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अमेरिका में खत्म हो रहीं चिडिय़ां, अब पेड़ों पर सुनाई नहीं देती पक्षियों की चहचहाट

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seemaBy seema

Published on 27 Sep 2019 9:51 AM GMT

अमेरिका में खत्म हो रहीं चिडिय़ां, अब पेड़ों पर सुनाई नहीं देती पक्षियों की चहचहाट
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अमेरिका में खत्म हो रहीं चिडिय़ां, अब पेड़ों पर सुनाई नहीं देती पक्षियों की चहचहाट
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अमेरिका का आसमान कुछ खाली-खाली सा हो गया है। पेड़ों पर चिडिय़ों की चहचहाहट भी कम होती जा रही है। दरअसल, अमेरिका और कनाडा में पक्षियों की संख्या सन सत्तर के बाद से २९ फीसदी घट गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले ५० साल में ३ अरब पक्षी कम हो गए हैं।

'साइंस' पत्रिका में प्रकाशित विश्लेषण से एक बड़ा संकट सामने आ गया है। वैसे, विशेषज्ञों को लंबे समय से पता है कि पक्षियों की कुछ प्रजातियां लुप्त हो सकती हैं। लेकिन ५०० प्रजातियों पर किये गये सर्वे से पता चलता है कि कई प्रजातियों की संख्या बहुत ही कम गई है। इसके कारण कई हो सकते हैं और सबसे महत्वपूर्ण कारण है पक्षियों के निवास खत्म होना और बड़े पैमाने पर कीटनाशकों का इस्तेमाल।

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पक्षियों की कई सामान्य प्रजातियां ईको सिस्टम को बनाए रखने, कई तरह के कीट पतंगों की संख्या पर कंट्रोल रखने, फूलों के परागण, बीजों के विस्तार और जंगलों के पुनर्जीवन के लिये बेहद महत्वपूर्ण हैं। गौरेया या कई अन्य छोटी भूरी चिडिय़ा की संख्या में कमी को पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता लेकिन इनकी कमी से पर्यावरण पर गहरा असर पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार खेतों की संख्या जैसे जैसे बढ़ती जाती है और आद्रभूमि से पानी जैसे जैसे खत्म होता जाता है वैसे उस क्षेत्र में पक्षियों की संख्या खत्म हो जाती है। पक्षियों के नैसर्गिक आवास को बचाये रखना बहुत जरूरी है। इसी तरह कीटनाशक भी पक्षियों को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। मिसाल के तौर पर नियोनिकोटीनायड्स नामक कीटनाशक से पक्षियों का वजन बढ़ जाता है और वे दूर तक उड़ कर नहीं जा पाते।

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कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के संरक्षण वैज्ञानिक केनेथ रोजेनबर्ग का कहना है कि जरूरत इस बात की है कि लोग अपने आसपास के चिडिय़ों पर ध्यान दें, वे धीरे धीरे गायब हो रही हैं। सबसे ज्यादा डराने वाली बात यह है कि यह हमारी आंखों के सामने हो रहा है। मुमकिन है कि हमें पता भी ना चले और बहुत देर हो जाए।

रोजेनबर्ग और उनके सहयोगियों ने मौसम के रडार का इस्तेमाल कर चिडिय़ों की आबादी के आंकड़े जुटाए हैं। इसके अलावा 1970 से अब तक चिडिय़ों पर हुए 13 सर्वेक्षणों और उत्तरी अमेरिका की 529 पक्षी प्रजाति के ट्रेंड के बारे में कंप्यूटर मॉडल की भी मदद ली गई है। इनमें सभी प्रजातियां नहीं हैं लेकिन करीब तीन चौथाई प्रजातियां शामिल हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि जो छूट गई हैं उनमें ज्यादातर दुर्लभ प्रजाति की चिडिय़ा हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि आवास का खत्म होना चिडिय़ों के कम होने के पीछे सबसे बड़ी वजह है। 2015 की एक रिसर्च बताती है कि अमेरिका और कनाडा में बिल्लियां हर साल 2.6 अरब चिडिय़ों को मार देती हैं। इसके अलावा खिड़कियों से टकरा कर 62.4 करोड़ और कारों से टकरा कर 2.14 करोड़ परिंदे हर साल मारे जाते हैं। सवाल है कि ऐसी स्थिति में लोग इन चिडिय़ों को कैसे बचा सकते हैं। इसके लिए बिल्लियों को घर के अंदर रखना होगा। खिड़कियों का इस्तेमाल इस तरह से करना होगा कि उनमें फंसकर या उनसे टकरा कर चिडिय़ों के मरने की आशंका ना रहे। इसके साथ ही कीटनाशकों का खेती में इस्तेमाल बंद करना होगा। इसके अलावा ऐसी कॉफी खरीदी जाए जो जंगल जैसे फार्मों में उगाई जाती है। अगर ऐसा हो सके तो आकाश अकेला नहीं होगा, चिडिय़ों की गूंज उसका दिल बहलाती रहेगी।

रोजेनबर्ग ने बताया कि मौसम रडार का इस्तेमाल नया है यह प्रवासी पक्षियों के झुंड की जानकारी देता है।गौरैया का हाल सबसे ज्यादा बुराशोधकर्ता रुबेगा का कहना है कि अगर आप किसी दिन सुबह घर से बाहर निकलें और देखें कि आपके आसपास के सारे घर खाली हो गए हैं, तो आपका अंदाजा सही होगा कि कुछ खतरनाक हो रहा है। इसी प्रकार हमारे आस पास रहने वाले 3 अरब पक्षी हमारी फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले और एंसेफिलाइटिस जैसी बीमारी फैलाने वाले कीड़ों को खाते थे, वो अब चले गए हैं। मेरे ख्याल से हम सब को यह सोचना चाहिए कि यह खतरनाक है। आमतौर पर ज्यादा दिखने वाली और आसानी से पहचानी जाने वाली गौरैया का हाल सबसे ज्यादा बुरा है हालांकि अभी वो लुप्त होने की स्थिति में नहीं आई हैं।

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सीमा शर्मा लगभग ०६ वर्षों से डिजाइनिंग वर्क कर रही हैं। प्रिटिंग प्रेस में २ वर्ष का अनुभव। 'निष्पक्ष प्रतिदिनÓ हिन्दी दैनिक में दो साल पेज मेकिंग का कार्य किया। श्रीटाइम्स में साप्ताहिक मैगजीन में डिजाइन के पद पर दो साल तक कार्य किया। इसके अलावा जॉब वर्क का अनुभव है।

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