सिधौली के बसपा विधायक डॉ. हरगोविंद भार्गवः प्रगति में गरीबी लाचारी बाधा नहीं

अधिकारियों पर हनक धमक दिखाना मेरी फितरत में नहीं है। सभी से प्यार से बात करता हूं, अच्छा व्यवहार करता हूं तो ज्यादातर काम हो ही जाते हैं। जो नहीं काम करते हैं उनकी शिकायत शासन में कभी की है, इस पर वो कहते हैं कि ऐसी जरूरत नहीं पड़ी। वैसे भी अगर शिकायत करेंगे भी तो कोई परिणाम नहीं निकलेगा।

BSP MLA Dr. Hargovind Bhargav

बसपा विधायक डॉ. हरगोविंद भार्गव (फोटो सोशल मीडिया)

पुतान सिंह

सीतापुर। अगर परिवार का मुखिया घर का माहौल पढाई लिखाई और अच्छे संस्कारों वाला होता है तो परिवार की तरक्की में गरीबी लाचारी कभी बाधा नहीं बन सकती है।

यह कर दिखाया है सिधौली के विधायक डॉ. हरगोविंद भार्गव ने। भार्गव शुरू से बसपा में रहकर राजनीति कर रहे हैं। अभी सिर्फ 43 साल के हैं लेकिन इनकी तरक्की के आयाम सुनकर कोई भी अनुसरण करना चाहेगा।

डॉ. भार्गव 2007 में पहली बार सिधौली से चुनाव जीते, 2012 में सपा से हार गए थे लेकिन 2017 में एक बार फिर जीत दर्ज कर ली। वे इस नाते क्षेत्र की जनता की सेवा कर रहे हैं।

पिता जी करते थे मजदूरी

न्यूज ट्रैक ने डॉ. भार्गव से फोन पर लंबी बातचीत की तो उन्होंने परिवार से लेकर हर पहलू पर अपना मत रखा। उन्होंने बताया कि उनके पिता राम दुलारे भार्गव मथुवापुर गांव में ही खेती किसानी के साथ ही मजदूर भी करते थे।

खेती करीब 57 बीघा है, लेकिन 40 साल पहले उपजाऊ नहीं होने के कारण जरूरी खर्चे पूरे करने के लिए दूसरों के यहां मजदूरी करनी पड़ती थी।

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ईश्वर ने तरक्की की लकीर खींच रखी थी जिस धैर्य के साथ चलते हुए पिता जी ने ही पूरे परिवार को कामयाब बनाया। बताते हैं कि पिता जी ने अपने भाइयों को पढ़ाया लिखाया।

दो चाचा बड़े पदों पर रहे। पिताजी ग्राम प्रधान भी रहे और सिधौली ब्लाक के ब्लाक प्रमुख भी रहे। आज भी वह इलाके की जनता के हित के लिए प्रयासरत रहते हैं।

सात भाई, सभी उच्च पदों पर

डा हरगोविंद भार्गव बताते हैं कि हम सात भाई हैं। पिता जी ने हम सभी को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए मार्ग दर्शन किया। हम सभी ने प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा सरकारी स्कूल कालेज से ही प्राप्त की।

कक्षा पांच तक तो गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़े। बताते हैं कि बड़े भाई जेपी भार्गव सीएमओ के पद से रिटायर हुए हैं। उनसे छोटे हरीश भार्गव महोबा जिला सहकारी बैंक में जीएम हैं।

उनसे छोटे सतीश भार्गव डीजीएम हैं तो चौथे नंबर के रामशंकर भार्गव 1998 में मिश्रिख सीट से बसपा से सांसद भी रहे अब वकालत करते हैं। पांचवे नंबर के हरिशंकर भार्गव कृषि निदेशालय में उच्च पद पर हैं।

छठे नंबर के कैलाश भार्गव मंडी में डीडीए में कार्यरत हैं। विधायक डॉ. भार्गव बताते हैं कि मैं सबसे छोटा हूं। मैं भी इलाहाबाद स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद राज्य यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर तैनात हूं।

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शासनादेश के तहत विधायक के पद पर रहते अवैतनिक अवकाश पर रहूंगा। अगर विधायक न रहा तो यह अवकाश खत्म हो जाएगा। नौकरी ज्वाइन करनी पड़ेगी।

इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक साधारण परिवार किस तरह से फर्श से अर्श तक पहुंचा। इतना ही नहीं, विधायक का कहना है कि सिक्किम की एक यूनिवर्सिटी ने ढाई लाख रूपये प्रतिमाह का आफर दिया है, जब चाहूं वहां ज्वाइन कर सकता हूं। फिलहाल जनता की सेवा जारी है।

विधायक निधि जरूरी है

डा भार्गव कहते हैं कि विधायक निधि बहुत जरूरी है। कहते हैं कि जनता जब सडक, नाली, नल जैसे काम के लिए आती है तो इसी निधि से उनकी जरूरतें पूरी कर पाते हैं।

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अगर निधि न हो तो जनता के ये काम भी नहीं हो पाएंगे। कहते हैं कि जो विधायक निधि का पैसा हड़पते हैं उन पर कडी कार्रवाई हो। उन्होंने बताया कि मैं तो सीडीओ को प्रस्ताव भेज देता हूं।

काम में कोई गडबडी होती है तो कार्रवाई कराई की जाती है। बताते हैं कि पैसा कमाने के लिए राजनीति में नहीं आया हूं।

अधिकारी तो सत्ता पक्ष के विधायक की भी नहीं सुनते

विधायक का कहना है कि अधिकारी जब सत्ता पक्ष के विधायकों की ही नहीं सुनते तो फिर मेरी क्या सुनेंगे। तो आप जनता के काम कैसे कराते हैं, इस सवाल पर वह कहते हैं कि जनता के भी छोटे मोटे काम होते हैं।

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अधिकारियों पर हनक धमक दिखाना मेरी फितरत में नहीं है। सभी से प्यार से बात करता हूं, अच्छा व्यवहार करता हूं तो ज्यादातर काम हो ही जाते हैं। जो अधिकारी नहीं काम करते हैं उनकी शिकायत शासन में कभी की है, इस सवाल पर वो कहते हैं कि ऐसी जरूरत नहीं पड़ी। वैसे भी अगर शिकायत करेंगे भी तो कोई परिणाम नहीं निकलेगा।

अटरिया में कन्या डिग्री कालेज का सपना है

डॉ. भार्गव बताते हैं कि सिधौली क्षेत्र में सडक, अस्पताल, फायर स्टेशन जैसे तमाम काम कराए हैं। लेकिन क्षेत्र के अटरिया कस्बे में कन्या डिग्री कालेज की स्थापना करने का सपना है जिसे पूरा करना है।

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बताते हैं कि अटरिया के आसपास के बालिकाएं इंटर के बाद पढ़ने के लिए तरस जातीं हैं। क्योंकि यहां प्राइवेट कालेज भी नहीं है।

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