स्टेशन, बस स्टैंड और ट्रैफिक सिग्नल पर दिखने वाले हजारों बच्चे आखिर कहां गायब?

रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मंदिर- सब बंद हैं, तो यहां दिखने वाले बच्चे इन दिनों आखिर कहां चले गए? इन दिनों उनकी रोजी रोटी कैसे चल रही है?

झांसी। बच्चों के लिए स्टेडियम, रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन ही घर होते हैं। वे वहीं रहते हैं, आसपास झाड़ू वगैरह लगाकर या मांग कर रोटी का जुगाड़ करते हैं। अपने आसपास होने वाले लड़ाई-झगड़े के बीच ही वे पलते-बढ़ते और जीते हैं। यह बच्चे इन दिनों नहीं दिख रहे हैं। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मंदिर- सब बंद हैं, तो, आखिर, वे गए भी कहां होंगे? इन दिनों उनकी रोजी रोटी कैसे चल रही है? ऐसे बच्चों को मेडिकल मदद की तत्काल जरूरत है। पर यह देगा कौन?

लॉकडाउन कहां चले गए गरीब बच्चे

निर्दोष बच्चे इस लाकॅडाउन के सबसे अधिक शिकार हैं। इस तरह के आय वर्ग वाले परिवारों के बच्चे तो सबसे अधिक। अगर वे सड़कों पर रह रहे हैं, तब तो हाल समझा ही जा सकता है, अगर उनके सिर पर किसी तरह की छत है, तब भी भूखे रहना और इस वजह से उनका लगातार चिड़चिड़े होते जाना स्वाभाविक ही है।

खाना-पानी के लिए सामान्य दिनों में भटकते है

सामान्य दिनों में भी ऐसे सभी बच्चों को खाना-पानी के लिए किस तरह भटकना पड़ता है, शायद इसका अंदाजा हम सबको है। यह बात भी छिपी नहीं है कि इनके साथ किस तरह का शाब्दिक और शारीरिक अत्याचार होता है- खास तौर से बालिकाओं के साथ।

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बाल कल्याण समिति की सदस्य हिमांशु विमल ने बताया

इस बारे में बाल कल्याण समिति की सदस्य हिमांशु विमल का कहना हैं कि ये बच्चे परिवार के अंदर भी हिंसा के निशाना सबसे अधिक बनते हैं। बंद दरवाजों के पीछे हिंसा बढ़ती ही है लाकॅ डाउन में। वह कहती हैं कि ये बच्चे अपने हमउम्र बच्चों की कमी इन दिनों सबसे अधिक महससू कर रहे हैं।

सामान्य दिनों में उनके मां-बाप इतने समय तक इनके साथ नहीं रहते। लेकिन ऐसे वक्त ने उनकी लाइफस्टाइल बदल दी है। एक तरह से, उनकी आजादी ही खत्म हो गई है और उन पर तरह-तरह की पाबंदियां लाद दी गई हैं। मां-बाप खुद तनाव में हैं और इसीलिए वे बच्चों पर चिल्लाते हैं, उन्हें पीटते हैं। वह कहती हैं शहर के हर लेन, हर हिस्से का यही हाल है लेकिन हम चाहकर भी इन बच्चों की कोई मदद नहीं कर पा रहे हैं।

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बच्चों के साथ बढ़ रही हैं घरेलू हिंसा

विशेषज्ञ लाकॅ डाउन के दौरान बच्चों पर बढ़ती हिसां के लिए गरीबी, घरेलू हिसां, बच्चों के समय बिताने के लायक जगहों की कमी और शराब को जिम्मेवार ठहराते हैं। घरेलू हिसां का प्रभाव बच्चों के मनोविज्ञान पर भी पड़ रहा है। वे हर वक्त भय के आगोश में रह रहे हैं। और ऐसा लगभग सभी वर्गों के बच्चों के साथ हो रहा है। घरेलू हिसां की घटनाएं निरंतर बढ़ती ही जा रही हैं।

चारदीवारियों में कैद हैं बच्चे

लॉक डाउन को बढ़ाए जाने से बच्चों के लिए जीवन अधिक कठिन हो गया है। सामान्य बच्चों को भी पढ़ने के अलावा तो कोई काम है नहीं- स्कूल में सिर्फ पढ़ाई नहीं होती, बच्चे खेलते- कूदते हैं, आपस में बातचीत करते हैं, छोटे बच्चे भी अपने दोस्तों से मन की बात कहते हैं। लेकिन इन दिनों वे, बस, चारदीवारियों में कैद हैं- वहां भी रोज एक ही रूटीन है। मोनिका (बदला हुआ नाम) पढ़ने के लिए झाँसी आई थी और हॉस्टल में रहती थी। लाकॅ डाउन अचानक ही लग गया, तो वह अपनी एक परिचित आंटी के यहां चली गई। थोड़े दिनों बाद ही वहां उसके साथ व्यवहार बदल गया और उसकी पिटाई भी हो गई। उसने पुलिस को कॉल कर दिया। पुलिस ने चाइल्डलाइन को सूचना दी और उसने मामले को बाल कल्याण समिति को सौंप दिया।

रिपोर्टर – बी.के. कुशवाहा झांसी

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