कोविड-19 से बिगड़ी अर्थव्यवस्था, सुधार के लिए दी गयी ये सलाह

कोविड-19 महामारी के कारण भारत की आर्थिक व्यवस्था को बहुत नुकसान हुआ है और इसको पुनर्जीवित करने के लिए हम सभी को एकजुटता से कार्य करना होगा और भविष्य के लिए एक रूपरेखा तैयार करनी होगी

Published by Ashiki Patel Published: June 7, 2020 | 7:29 pm

मेरठ: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के राजनीति विज्ञान विभाग एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ के तत्वाधान में पन्द्रह दिवसीय ई-कार्यशाला “कोविड-19 के साथ जीवन: स्वावलंबी भारत की रूपरेखा” विषय पर आयोजित ई-कार्यशाला के चौदहवें दिन प्रथम सत्र के मुख्य वक्ता प्रोफेसर आलोक कुमार राय कुलपति लखनऊ विश्वविद्यालय ने स्वावलंबी समाज के आर्थिक प्रबंधन के पहलुओं पर बोलते हुए कहा की वर्तमान समय में कोविड-19 के कारण शिक्षा जगत के समक्ष बहुत सी नवीन चुनौतियां उपस्थित हुई हैं, जिसमें छात्रों से संवाद, अध्ययन अध्यापन एवं शोध कार्य किस प्रकार सुचारु रुप से अकादमिक जगत से जुड़े हुए विद्वत जन कर सकते हैं।

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उन्होंने कहा कि लखनऊ विश्वविद्यालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशित नियमों के अंतर्गत ऐसे पोर्टल का निर्माण किया है जिसमें विद्यार्थियों के लिए उनकी कक्षाएं एवं व्याख्यानों की जानकारी उनके अध्ययन अध्यापन की सामग्री और विद्यार्थियों से किस प्रकार संवाद बना रहे और कोविड-19 में विद्यार्थियों से उनके मानसिक स्थिति एवं स्वास्थ्य की भी परिचर्चा के लिए अलग से काउंसलिंग पोर्टल बनाया गया है।

प्रोफेसर आलोक कुमार राय ने कहा कि इस कोविड-19 महामारी के कारण भारत की आर्थिक व्यवस्था को बहुत नुकसान हुआ है और इसको पुनर्जीवित करने के लिए हम सभी को एकजुटता से कार्य करना होगा और भविष्य के लिए एक रूपरेखा तैयार करनी होगी की किस प्रकार हम दोबारा से आर्थिक गतिविधियां जो रुक गई हैं उनको दोबारा से शुरू कर सके। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के रोजगार छूट गए हैं वह रोजगार उनके लिए किस प्रकार सर्जित किए जाएं एवं हमारे पास जो संसाधन उपलब्ध हैं उनका प्रयोग हम स्वदेशी के आधार पर अपने अनुकूल एवं समाज के लिए किस रूप में कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमें आर्थिक एवं प्रबंधन के क्षेत्र में और अधिक अनुसंधान एवं अध्ययन करने की आवश्यकता है जिससे हम आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकें।

अंग्रेजों ने तो इतिहास का लेखन अपने अनुसार किया

द्वितीय सत्र के मुख्य वक्ता प्रोफेसर रत्नम सदस्य सचिव भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद नई दिल्ली ने स्वाबलंबी समाज के ऐतिहासिक आयाम विषय पर बोलते हुए कहा कि भारत के इतिहास एवं परंपरा गौरवशाली है जिस पर हम सभी को गर्व करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के आने के बाद और स्वतंत्रता के बाद जिन लोगों के हाथों में सत्ता आई उन्होंने इतिहास का लेखन निष्पक्ष होकर नहीं किया या कह सकते हैं कि अंग्रेजों ने तो इतिहास का लेखन अपने अनुसार इसलिए किया जिससे वह भारतीय लोगों पर लंबे समय तक शासन कर सकें और उनकी जो ज्ञान परंपरा है उसको भुला सके एवं अपने आप को उनसे श्रेष्ठ सिद्ध कर सके।

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जबकि स्वतंत्रता के पश्चात जो इतिहास लेखन कार्य किया गया वह शासन प्रशासन के अनुसार किया गया, जिसमें से भारतीय संस्कृति एवं परंपरा के बारे में भारतीय लोग और आने वाली पीढ़ी उसके बारे में ना जान सके इसी षड्यंत्र के तहत किया गया।

उन्होंने कहा कि हमारी परंपरा एवं संस्कृति में वे सभी तत्व विद्यमान हैं जो वर्तमान समय की विकसित देश एवं आधुनिक विज्ञान की व्यवस्था अवस्था में हैं। हम भारतीय लोग अपनी ज्ञान विज्ञान से अनभिज्ञ है और एक उसका मुख्य कारण मातृभाषा में कमी या यूं कहें कि स्वभाषा में तकनीकी एवं उच्च शिक्षा का उपलब्ध ना होना है। उन्होंने कहा कि हमें इतिहास का पुनर्लेखन करना होगा और उसमें भारतीय मूल्य एवं ज्ञान परंपरा को सर्वाधिक महत्व देनी होगा और वर्तमान समय की पीढ़ी को एवं आने वाली पीढ़ियों को बताना होगा कि हमारे यहां चिंतन परंपरा में वह सभी तत्व विद्यमान थे और आज भी हैं जो कि एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए एवं विश्व गुरु बनने के लिए आवश्यक है।उन्होंने अपनी बातों को संदर्भ एवं तथ्यों के द्वारा स्पष्ट किया।

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इससे पहले प्रोफेसर पवन कुमार शर्मा विभागाध्यक्ष राजनीति विज्ञान विभाग एवं निदेशक पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि भारतीय इतिहास का जो लेखन किया गया है वह उपनिवेशी वृत्तांतो के आधार पर किया गया है। उन्होंने कहा कि अंग्रेज यह चाहते थे कि भारतीय लोग अपनी व्यवस्थाओं एवं ज्ञान परंपरा को किस प्रकार भुला पाए और वह भारत पर लंबे समय तक शासन किस प्रकार कर सकते हैं।

इसलिए उन्होंने अंग्रेजी शिक्षण पद्धति भारत में लागू की और उसी का ही प्रचार प्रसार किया जिससे भारतीय लोग अपनी मातृभाषा विशेषतः संस्कृत भाषा में प्राचीन भारतीय साहित्य एवं ज्ञान रचित किया गया है उससे दूर होते चले गए और हम विदेशी व्यवस्थाओं एवं ज्ञान परंपराओं के अधीन होते चले गए। उन्होंने कहा कि हमें भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रीय परंपराओं को जानने एवं अध्ययन करने की आवश्यकता है जिससे हम भारत के खोए हुए गौरव को एवं गौरवशाली परंपरा को पुनर्स्थापित कर सकें।

रिपोर्ट: सुशील कुमार

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