”निष्काम” पुस्तक का लोकार्पण, अब गजल के रूप में भी श्रीमद्भागवत गीता

संकल्प के धनी यशस्वी रचनाकार पंकज कुमार मिश्र ‘वात्स्यायन’ द्वारा रचित ‘निष्काम’ शीर्षक से प्रकाशित श्रीमद्भगवद गीता का भावानुवाद साक्षात सनातन परमेश्वर पुरुषोत्तम के अस्तित्व की सुखद अनुभूति प्रदान करेगा।

Nishkam Book Launch

''निष्काम'' पुस्तक का लोकार्पण, अब गजल के रूप में भी श्रीमद्भागवत गीता (फोटो: सोशल मीडिया)

आज़मगढ़: सनातन हिंदू धर्म के समस्त दर्शन का स्वरूप है श्रीमद्भागवत गीता । सच मायने में यह ग्रंथ प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने की कला सिखाता है। आम जनमानस के लिए इस ग्रंथ का वास्तविक संदेश जान पाना आज एक दुरूह कार्य हो गया है ,क्योंकि प्रत्येक भाषाओं की अपेक्षा संस्कृत भाषा से लोगों की काफी दूरी बन चुकी है ।ऐसे में इस महान ग्रंथ को समझ पाना लोगों के लिए काफी मुश्किल होता है ।जैसे महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण का गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी बोली हिंदी भाषा में रूपांतरित किया तो राम कथा का प्रभाव आम जनमानस के दिमाग तक पहुंच सका । ठीक उसी प्रकार श्रीमदभगवद गीता के भी मूल रूप से हिंदी अनुवाद की आवश्यकता है, हालांकि इस दिशा में कई लोगों ने कार्य किया है । लेकिन आजमगढ़ की पावन भूमि पर पैदा हुए प्रसिद्ध लेखक व कवि तथा पेशे से शिक्षक पंकज कुमार मिश्र ‘वात्सायन’ने इस महान ग्रंथ को हिंदी गजल के रूप में लिखने का जो कार्य किया है वह सराहनीय है । इस महान ग्रंथ का अनुवाद हिंदी गजल के रूप में करने के बाद ऐसा अनुमान है कि यह आम जनमानस में कल्याणकारी साबित होगा ।

संकल्प के धनी यशस्वी रचनाकार पंकज कुमार मिश्र ‘वात्स्यायन’ द्वारा रचित ‘निष्काम’ शीर्षक से प्रकाशित श्रीमद्भगवद गीता का भावानुवाद साक्षात सनातन परमेश्वर पुरुषोत्तम के अस्तित्व की सुखद अनुभूति प्रदान करेगा । आजमगढ़ जनपद मुख्यालय पर मानसरोवर होटल के सभागार में आजमगढ़ की मीडिया को समर्पित “निष्काम”पुस्तक का लोकार्पण बतौर मुख्य अतिथि पूर्वांचल के जाने-माने साहित्यकार,शिक्षाविद प्रो0 प्रभुनाथ सिंह ‘मयंक’के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ।

लोकार्पण समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए प्रोफेसर मयंक ने पंकज कुमार मिश्र की रचित पुस्तक “निष्काम”की प्रशंसा करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवद गीता का हिंदी में अनुवाद काफी कठिन है ।ऐसे में इस महान ग्रंथ का हिंदी भावानुवाद कर गजल व कविता के रूप में प्रकाशित “निष्काम”समाज के लिए काफी कारगर साबित होगा ।प्रभुनाथ सिंह मयंक ने श्रीमद्भगवद गीता पर प्रकाश डालते हुए इसे एक महान ग्रंथ बताया ।

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बतौर विशिष्ट अतिथि मदर कान्वेंट स्कूल के जगदम्बा प्रसाद दूबे ने भी पुस्तक” निष्काम “की प्रशंसा करते हुए अपना आशीर्वचन दिया ।लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता जाने माने शिक्षाविद के0 डी0राय ने की ।पूर्वांचल पीजी कालेज सहित कई शैक्षणिक से संस्थाओं के संस्थापक डाक्टर मातबर मिश्र ने किया।

पत्रकारों को संबोधित करते हुए प्रसिद्ध ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता को हिंदी ग़ज़ल के रूप में “निष्काम” नाम से प्रकाशित पुस्तक के लेखक पंकज कुमार मिश्र “वात्सायन” ने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसे सभी धार्मिक और आध्यात्मिक पुरुष पढ़ना तो चाहते हैं किंतु अधिकांश तो पढ़ने के स्थान पर उसकी पूजा करके संतुष्ट हो जाते हैं । इसका प्रमुख कारण है उसकी संस्कृति भाषा जिस को जानने वाले लोग नहीं के बराबर है ,दूसरा कारण यह है कि विषय की जटिलता ।श्रीमद्भागवत गीता ऐसा ग्रंथ है जिसे थोड़े में बहुत कुछ कहने का प्रयास किया गया है इसी वजह से इस ग्रंथ को समझने में बहुत कठिनाई होती है।

ऐसे ही संकल्प के धनी इस पुस्तक के यशस्वी रचनाकार पंकज कुमार मिश्रा ‘वात्स्यायन’ में सर्जना के बीच दादी मां भुनेश्वरी देवी के सहज आध्यात्मिक सानिध्य व पिता प्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ मातबर मिश्र के शैक्षिक, सामाजिक, समरसता निवेश के बीच स्वतः अंकुरित हुई। तीन भाइयों में दूसरे नंबर पर पंकज कुमार मिश्र मूलतः आजमगढ़ जनपद के रानी की सराय की ग्राम गाउखोर के निवासी हैं पेशे से शिक्षक पंकज कुमार मिश्र की शिक्षा दीक्षा आजमगढ़ और जौनपुर दोनों जनपदों के मध्य हुई क्योंकि पिताजी की कर्मभूमि जौनपुर रही 5 सितंबर 1976 को जन्मे पंकज कुमार मिश्र पैसे से शिक्षक हैं मूलतः विज्ञान वर्ग के विद्यार्थी होने के साथ श्री मिश्र ने स्नातकोत्तर पर शिक्षा शास्त्र अर्थशास्त्र एवं व्यवसाय प्रबंधन की भी पढ़ाई की है।

मिश्र B.Ed के साथ शिक्षा शास्त्र में नेट प्रमाण पत्र धारी भी हैं । B.Ed विभाग में 3 वर्षों तक सेवा देने के बाद मौजूदा वक्त में बेसिक शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं ।लेखन में रुचि श्री मिश्र की स्नातक कक्षा से ही रही । अब तक आपकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है श्री मिश्र की दो पुस्तक अधिगम शास्त्र व पर्यावरण शिक्षा एवं राष्ट्र गौरव का प्रकाशन हो चुका है ।श्री मिश्र की ग़ज़लें व कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व ख्याति प्राप्त वेब पोर्टल पर भी प्रसिद्धि पा चुकी हैं। उनकी रचनाओं का प्रसारण कई बार रेडियो केंद्र गोरखपुर से हो चुका है ।

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पत्रकारों से बातचीत करते हुए श्री मिश्र ने कहा की उनका मानना है कि श्रीमद्भागवत गीता शिक्षा मनोविज्ञान पर विश्व की प्रथम पुस्तक है । इस मौके पर जिले के पत्रकारों के अलावा अनेक विद्वतजन मौजूद रहै ।

अब प्रश्न उठता है कि कैसे ? इसका उत्तर शिक्षा मनोविज्ञान की विषय वस्तु में निहित है जो कि व्यवहार की अध्ययन और उसकी परिमार्जन से संबंधित है ।महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता जो कि महाभारत के भीष्म पर्व का अंग है जिसमें कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं ।उपनिषदों और ब्रह्म सूत्र के साथ इस ग्रंथ को प्रस्थानत्रई में शामिल नित किया गया जाता है प्रस्थानत्रयी भारतीय शिक्षा पद्धति के तीन मुख्य स्तंभ रहे हैं जो कि आज भी संपूर्ण विश्व शिक्षा दर्शन के मूल आधार बने हुए हैं ।भले ही कोई स्वीकार करें या ना करें प्रस्थानत्रयी में उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान ,ब्रह्म सूत्र को न्याय प्रस्थान और गीता को स्मृति प्रस्थान कहते हैं।

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यह ग्रंथ वास्तव में शिक्षा दर्शन के ग्रंथ है जिन्हें सुना व पढ़ा जाता है ।गुरु के निकट यही कारण है कि इन्हें उपनिषद कहा गया। श्रीमद्भागवत गीता को स्मृति प्रस्थान कहते हैं, क्योंकि यह समुचित व्यवहार का शास्त्र है यह ग्रंथ शिक्षा अर्जित करने के बाद प्राप्त ज्ञान पर “निदिध्यासन” अर्थात अभ्यास से संबंधित है। यह ग्रंथ “क्या करें ,क्या ना करें” का शास्त्र तो है किंतु उससे पहले यह “कोई व्यवहार क्यों है”? इसका उत्तर देता है । कुल मिलाकर यह शास्त्र कोई व्यवहार क्यों है। और उसे क्यों परिमार्जित किया जाना चाहिए । परिमार्जन का मार्ग क्या होगा ? शिक्षा मनोविज्ञान संबंधी इन सभी प्रश्नों का उत्तर या शास्त्र प्रदान करता है ,और यही शिक्षा मनोविज्ञान का मूल विषय है।

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