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कौन है हिन्दी का शेक्सपियर जिसे यूपी सरकार के मंत्री भी आज कर रहे हैं नमन

उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ब्रजेश पाठक ने सोशल मीडिया पर शनिवार की सुबह रांघेय राघव का स्मरण हिन्दी का शेक्सपियर कहकर किया और उनके प्रति अपने श्रद्धा भाव का प्रदर्शन किया

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NewstrackBy Newstrack

Published on 12 Sep 2020 10:48 AM GMT

कौन है हिन्दी का शेक्सपियर जिसे यूपी सरकार के मंत्री भी आज कर रहे हैं नमन
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लखनऊ: वह मूल तौर पर तमिल भाषी थे लेकिन 39 साल की अल्पायु में उन्होंने हिन्दी के उपन्यास एवं अन्य साहित्यिक कृतियों की ऐसी झडी लगा दी कि उनके प्रतिद्वंदी कहने लगे कि वह दोनों हाथों से लिखते हैं। उनके मित्रों की मानें तो उन्हें रचनाओं की रूपरेखा तैयार करने में वक्त लगता था बाकि उपन्यास तो वह उतने ही समय में लिख देते थे जितना वक्त कोई उसे पढने में लेगा।

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हिन्दी के इकलौते साहित्यकार

उन्होंने भारत की इतिहास भूमि पर आधारित रचनाओं का सृजन किया तो हिन्दी के इकलौते साहित्यकार भी हैं जिसने अंग्रेजी के महान नाटककार विलियम शेक्सपियर के दस नाटकों का हिन्दी में अनुवाद किया। उनके यह अनुवाद आज तक हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ अनुवादों में शामिल किए जाते हैं। उनकी इसी मौलिकता ने उन्हें हिन्दी का शेक्सपियर बना दिया। उनका पूरा नाम तिरूमल्लै नंबकम वीरराघव आचार्य है लेकिन उन्हें अपना रचनाधर्मी नाम रांघेय राघव सर्वाधिक प्रिय रहा। उनके लाखों पाठक भी उन्हें इसी नाम से जानते हैं।

हिन्दी का यह शेक्सपियर कौन है?

उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ब्रजेश पाठक ने सोशल मीडिया पर शनिवार की सुबह रांघेय राघव का स्मरण हिन्दी का शेक्सपियर कहकर किया और उनके प्रति अपने श्रद्धा भाव का प्रदर्शन किया तो युवा पीढी के कई साथियों का सहज सवाल था कि हिन्दी का यह शेक्सपियर कौन है? रांघेय राघव को हिन्दी पाठकों के बीच उसी तरह की लोकप्रियता हासिल है जैसी प्रेमचंद और यशपाल सरीखे साहित्यकारों को मिली है। तमिलनाडु की सीमा पर स्थित प्रसिद्ध तीर्थ स्थल तिरुपति, आंध्र प्रदेश में स्थित है।

यही उनके पिता रंगाचार्य का मूल निवास है लेकिन तिरुपति मंदिर के पुजारी होने की वजह से उनमें कई लोगों की आस्था रही। उत्तर प्रदेश में आगरा व मथुरा की सीमा पर स्थित भरतपुर रियासत के राजा उन्हें अपने साथ ले आए।



आगरा में हुआ जन्म

रांघेय राघव का जन्म 17 जनवरी 1923 को आगरा में हुआ। बताया जाता है कि महज 13 साल की उम्र में उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। 1946 में उनका उपन्यास घरौंदा प्रकाशित हुआ जिसने उन्हें प्रगतिशील लेखक की पहचान दिलाई। इसके बाद तो अगले 15-16 साल में उन्होंने इतना लिखा कि कई लेखकों के पूरे जीवन भर के लेखन से भी ज्यादा है। उन्होंने अपनी कृतियों में लोकमंगल से जुडकर युगीन सत्य को खोजने की कोशिश की । मानवतावाद ही उनकी रचनाओं का शिखर बिन्दु है। उनके प्रशंसक उन्हें स्थापित रचनाकारों- लेखकों की साहित्यिक कृतियों का कृतियों के माध्यम से जवाब देने के लिए भी उन्हें याद करते हैं।

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भगवतीचरण वर्मा की प्रसिद्धि कृति टेढे-मेढे रास्ते के विपरीत उन्होंने सीधा-सादा रास्ता और आनंदमठ के मुकाबले में विषादमठ की रचना की। प्रेमचंद के बाद के रचनाकारों में उनकी तीव्रता और विचार प्रवणता सबसे विलक्षण है। ऐतिहासिक विषयों पर लेखन में रांघेय राघव अत्यंत विरले हैं। उनके तत्कालीन लेखकों भगवती चरण वर्मा और आचार्य चतुरसेन की ऐतिहासिक दृष्टि भारत श्रेष्ठता के भाव से भरी है लेकिन रांघेय राघव ने इतिहास का भावनाओं में बहे बगैर विवेचन किया है।

उन्होंने खुद एक बार बताया था कि महाभारत के बाद महात्मा बुद्ध, फिर गुप्त सम्राटों के काल तक भारत में निरंतर जातियों का अंतर्मिलन चला है। इसके बाद के भारत में आर्य, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, गरुड, पिशाच, असुर और अनेक जातियां आपस में घुल - मिल गईं। इनके मिलने से इनके देवता भी मिल गए। विष्णु, शिव, गरुड, पार्वती, वासुकी, कुबेर, पुलस्त्य, शाक्त, वृत्र आदि में परस्पर मैत्री भाव दिखाई दिया। लेकिन इसके बाद भारत में यवन, शक, कुषाण, पहलव आदि जातियां आईं जो भारत में घुल-मिल गईं। इसी अंतर्मिलन को प्रकट करने वाली कथाएं मैंने लिखी हैं।

सभी विधाओं में खुद को आजमाया

रांघेय राघव ने उपन्यास, कहानियां, रिपोर्ताज सभी विधाओं में खुद को आजमाया। शुरुआत उन्होंने कविता लेखन से की लेकिन पहचान उन्हें गद्य लेखन ने दिलाई। उन्हें आधुनिक स्त्री विमर्श का पूर्व पुरुष भी कहा जाता है। अपनी रचनाओं में उन्होंने समाज को स्त्री नजरिए से देखने की कोशिश की जबकि उस वक्त हिंदी साहित्य में आधुनिक स्त्री विमर्श का पदार्पण भी नहीं हुआ था। उनकी कहानी गदल को आधुनिक स्त्री विमर्श का आधार माना जाता है । कई साहित्यकार तो यह भी मानते हैं कि कृष्णा सोबती के उपन्यास मित्रो मरजानी की पूर्व पीठिका रांघेय राघव की कहानी गदल है। ांघेय राघव ने कैंसर रोग ग्रस्त होने पर 12 सितंबर 1962 को मुंबई में अपने नश्वर शरीर का त्याग किया

साहित्यिक परिचय

शेक्सपियर के नाटक जिनके अनुवाद से हुए अमर हुए राघव

जैसा तुम चाहो, हैमलेट, वेनिस का सौदागर, ऑथेलो, निष्फल प्रेम, परिवर्तन, तिल का ताड़, तूफान, मैकबेथ, जूलियस सीजर, बारहवीं रात।

राघव के उपन्यास

विषाद मठ, उबाल, राह न रुकी, बारी बरणा खोल दो, देवकी का बेटा, रत्ना की बात, भारती का सपूत, यशोधरा जीत गयी, घरौंदा, लोई का ताना, लखिमा की आँखें, मेरी भव बाधा हरो, कब तक पुकारूँ,पक्षी और आकाश, चीवर, राई और पर्वत, आख़िरी आवाज़, बन्दूक और बीन।

कहानी संग्रह

कहानियाँ : पंच परमेश्वर, अवसाद का छल, गूंगे, प्रवासी, घिसटता कम्बल, पेड़, नारी का विक्षोभ, काई, समुद्र के फेन, देवदासी, कठपुतले, तबेले का धुंधलका, जाति और पेशा, नई जिंदगी के लिए, ऊंट की करवट, बांबी और मंतर, गदल, कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेक्नीक्स, जानवर-देवता, भय, अधूरी मूरत। दधीचि और पिप्पलाद, दुर्वासा, परशुराम, तनु, सारस्वत, देवल और जैगीषव्य, उपमन्यु, आरुणि (उद्दालक), उत्तंक, वेदव्यास, नचिकेता, मतंग, (एकत, द्वित और त्रित),

ऋष्यश्रृंग, अगस्त्य, शुक्र, विश्वामित्र, शुकदेव, वक-दालभ्य, श्वेतकेतु, यवक्रीत, अष्टावक्र, और्व, कठ, दत्तात्रेय, गौतम-गौतमी, मार्कण्डेय, मुनि और शूद्र, धर्मारण्य, सुदर्शन, संन्यासी ब्राह्मण, शम्पाक, जैन तीर्थंकर, पुरुष तथा विश्व का निर्माण, मृत्यु की उत्पत्ति, गरुड़, अग्नि, तार्क्षी-पुत्र, लक्ष्मी, इंद्र, वृत्तासुर, त्रिपुरासुर, राजा की उत्पत्ति, चंद्रमा, पार्वती, शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ, मार्तंड (सूर्य), दक्ष प्रजापति, स्वरोविष, शनैश्चर, सुंद और उपसुंद, नारद और पर्वत,

कायव्य, सोम, केसरी, दशाश्वमेधिक तीर्थ, सुधा तीर्थ, अहल्या तीर्थ, जाबालि-गोवर्धन तीर्थ, गरुड़ तीर्थ, श्वेत तीर्थ, शुक्र तीर्थ, इंद्र तीर्थ, पौलस्त्य तीर्थ, अग्नि तीर्थ, ऋणमोचन तीर्थ, पुरुरवस् तीर्थ, वृद्धा-संगम तीर्थ, इलातीर्थ, नागतीर्थ, मातृतीर्थ, शेषतीर्थ), दस प्रतिनिधि कहानियाँ, गदल तथा अन्य कहानियाँ, प्राचीन यूनानी कहानियाँ, प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ, प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ, प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ, संसार की प्राचीन कहानियाँ।

यात्रा वृत्तान्त

महायात्रा गाथा (अँधेरा रास्ता के दो खंड), महायात्रा गाथा, (रैन और चंदा के दो खंड)।

पुरस्कार

- हिन्दुस्तान अकादमी पुरस्कार (1951),

- डालमिया पुरस्कार (1954),

- उत्तर प्रदेश सरकार पुरस्कार (1957 व 1959),

- राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) तथा

- मरणोपरांत (1966) महात्मा गांधी पुरस्कार से सम्मानित।

अखिलेश तिवारी

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