मौत के बाद राम मंदिर में पूजा का मिला हक, जानें आखिर कौन है ये शख्स

देश के सबसे पुराने केस अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मामले में आज सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला हिंदू पक्ष में सुनाया है।   अयोध्या के रामजन्मभूमि विवाद केस में सबसे बड़ा और अंतिम फैसला आया है कि विवादित स्थल पर ही मंदिर बनेगा।

नई दिल्ली : देश के सबसे पुराने केस अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मामले में आज सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला हिंदू पक्ष में सुनाया है।   अयोध्या के रामजन्मभूमि विवाद केस में सबसे बड़ा और अंतिम फैसला आया है कि विवादित स्थल पर ही मंदिर बनेगा। इसके साथ ही सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को उपयुक्त जगह पर 5 एकड़ ज़मीन अलग से देने का आदेश दिया गया है। लेकिन इस फ़ैसले के साथ एक और नाम चर्चा में है। चर्चा में है ये नाम- दिवंगत गोपाल सिंह विशारद का। बता दें कि 69 साल बाद आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने गोपाल सिंह विशारद को वहां पूजा करने का अधिकार दे दिया है। लेकिन राम मंदिर पर यह फ़ैसला उनकी मौत के 33 साल बाद आया है।

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ये थे गोपाल सिंह विशारद

अयोध्या विवाद पर शुरुआती 4 सिविल मुक़दमों में से एक गोपाल सिंह विशारद ने दायर किया था। गोपाल सिंह विशारद और एम. सिद्दीक दोनों ही राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में मूल मुद्दई थे ओर दोनों का ही निधन हो चुका है। उसके बाद में उनके कानूनी वारिसों ने उनका प्रतिनिधित्व किया।

साथ दावा है कि 22-23 दिसंबर 1949 की रात अभय रामदास और उनके साथियों ने दीवार फाँदकर राम-जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रख दीं और यह प्रचार किया कि भगवान राम ने वहाँ प्रकट होकर अपने जन्मस्थान पर वापस क़ब्ज़ा प्राप्त कर लिया है।

इसके बाद 16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने सिविल जज की अदालत में सरकार, ज़हूर अहमद और अन्य मुसलमानों के खिलाफ़ मुक़दमा दायर कर कहा कि ‘जन्मभूमि’ पर स्थापित भगवान राम और अन्य मूर्तियों को हटाया न जाए और उन्हें दर्शन और पूजा के लिए जाने से रोका न जाए।

सिविल जज ने उसी दिन यह स्थागनादेश जारी कर दिया, जिसे बाद में मामूली संशोधनों के साथ ज़िला जज और हाईकोर्ट ने भी अनुमोदित कर दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थगनादेश को चुनौती दी गई जिससे फ़ाइल पाँच साल वहाँ पड़ी रही।

नए जिला मजिस्ट्रेट जेएन उग्रा ने सिविल कोर्ट में अपने पहले जवाबी हलफ़नामे में कहा, “विवादित संपत्ति बाबरी मस्जिद के नाम से जानी जाती है और मुसलमान इसे लंबे समय से नमाज़ के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं।

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22 दिसंबर की रात

इसे राम चन्द्र जी के मंदिर के रूप में नहीं इस्तेमाल किया जाता था। 22 दिसंबर की रात वहाँ चोरी-छिपे और ग़लत तरीक़े से श्री रामचंद्र जी की मूर्तियाँ रख दी गई थीं।”

फिर कुछ दिनों बाद दिगंबर अखाड़ा के महंत रामचंद्र परमहंस ने भी विशारद जैसा एक और सिविल केस दायर किया। परमहंस मूर्तियाँ रखने वालों में से एक थे और बाद में विश्व हिंदू परिषद के आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका थी। इस मुक़दमे में भी मूर्तियाँ न हटाने और पूजा जारी रखने का आदेश हुआ।

कई साल बाद 1989 में जब रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने स्वयं भगवान राम की मूर्ति को न्यायिक व्यक्ति क़रार देते हुए नया मुक़दमा दायर किया तब परमहंस ने अपना केस वापस कर लिया।

इसके बाद मूर्तियाँ रखे जाने के लगभग 10 साल बाद 1951 में निर्मोही अखाड़े ने जन्मस्थान मंदिर के प्रबंधक के नाते तीसरा मुक़दमा दायर किया। इसमें राम मंदिर में पूजा और प्रबंध के अधिकार का दावा किया गया।

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चारों मुक़दमों को एक साथ जोड़कर सुनवाई

लेकिन 2 साल बाद 1961 में सुनी वक़्फ़ बोर्ड और नौ स्थानीय मुसलमानों की ओर से चौथा मुक़दमा दायर हुआ। इसमें न केवल मस्जिद बल्कि अग़ल-बग़ल क़ब्रिस्तान की ज़मीनों पर भी स्वामित्व का दावा किया गया।

ज़िला कोर्ट इन चारों मुक़दमों को एक साथ जोड़कर सुनवाई करने लगी। दो दशक से ज़्यादा समय तक यह एक सामान्य मुक़दमे की तरह चलता रहा और इसकी वजह से अयोध्या के स्थानीय हिंदू-मुसलमान अच्छे पड़ोसी की तरह रहते रहे।

इसके बाद सन् 1986 में गोपाल सिंह विशारद की मौत हो गई थी। उनकी मौत के बाद उनके बेटे राजेंद्र सिंह केस की पैरवी कर रहे थे। उनकी अर्ज़ी पर सुन्नी पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा था कि गोपाल सिंह विशारद ने पूजा के व्यक्तिगत अधिकार का दावा करते हुए मुक़दमा किया था और अब उनकी मौत के बाद उनकी याचिका का कोई अर्थ नहीं रहा।

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