रियां लग चुकी है। जिसमे नोएडा में 18 और गाजियाबाद में 15, कानपुर में 15, मेरठ में तीन, लखनऊ में दो और बलिया, इटावा, आगरा, उन्नाव और लखीमपुर खीरी में पीपीई किट निर्माण की एक-एक यूनिट लगाई गई है।

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चिकित्सकों, नर्सों व पैरामेडिक स्टाफ

बता दे कि कोरोना वायरस के संक्रमण के इस दौर में पूरी दुनिया में पीपीई किट की बहुत ज्यादा मांग है। आईसीएमआर ने कोरोना वायरस के इलाज में लगे चिकित्सकों, नर्सों व पैरामेडिक स्टाफ के लिए पीपीई किट को अनिवार्य माना है।

कोरोना वायरस के भारत में पहुंचने के समय देश में पीपीई किट का निर्माण बहुत सीमित था। उस समय चीन व अन्य देशो से करीब 52 हजार पीपीई किट मंगाये गए थे। लेकिन कोरोना महामारी के दौर में लागू लाकडाउन के दौरान यूपी समेत देश के विभिन्न राज्यों में कई पीपीई किट निर्माण की फैक्ट्रियां शुरू हो गई है।

एक आकंलन के मुताबिक पीपीई किट का अगले एक साल में सिर्फ भारत में ही 10 हजार करोड़ रुपये का बाजार हो जाएगा। वहीं वैश्विक स्तर पर 60 बिलियन डालर की सालाना मांग अगले पांच वर्षों में होने की संभावना हैं।