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किसान आंदोलन को भुनाने में जुटा रालोद, पश्चिमी यूपी में जयंत ने बढ़ाई सक्रियता

सियासी दलों ने किसान आंदोलन को भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने का बड़ा हथियार बना लिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन खो चुका राष्ट्रीय लोकदल किसानों के गुस्से को भुनाने में सबसे आगे दिख रहा है।

Roshni Khan

Roshni KhanBy Roshni Khan

Published on 3 Feb 2021 7:40 AM GMT

किसान आंदोलन को भुनाने में जुटा रालोद, पश्चिमी यूपी में जयंत ने बढ़ाई सक्रियता
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किसान आंदोलन को भुनाने में जुटा रालोद, पश्चिमी यूपी में जयंत ने बढ़ाई सक्रियता (PC: social media)
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नई दिल्ली: केंद्र सरकार की ओर से पारित तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन को भाजपा छोड़कर लगभग सभी सियासी दलों ने समर्थन दिया है। गणतंत्र दिवस के दिन हुए उपद्रव और लालकिले की घटना के बाद ठंडा हो रहा किसान आंदोलन भाकियू नेता राकेश टिकैत की आंखों में आए आंसुओं के बाद पहले से भी ज्यादा तेज हो गया है।

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सियासी दलों ने किसान आंदोलन को भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने का बड़ा हथियार बना लिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन खो चुका राष्ट्रीय लोकदल किसानों के गुस्से को भुनाने में सबसे आगे दिख रहा है।

किसानों के मुद्दे को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाल के दिनों में हुई महापंचायतों में चौधरी अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। वे इस आंदोलन के जरिए अपनी पार्टी की सियासी जमीन को खाद-पानी देने में जुट गए हैं।

पश्चिमी यूपी ने दी आंदोलन को नई ताकत

किसान आंदोलन में पहले पंजाब और हरियाणा के किसानों का ही प्रभुत्व दिख रहा था और पंजाब के किसान यूनियनें इस आंदोलन में पूरी तरह हावी थीं मगर गणतंत्र दिवस की घटना के बाद आंदोलन का पूरा नजारा ही बदल चुका है। अब भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत आंदोलन के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे हैं और गाजीपुर बॉर्डर आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महापंचायतों के बाद वहां से किसानों का जत्था लगातार गाजीपुर बॉर्डर पर पहुंच रहा है और इससे टिकैत को बड़ी ताकत मिली है। यही कारण है कि उन्होंने इस साल अक्टूबर तक आंदोलन चलाने का एलान तक कर डाला है।

महापंचायतों में सक्रिय हुए जयंत

दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलनरत किसानों को यूपी पुलिस फोर्स की ओर से घेरे जाने के बाद राकेश टिकैत की आंखों से आंसू निकले थे और उनके आंसू ने इस आंदोलन को संजीवनी दे दी है। उसके बाद मुजफ्फरनगर, मथुरा, बागपत और बिजनौर आदि स्थानों पर किसानों की महापंचायत हो चुकी है। इन महापंचायतों में काफी संख्या में किसान जुटे और केंद्र सरकार को किसानों से दो-दो हाथ करने के लिए ललकारा।

महापंचायतों से साफ है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों में भाजपा और केंद्र सरकार के रवैये को लेकर काफी नाराजगी है और यही कारण है कि राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी किसानों के गुस्से को भुनाने की कोशिश में जुट गए हैं।

भाजपा को घेरने की रालोद की कोशिश

उन्होंने किसान पंचायतों में हिस्सा लेने के साथ ही केंद्र सरकार पर बड़ा हमला बोला। भाजपा को कठघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने कहा कि यह पार्टी लोगों को जातियों और धर्मों में बांटकर अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश में लगी हुई है और इसलिए लोगों को भाजपा से सचेत रहना होगा।

मुजफ्फरनगर में हुई महापंचायत में भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत ने भाजपा को जिताने और चौधरी अजित सिंह को हराने पर अफसोस भी जताया। उन्होंने कहा कि हमें भविष्य में ध्यान रखना होगा ताकि ऐसी गलती दोबारा ना हो पाए।

जाटों को एकजुट होने का संदेश

टिकैत के इस बयान का सियासी मतलब समझा जा सकता है क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के समर्थन के दम पर राष्ट्रीय लोकदल को उखाड़ फेंका था।

भाजपा के प्रति जाटों की नाराजगी को भुनाने के लिए रालोद नेता जयंत चौधरी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सक्रियता बढ़ा दी है। सियासी जानकारों का कहना है कि वे विभिन्न खापों के मुखिया चौधरियों से मुलाकात करके रालोद की खिसक चुकी सियासी जमीन को मजबूत करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। उन्होंने किसानों के बहाने जाटों को एकजुट होने का संदेश दिया है और इसका भी बड़ा सियासी मतलब निकाला जा रहा है।

हार-जीत के फैसले में जाटों की बड़ी भूमिका

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी संभावनाओं को मजबूत बनाने के लिए जाट समुदाय का समर्थन काफी जरूरी है। जानकारों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय की आबादी करीब 4 फीसदी है मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस बिरादरी से जुड़े लोगों की संख्या करीब 17 फ़ीसदी है।

सहारनपुर, मेरठ और अलीगढ़ मंडल की करीब चार दर्जन सीटों पर जाट समुदाय का समर्थन निर्णायक भूमिका अदा करता है। इसके अलावा दो दर्जन सीटें ऐसी हैं जिन पर जाट मतदाता किसी भी प्रत्याशी को जिताने की ताकत रखते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूती के लिए हर सियासी दल को जाटों के समर्थन की कितनी जरूरत है।

दूसरी जातियों को भी साधने की कोशिश

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हो रही महापंचायतों में सिर्फ जाट ही नहीं बल्कि गुर्जर, सैनी, कश्यप, मुस्लिम और दलित भी हिस्सा ले रहे हैं और इससे समझा जा सकता है कि राष्ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी इन महापंचायतों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर अपनी पार्टी को मजबूत बनाने में क्यों जुटे हुए हैं। इन महापंचायतों में जयंत चौधरी की सक्रियता से भाजपा की चिंताएं भी बढ़ी हैं।

जयंत की सक्रियता बढ़ने से भाजपा सतर्क

हाल के चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए उर्वर जमीन साबित हुई है। 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में यहीं से भाजपा की लहर का सियासी संदेश गया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी अच्छा प्रदर्शन किया था।

2014 और 2019 दोनों लोकसभा चुनावों में भाजपा ने यहां रालोद को मात दी थी मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन के जरिए सियासी माहौल गरमाने के बाद रालोद में नई ऊर्जा का संचार होता दिख रहा है। जयंत चौधरी की सक्रियता बढ़ने के बाद भाजपा के कान खड़े हो गए हैं और पार्टी इसकी काट ढूंढने में जुट गई है।

पंकज को सौंपी बड़ी जिम्मेदारी

भाजपा की ओर से हाल पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष और नोएडा से विधायक पंकज सिंह को मेरठ का जिला व महानगर प्रभारी बनाना बड़ी रणनीति का हिस्सा है। पंकज सिंह को मेरठ में रहते हुए आसपास के जिलों को भी साधने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

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पंकज के पिता और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की भी पश्चिम की किसान राजनीति में गहरी पैठ मानी जाती है। भाकियू नेता राकेश और नरेश टिकैत से भी उनके करीबी रिश्ते हैं। दरअसल भाजपा किसान आंदोलन के बाद जाटों की नाराजगी और जयंत चौधरी की सक्रियता से सतर्क हो गई है। पार्टी को अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ना है और ऐसे में पार्टी किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं मोल लेना चाहती।

रिपोर्ट- अंशुमान तिवारी

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