अयोध्या में राममंदिर का सपना संजोए ही दुनिया से चले गए ये आठ नायक

रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद का ऐतहासिक फैसला आने के बाद हिन्दू समाज में खुशी और उल्लास की लहर तो है पर उसके पीछे कई हिन्दूवादी नेताओं का त्याग और समर्पण शामिल रहा है। जिन्होंने इस आंदोलन में भाग लिया।

श्रीधर अग्निहोत्री
लखनऊ: रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद का ऐतहासिक फैसला आने के बाद हिन्दू समाज में खुशी और उल्लास की लहर तो है पर उसके पीछे कई हिन्दूवादी नेताओं का त्याग और समर्पण शामिल रहा है। जिन्होंने इस आंदोलन में भाग लिया।

उनके लम्बे संघर्ष के कारण रामजन्म भूमि का मामला एक आन्दोलन का रूप धारण कर सका लेकिन अफसोस इस बात का है कि रामजन्म भूमि आन्दोलन के ये नायक आज दुनिया में नहीं है।

वैसे तो 1980 के दशक में शुरू हुए रामजन्मभूमि आंदोलन में सैकडो नेताओं और हजारों लाखों लोगों ने हिस्सा लेकर इसे धार देने का काम किया पर मुख्य रूप से जिन लोगों को याद किया जाता है उनमें कुछ प्रमुख नाम ये है।

 

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दाऊदयाल खन्ना

1983 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हिन्दू जागरण मंच के तत्वावधान में एक विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में पूर्व मंत्री दाऊदयाल खन्ना, जो मुरादाबाद से पांच बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधायक रहे, ने श्री राम जन्मभूमि अयोध्या, श्री कृष्ण जन्मभूमि मथुरा तथा वाराणसी स्थिति काशी विश्वनाथ मंदिर पर बनी मस्जिदों को हिन्दू स्वाभिमान के लिये चुनौती बताते हुए उनकी मुक्ति का प्रयास किये जाने की मार्मिक अपील की।

खन्ना की अपील का गहरा असर हुआ और सम्मेलन में ही तीनों मन्दिरों की मुक्ति का प्रस्ताव पहली बार पारित हुआ। इसके बाद इस आदोलन को गति मिली।

राजमाता विजय राजे सिन्धिया

ग्वालियर राजघराने की राजमाता सिन्धिया अपने कांग्रेस विरोध के कारण ही भाजपा के साथ हो गयी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जबरदस्त विरोध के कारण ही राजमाता धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ती चली गईं। राजमाता ने कई बार विश्व हिन्दू परिषद की आर्थिक मदद की और अयोध्या आदांलन में बढ-चढकर हिस्सा लिया।

रामचन्द्र परमहंस

1913 में जन्मे रामचन्द्र परमहंस का असली नाम रामचन्द्र तिवारी था। पूज्य परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज ने अयोध्या में अपनी इस घोषणा से सारे देश में सनसनी फैला दी कि श्रीराम जन्मभूमि का ताला नहीं खुला तो मैं आत्मदाह करूंगा।’

जिसका परिणाम यह हुआ कि 1 फ़रवरी 1986 को ही ताला खुल गया। 30 अक्टूबर 1990 की कारसेवा के समय अनेक बाधाओं को पार करते हुए अयोध्या में आये हजारों कारसेवकों का उन्होंने नेतृत्व व मार्गदर्शन भी किया।

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महंत अवैद्यनाथ

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ और अवैद्यनाथ के गुरु महंत दिग्विजय नाथ का इस आंदोलन में खास योगदान रहा।

महत अवैद्यनाथ श्रीराम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति के आजीवन अध्यक्ष रहे। महंत अवैद्यनाथ के दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस के साथ बेहद अच्छे संबंध थे।

श्रीश चन्द्र दीक्षित

रायबरेली में जन्मे श्रीश चंद्र दीक्षित 1982 से लेकर 1984 तक वे उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे। इसके बाद 1984 में रिटायर होने के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़ गए और केंद्रीय उपाध्यक्ष बन गए।

श्रीश चंद्र दीक्षित राम मंदिर आंदोलन के अगली कतार के नेताओं में थे। वह श्रीराम जन्मभूमि के न्यास से भी जुड़े हुए थे। राम मंदिर आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में उनकी खास भूमिका थी।

1989 में प्रयाग कुंभ के मौके पर अयोजित धर्मसंसद में मंदिर शिलान्यास कार्यक्रम की घोषणा की गई। 1990 में अयोध्या में कारसेवा के दौरान उनको गिरफ्तार भी किया गया था।

अशोक सिंहल

विहिप के कई वर्षो तक अर्न्तराष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहने वाले अशोक सिंहल ने ही 1990 के दौर में अयोध्या आंदोलन का नेतृत्व किया। वह तत्कालीन सरकारों से अयोध्या विवाद को लेकर कई बार टकराए। यहां तक कि उन्होंने भाजपा सरकारों को भी नही छोडा।

अयोध्या में मंदिर निर्माण को लेकर उनके तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी से भी मतभेद उभरे। 1990 में जब उन्होंने अयोध्या कूच किया तो उनके सिर पर पत्थर भी लगा। मुलायमिंसह सरकार की कडी चेतावनी के बाद भी वह वेश बदलकर खेत खलिहान पार करते हुए अयोध्या पहुंचे।

कोठारी बंधु

कोलकाता के रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी सगे भाई थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। कोठारी बंधुओं ने वर्ष 1990 के अयोध्या राम मंदिर आंदोलन में कार सेवा करने का फैसला किया था। तक मुलायम सरकार ने अयोध्या जाने से लोगों को रोक दिया गया था। 200 किलोमीटर का सफर पैदल ही तय किया।

राम और शरद कोठारी 30 अक्टूबर को अयोध्या के विवादित परिसर में पहुंचने वाले पहले लोगों में शामिल थे। 30 अक्टूबर तक अयोध्या में लाखों कारसेवक इकट्ठा थे। बाबरी मस्जिद की गुबंद पर भगवा लहराने के बाद दोनों भाई पुलिस की फायरिंग का शिकार हुए और पुलिस की गोली से वहीं दम तोड़ दिया।

प्रमोद महाजन

भाजपा के राममंदिर आंदोलन से जुड़ने के बाद भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी ने जब सोमनाथ से रामरथ यात्रा निकाली तो प्रमोद महाजन का विशेष योगदान था।

रथयात्रा की तिथि 25 सितम्बर(पं दीनदयाल उपाध्याय का जन्म दिन) से निकालने का निर्णय लेने वाले प्रमोद महाजन ही थें। इस यात्रा में राजमाता विजयाराजे सिंधिया और सिकंदर बख्त थे।

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