मौसम से मचा हाहाकार: पलायनको मजबूर प्रवासीय मजदूर, नहीं बचा कोई रास्ता

लॉकडाउन के बाद बड़ी तादात में प्रवासीय मजदूर अपने गांव वापिस आये थे। गांव वापिसी के समय उन सबने तय किया था कि अब वह शहर नहीं जायेगे।

Published by Roshni Khan Published: August 2, 2020 | 1:05 pm

झांसी: लॉकडाउन के बाद बड़ी तादात में प्रवासीय मजदूर अपने गांव वापिस आये थे। गांव वापिसी के समय उन सबने तय किया था कि अब वह शहर नहीं जायेगे। गांव में ही अपनी रोजी रोटी की तलाश करेगे, उन्होंने आकर कोशिश भी की, रोजगार के अवसरों के रूप में उनको हाथ में सिर्फ मनरेगा आयी। जिसमें उन्हें जरूरत के हिसाब से रोजगार नहीं मिल पाया।

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जालौन के कुठौंद ब्लॉक के कुरेपुरा कनार गांव की प्रधान सुनीता गुप्ता बताती है

जालौन के कुठौंद ब्लॉक के कुरेपुरा कनार गांव की प्रधान सुनीता गुप्ता बताती है कि प्रवासीय मजदूरों को उनकी जरूरतों के हिसाब से मनरेगा से काम देने में कई तकनीकि बधायें है। जैसे ई-मास्टररोल में जब किसी मजदूर के 85 दिन से अधिक काम हो जाता है तो मनरेगा की इट्री होना बंद हो जता हैं। मनरेगा के यदि एक ही परिवार के दो भाई है और वह एक ही चूल्हे के खाना पकाते है तो एक ही जॉब कॉर्ड होता है जबकि बुन्देलखण्ड असंतुलित लिंग अनुपात के कारण शादियां काफी कम होने लगी है। 25 साल का नौजवान भी अपने भाई के साथ ही जॉबकार्ड में शामिल रहता है। जिसके कारण 100 दिन की जगह मात्र 50 दिन का काम ही मिल पाता है। मनरेगा के तकनीकि प्रावधानों के कारण पंचायतें चाहकर भी मजदूरों को काम नहीं दे पायी।

वही पंचायतों पर कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता रानीपुर के नत्थू सिंह तोमर बताते है कि पंचायतों के चुनाव टलने की आहट के कारण भी मजदूरों को गांव छोडकर वापिस जाना पड रहा है जो लोग पंचायत चुनाव में उम्मीदवार होने वाले थे प्रवासीय मजदूरों को तरह-तरह की सुविधाऐं देने की होड में लगे थे जैसे बिना ब्याज के ऋण, फ्री में खेतों की जुताई, भूसा व अनाज दे रहे थे। लेकिन चुनाव टलने की आहट से उम्मीदवारों ने अपने हाथ सिकोड लिये। जिसके कारण मजदूरों के सामने पलायन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।

मजदूरों के मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता श्रीकृष्ण बताते

मजदूरों के मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता श्रीकृष्ण बताते है कि रक्षाबंधन एवं जन्माष्टमी के त्योहार खत्म होने पर लोग और भी अधिक पलायन करेगे।

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जल जन जोडो अभियान के राष्टीय संयोजक संजय सिंह कहते है कि मौसम की बेरूखी ने पलायन को अत्यधिक बढाया है जुलाई माह में झांसी में लगभग 200 मीमी के आस-पास वर्षा हुयी है जबकि इन दिनों में 350 मीमी से ज्यादा वर्षा हो जानी चाहिए। अल्पवर्षा के कारण किसान परेशान है, क्योंकि खरीफ की फसल में उसे दो फसल बोनी पडी है। अल्पवर्षा से फसल की स्थिति कमजोर दिखायी दे रही है जिसके कारण लोग खेती छोडकर शहर की तरफ पलायन कर रहे है।

प्रगतिशील किसान भगवान सिंह चैहान कहते है कि झांसी जिले सहित बुन्देलखण्ड के कई जिलो में धान की खेती किसान बडे पैमाने पर करने लगे है, इस वर्ष वर्षा ना होने के कारण लोग भूगर्भीय जल निकालकर धान की रूपाई कर रहे है। बांधों में इतना पानी नहीं है कि नहरे चलाई जा सके। इसको ध्यान में रखते हुए टयूबवेल से पानी ले रहे है जिसके कारण भूगर्भीय जल स्तर नीचे जा रहा है।

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