“बुन्देलखण्ड की आन-बान-शान और शौर्य का प्रतीक है ये अजेय दुर्ग”

सबने प्रयत्न किया लेकिन कोई इस दुर्ग को जीत न सका । सबने कोशिश की लेकिन कोई इसके आकर्षण और भव्यता का रहस्य अब तक जान न सका है । अभी तक करीब पंद्रह सौ साल का वक़्त गुजर चुका है ।

"बुन्देलखण्ड की आन-बान-शान और शौर्य का प्रतीक है ये अजेय दुर्ग"

"बुन्देलखण्ड की आन-बान-शान और शौर्य का प्रतीक है ये अजेय दुर्ग"

अनुज हनुमत

बाँदा। सबने प्रयत्न किया लेकिन कोई इस दुर्ग को जीत न सका । सबने कोशिश की लेकिन कोई इसके आकर्षण और भव्यता का रहस्य अब तक जान न सका है । अभी तक करीब पंद्रह सौ साल का वक़्त गुजर चुका है । इतने लंबे अरसे में तो यादों पर भी वक़्त की गर्द चढ़ जाती है पर यहां जिस राज़ की बात की जा रही है, वो पंद्रह सौ साल बाद भी जिंदा ।

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बुन्देलखण्ड की आन बान और शान

बुन्देलखण्ड की आन बान और शान का जीता जागता स्मारक जो आज खंडहर में जरूर तब्दील है लेकिन इसकी प्राचीनता और भव्यता इसके शौर्य और पराक्रम को बखूबी परिभाषित करती है ।

यहां की ज़िंदगी यहां के क़िरदारों के साथ आज भी ज़िंदा नज़र आती है. यहां के वीराने आज भी किसी के जिंदा होने का अहसास कराते हैं और जब दिन थककर सो जाता है, तो यहां रात की तनहाई अक्सर घुंघरुओं की छनकती आवाजों से टूट जाती है।

कालिंजर का अपराजेय किला प्राचीन काल में जेजाक भुक्ति साम्राज्य के अधीन था। जब चंदेल शासक आये तो इस पर मुगल शासक महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक और हुमायूं ने आक्रमण कर इसे जीतना चाहा पर कामयाब नहीं हो पाये।

अंत में अकबर ने 1569 में यह किला जीतकर बीरबल को उपहार स्वरूप दे दिया। बीरबल के बाद यह किला बुंदेले राजा छत्रसाल के अधीन हो गया। इनके बाद किले पर पन्ना के हरदेव शाह का कब्जा हो गया। 1812 में यह किला अंग्रेजों के अधीन हो गया।

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कालिंजर के प्रांगण में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण

यहां के मुख्य आकर्षणों में नीलकंठ मंदिर है। इसे चंदेल शासक परमादित्य देव ने बनवाया था। मंदिर में 18 भुजा वाली विशालकाय प्रतिमा के अलावा रखा शिवलिंग नीले पत्थर का है। मंदिर के रास्ते पर भगवान शिव, काल भैरव, गणेश और हनुमान की प्रतिमाएं पत्थरों पर उकेरी गयीं हैं।

नीलकंठ मंदिर को कालिंजर के प्रांगण में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण और पूजनीय माना गया है। इसका निर्माण नागों ने कराया था। इस मंदिर का जिक्र पुराणों में है। मंदिर में शिवलिंग स्थापित है, जिसे बेहद प्राचीनतम माना गया है।

नीलकंठ मंदिर से काल भैरव की प्रतिमा के बगल में चट्टान काटकर जलाशय बनाया गया है। इसे ‌’स्वर्गारोहण जलाशय’ कहा जाता है। कहा जाता है कि इसी जलाशय में स्नान करने से कीर्तिवर्मन का कुष्ठ रोग खत्म हुआ था। ये जलाशय पहाड़ से पूरी तरह से ढका हुआ है।

बाँदा जिला प्रशासन द्वारा कालिंजर महोत्सव मनाने का निर्णय लिया गया है जिसकी तैयारियां युद्ध स्तर पर की जा रही हैं ।

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