दीपक सिंघलः योगी से मिला था क्लीन चिट, नये विवाद के चलते फिर चर्चा में

दीपक सिंघल जहां भी रहे हैं, वहाँ उनने कोई न कोई कहानी ज़रूर रची है। कहा जाता है कि जब वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर उर्वरक महकमे में तैनात थे तो उस समय के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की इनके एक फ़ैसले पर नाराज़गी के चलते इन्हें आनन फ़ानन में अपने होम कॉडर वापस लौटना पड़ा था।

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पूर्व मुख्य सचिव दीपक सिंघल (फोटो सोशल मीडिया)

योगेश मिश्र

बड़े बड़े मामलों में बचते बचाते चले आ रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव दीपक सिंघल आख़िरकार लपेटे में आ ही गये। हालाँकि रिवर फ़्रंट जैसे बड़े घोटाले में ईमानदार मुख्यमंत्री की छवि वाले योगी आदित्यनाथ से वह क्लीनचिट पाने में कामयाब रहे हैं । वह भी तब जबकि अखिलेश सरकार की यह महत्वाकांक्षी परियोजना योगी सरकार को शुरू से ही खटकती रही है। योगी सरकार ने इस योजना की सीबीआई जाँच के भी आदेश दिये। अखिलेश सरकार को घेरने के लिए योगी ने इसी परियोजना को हथियार बनाया था।

विवादों में क्लीनचिट

हद तो यह है कि योगी सरकार ने दीपक सिंघल को क्लीन चिट देते समय इस तथ्य को भी नज़र अंदाज किया कि केवल मुख्य सचिव के पद पर रहते हुए परियोजना की पर्यवेक्षणीय ज़िम्मेदारी निभाने वाले आलोक रंजन को क्लीन चिट नहीं दी गयी।

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जबकि दीपक सिंघल ने मुख्य सचिव के रूप में न केवल पर्यवेक्षणीय दायित्व का निर्वाह किया था बल्कि सिंचाई महकमे के अपर मुख्य सचिव रहते हुए इस योजना को पास कराने से लेकर ज़मीन पर उतारने तक की सारी ज़िम्मेदारी निभायी।

अखिलेश सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना रिवरफ्रंट निर्माण के समय से ही विवाद का सबब रही है। इस परियोजना पर अनाप-शनाप धन खर्च करने के आरोप शुरू से लगते आए हैं।

ब्लैक लिस्टेड कंपनी को ठेका

ब्लैक लिस्टेड कंपनी को ठेका देने और मानक से अधिक धनराशि खर्च करने की बात भी उठती रही है। जिस दिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यालय में इस परियोजना का पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन था उस दिन भी शिवपाल सिंह यादव वहां नहीं थे। जबकि वह उन दिनों सिंचाई मंत्री थे।

परियोजना में निर्माण की लागत की दर सब व्यय वित्त समिति से पास हुए थे। इसीलिए जब राज्य में योगी सरकार आई और उसने इस परियोजना पर सवाल उठाया तो उसकी जद में मुख्य सचिव राहुल भटनागर भी आ गये।

राहुल भटनागर को क्लीन चिट, आलोक रंजन दोषी

हालांकि जब सरकार ने इस परियोजना की जांच सेवानिवृत्त न्यायाधीश आलोक कुमार सिंह की अगुवाई वाली समिति से कराई तब उस समिति ने राहुल भटनागर को क्लीनचिट देते हुए मुख्य सचिव रहे आलोक रंजन को पर्यवेक्षणीय शिथिलता का दोषी माना।

alok ranjan

इस समिति में आईआईएम लखनऊ के प्रो. एके गर्ग और आईआईटी बीएचयू के यूके चौधरी भी थे। इस समिति ने तो अपनी रिपोर्ट में बेहद विरोधाभासी तथ्य दिए। एक ओर कमेटी ने कहा कि पूर्व मुख्य सचिव का दायित्व बनता है।

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मगर कमेटी ने उस समय के मुख्य सचिव राहुल भटनागर को क्लीनचिट थमा दी, वह भी तब जब पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन के पूरे कार्यकाल में इस परियोजना पर छह सौ करोड़ रुपये खर्च हुए थे। राहुल भटनागर के कार्यकाल में रिवरफ्रंट पर नौ सौ करोड़ रुपये खर्च हुए।

दीपक सिंघल के खिलाफ सिफारिश

आलोक सिंह समिति की रिपोर्ट के परीक्षण के लिए मंत्री सुरेश खन्ना की अगुवाई में एक दूसरी कमेटी बनी। जिसमें आईएएस अफसर प्रवीर कुमार और अनूप पांडेय भी थे। इस कमेटी ने कहा कि जिन अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कृत्य बनता है उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई जाए।

पर्यवेक्षणीय दायित्व की शिथिलता जिन्होंने बरती हो उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए। आठ अभियंताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई। दीपक सिंघल और आलोक रंजन के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई।

जहां रहे वहां फसाना

हैरतंगेज यह है कि इस परियोजना के निर्माण के दौरान प्रमुख सचिव वित्त और मुख्य सचिव दोनों पदों पर तैनात रहने वाले राहुल भटनागर को जांच में जिम्मेदार नहीं पाया गया। प्रमुख सचिव सिंचाई और मुख्य सचिव दोनों पदों पर रहने के बावजूद दीपक सिंघल को राज्य सरकार ने विभागीय कार्रवाई से छूट प्रदान कर दी।

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दीपक सिंघल जहां भी रहे हैं, वहाँ उनने कोई न कोई कहानी ज़रूर रची है। कहा जाता है कि जब वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर उर्वरक महकमे में तैनात थे तो उस समय के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की इनके एक फ़ैसले पर नाराज़गी के चलते इन्हें आनन फ़ानन में अपने होम कॉडर वापस लौटना पड़ा था। अब जब वह नये विवाद में हैं तब योगी सरकार का दिया क्लीनचिट भी विवाद की जद में आ गया है।

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