क्या होते हैं फास्ट ट्रैक कोर्ट और कैसे करते हैं काम? जानें इसके बारे में..

फास्ट ट्रैक कोर्ट की डिलीवरी रेट काफी तेज़ है। इससे सेशन कोर्ट्स में आने वाले मामलों का बर्डन कम हुआ है। कई मामलों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने हफ्ते के अंदर भी दोषियों को सजा सुनाई है।

लखनऊ: हैदराबाद और उन्नाव की दर्दनाक घटना सामने आने के बाद और महिलाओं व बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराध से उपजे आक्रोश के बीच प्रदेश की योगी सरकार दोषियों को जल्द सजा दिलाने के लिए यूपी कैबिनेट ने प्रदेश में 218 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट खोले जाने की मंजूरी दे दी है। यूपी के कानून मंत्री बृजेश पाठक ने बताया कि इन अदालतों में सिर्फ रेप के मामलों की सुनवाई होगी। जिसमें 144 कोर्ट महिलाओं और 74 कोर्ट बच्चों के मामले की सुनवाई करेगी।

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बता दें कि भारत की अदालतों में लाखों केस पेंडिंग हैं। फास्ट-ट्रैक कोर्ट का मकसद है कम से कम समय में पीड़ित पक्ष को कानूनी मदद उपलब्ध कराना, और जल्द से जल्द इंसाफ दिलवाना। अगर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के साथ निचली अदालतों में धूल खा रहे मामलों को जोड़ लें तो अप्रैल, 2018 में देश की अदालतों में लगभग 3.3 करोड़ मामले पेंडिंग थे।

फास्ट-ट्रैक कोर्ट का इतिहास

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में साल 2000 में 11वां फाइनेंस कमीशन बना। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी प्रोफेसर सैयद अली मोहम्मद खुसरो इसके चेयरमैन थे। कमीशन ने अदालतों में पेंडिंग मामलों को निपटाने के लिए 1734 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की राय दी। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने इसके लिए 502.90 करोड़ रुपये जारी किए। ये पैसे सीधे राज्य सरकारों के पास भेजे गए। ताकि वो अपने यहां के हाईकोर्ट से सलाह-मशविरा करके फास्ट-ट्रैक कोर्ट बना सकें और लटके पड़े मामलों को जल्द से जल्द खत्म करें। ये फंड पांच साल के लिए जारी किया गया था। उम्मीद थी कि 5 साल में पेंडिंग मामलों का निपटारा कर लिया जाएगा।

सरकार ने 5 साल का वक्त और दिया, 509 करोड़ की राशि भी दी। 2010 में इनका कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया गया। 2011-12 में केंद्र से मिलने वाला सहयोग बंद होने वाला था। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि राज्य सरकारें फास्ट-ट्रैक कोर्ट चलाने या बंद करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। केंद्र सरकार ने 2015 तक फास्टट्रैक कोर्ट चलाने के लिए मदद देने का फैसला किया। केंद्र ने जजों की सैलरी के लिए सालाना 80 करोड़ देने का फैसला किया।

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जुलाई, 2019 में महिलाओं से जुड़े अपराधों की सुनवाई के लिए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद में बताया कि 2021 तक देशभर में 1,023 फास्ट ट्रैक अदालतें बनाई जाएंगी। 18 राज्यों ने कोर्ट बनाने पर सहमति जताई हैं। सरकार ने इसके लिए 767 करोड़ के ख़र्च की मंज़ूरी दी है जिसमें 474 करोड़ रुपये का ख़र्च केंद्र सरकार उठाएगी।

कैसे काम करते हैं फास्ट ट्रैक कोर्ट?

फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का फैसला उस राज्य की सरकार हाई कोर्ट से चर्चा के बाद करती है। हाईकोर्ट फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए टाइमलाइन तय कर सकता है कि सुनवाई कब तक पूरी होनी है। टाइमलाइन के आधार पर फास्ट ट्रैक कोर्ट तय करता है कि मामले को हर रोज़ सुना जाना है या कुछ दिनों के अंतराल पर। सभी पक्षों को सुनने के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट तय टाइमलाइन में अपना फैसला सुनाता है।

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क्या हैं फास्ट ट्रैक कोर्ट के फायदे?

फास्ट ट्रैक कोर्ट की डिलीवरी रेट काफी तेज़ है। इससे सेशन कोर्ट्स में आने वाले मामलों का बर्डन कम हुआ है। कई मामलों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने हफ्ते के अंदर भी दोषियों को सजा सुनाई है। फास्ट ट्रैक अदालतों में फैसला आ जाने के बाद भी मामले सालों तक ऊपरी अदालतों में अटके रहते हैं। 2012 का दिल्ली गैंगरेप-मर्डर केस इसका बड़ा उदाहरण है।