स्वामी चिन्मयानन्द के जमानत अर्जी पर हाईकोर्ट में सुनवाई

पीड़िता जब सुप्रीम कोर्ट में पेश हुई तो उ.प्र. में न जाकर दिल्ली में रहने और पिता से मिलने का व आगे की कार्यवाही की बात की थी वकीलों की सलाह से दिल्ली में शिकायत की गयी। अधिवक्ता का यह भी कहना है कि लुटियन गिरोह हिन्दू संतों को बदनाम करने के प्रयास में जुटा है।

प्रयागराज: एलएलएम छात्रा से दुराचार के आरोपी पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानन्द की जमानत अर्जी की सुनवाई जारी है। बहस शुक्रवार को भी होगी। अर्जी की सुनवाई न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी कर रहे हैं  याची अधिवक्ता का कहना है कि स्वामी को ब्लैकमेलिंग की गयी। मांग न मानने पर दुराचार के फर्जी केस में फंसाया गया है। पीड़िता के पिता ने लापता होने की प्राथमिकी दर्ज कराई है।

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ब्लैकमेलिंग कर 5 करोड़ की रंगदारी मांगी गयी

जबकि वह अपने दोस्तों के साथ स्वयं रक्षा बंधन से पहले शाहजहापुर छोड़ चुकी थी और लगातार फोन पर परिवार के सम्पर्क में थी। ब्लैकमेलिंग कर 5 करोड़ की रंगदारी मांगी गयी। पीड़िता जब सुप्रीम कोर्ट में पेश हुई तो उ.प्र. में न जाकर दिल्ली में रहने और पिता से मिलने का व आगे की कार्यवाही की बात की थी वकीलों की सलाह से दिल्ली में शिकायत की गयी। अधिवक्ता का यह भी कहना है कि लुटियन गिरोह हिन्दू संतों को बदनाम करने के प्रयास में जुटा है।

धर्म को बदनाम करने के लिए झूठा आरोप लगाया गया है। पीड़िता के अधिवक्ता का कहना था है कि स्वामी ने जघन्य अपराध किया है। वीडियो का साक्ष्य भी है। एक साध्वी ने भी ऐसा आरोप लगाया था। आरोपी के प्रभाव के कारण उसे झूठे आरोप में फंसाया गया है। सुनवाई जारी है।

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मुआवजा देने के मानवाधिकार आयोग के आदेश पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप से इंकार

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर के जहानाबाद में रहने वाले अंसारुल हक को एक लाख रुपये मुआवजा देने के राज्य मानवाधिकार के आदेश पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति बी.के. नारायण तथा न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खण्डपीठ ने राज्य सरकार की याचिका को खारिज करते हुए दिया है। 2016 में मकर संक्रांति के दिन हुए बलवे में हक की एक आँख फूट गयी और सर में गम्भीर चोट लगी थी।

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मुआवजे के तौर पर सरकार की तरफ से 20 हजार दिए गए। शिकायत पर मानवाधिकार आयोग ने जाँच कर एक लाख रूपये देने का आदेश दिया। जिसे राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने अनुच्छेद 226 के अंतर्गत आयोग के मुआवजा देने के आदेश के खिलाफ प्रदेश सरकार की याचिका पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और आयोग के आदेश को कानून के विपरीत नहीं माना।