अब चीन की बारी

इराक, लीबिया, ईरान, अफगानिस्तान, सीरिया, निकारागुआ, कोलम्बिया, पनामा, चिली, वेनेजुएला .. फेहरिस्त लंबी है और इन सभी देशों में एक चीज कॉमन है – ये सभी अमेरिका के कोप का भाजन बन चुके हैं और आज तक ये सभी देश बहुत बड़ी कीमत चुका रहे हैं।

Published by suman Published: May 17, 2020 | 10:28 am

विशेष प्रतिनिधि

लखनऊ: इराक, लीबिया, ईरान, अफगानिस्तान, सीरिया, निकारागुआ, कोलम्बिया, पनामा, चिली, वेनेजुएला .. फेहरिस्त लंबी है और इन सभी देशों में एक चीज कॉमन है – ये सभी अमेरिका के कोप का भाजन बन चुके हैं और आज तक ये सभी देश बहुत बड़ी कीमत चुका रहे हैं। इस कड़ी में अब नंबर आने वाला है चीन का। अमेरिका ने कोरोना वायरस से मची बरबादी के लिए चीन को पूरी तरह जिम्मेदार माना है और ये तय है कि अमेरिका इस बदला जरूर लेगा। ये बदला बम-मिसाइल से नहीं बल्कि चीन को वैश्विक समुदाय में अलग थलग करके और उसका आर्थिक साम्राज्य ध्वस्त करके लिए जाएगा। इस लड़ाई में अमेरिका के साथ ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी आदि देश भी खड़े नजर आते हैं।

किसी जमाने में अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध चला करता था जो सोवियत संघ के टुकड़े-टुकड़े हो जाने बाद जा कर खत्म हुआ। अमेरिका और चीन के बीच नया शीत युद्ध ‘ट्रेड वार’ के रूप में तो काफी समय से चल ही रहा था लेकिन कोरोना वायरस ने इसमें नया मोड़ ला दिया है जो ग्लोबल वर्चस्व की लड़ाई के रूप में परिवर्तित हो गया है।

ट्रम्प को नापसंद

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 2016 में अपने चुनावी अभियान एक समय से ही चीन को ‘ग्लोबल गुंडे’ के रूप में पेश करते आए हैं। ट्रम्प का कहना रहा है कि चीन ने हमेशा से अमेरिका का फायदा उठाया है। ट्रम्प ने इसी क्रम में चीन से आने वाले सामानों पर भारी शुल्क लगा दिये थे जिसके बाद  चीन ने बदले की कार्रवाई की और ट्रेड वार छिड़ गया। हालांकि कुछ महीनों बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक सम्झौता भी हो गया। जिससे लगा कि मामला शांत हो गया है। लेकिन तभी कोरोना वायरस आ गया जिसने इकॉनमी की ऐसी कि तैसी कर दी और ट्रम्प की योजनाओं पर पानी फिर गया। तभी से ट्रम्प लगातार चीन को महामारी के लिए दोषी और जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। अमेरिका का कहना है कि कोरोना वायरस के बारे में चीन ने दुनिया को अंधेरे में रखा और इस वजह से आज हर देश बुरी तरह परेशान है। अमेरिका का तो ये भी कहना है कि चीन ने जानबूझ कर तबाही मचाने के लिए वायरस फैलाया है।

शुरू हो चुकी है लड़ाई

अब मामला कोरोना वायरस पर जुबानी जंग से आगे बढ़ चुका है। ट्रम्प ने कहा है कि अमेरिका कोरोना वायरस से हुये नुकसान का हरजाना चीन से लेगा। ट्रम्प प्रशासन ने वुहान की प्रयोगशाला में सहयोग करने वाले अमेरिकी शोधकर्ताओं की फंडिंग रोक दी है। अमेरिकी सरकार के मुख्य पेंशन फंड को चीनी कंपनियों के शेयरों में निवेश नहीं करने के आदेश दिये गए हैं।  इसी जस्टिस डिपार्टमेन्ट ने अमेरिकी शिक्षण संस्थाओं में चीनी प्रभाव को कुचलने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। मीडिया भी इस युद्ध से अछूता नहीं रह गया है। ट्रम्प प्रशासन ने आदेश जारी कर के अमेरिका स्थित पाँच चीनी समाचार संस्थानों में काम करने वाले चीनी नागरिकों की अधिकतम संख्या तय कर दी है। चीन ने भी बदले की कार्रवाई करते हुये अमेरिकी पत्रकारों को अपने देश से निकाल दिया है। अब ट्रम्प प्रशासन अमेरिकी वर्क वीज़ा रद्द करने जा रहा है जिससे बड़े पैमाने पर चीनी नागरिक प्रभावित होंगे। अमेरिका में 14 राज्यों के रिपब्लिकन अटॉर्नी जनरलों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से यहाँ तक कहा है कि वह कोरोना वायरस वैश्विक महामारी फैलने के कारण हुए नुकसान के लिए राज्यों और संघ की साझेदारी की मदद से चीन की जवाबदेही तय करें। और उससे मुआवजा वसूलें।

 

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कार्रवाई के लिए संसद में बिल पेश

ताजा घटनाक्रम में अमेरिका के 9 प्रभावशाली सीनेटरों ने संसद में एक बिल पेश किया है जिसमें राष्ट्रपति ट्रम्प कि चीन के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाने के लिए अधिकृत करने की बात काही गई है। इस बिल में कहा गया है कि यदि चीन कोरोना वायरस से जुड़ी हर जानकारी उपलब्ध कराने में सहयोग नहीं करता है तो राष्ट्रपति को उसके खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा कर देनी चाहिए। ‘‘कोविड-19 एकाउंटिबिलिटी एक्ट’ नमक ये बिल सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने तैयार किया है और इसे 8 अन्य सीनेटरों का समर्थन है। ये बिल सीनेट यानी ऊपरी सदन में पेश किया गया। ग्राहम का कहना है कि चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी की बेईमानी के बगैर वायरस अमेरिका में नहीं आ सकता था।

आर्थिक बरबादी की तैयारी

अमेरिकी संसद में पेश बिल के अनुसार अगर चीन कोविड-19 के बारे में पूरा खुलासा नहीं करता और अमेरिकी जांच में सहयोग नहीं करता है तो उसकी संपत्तियाँ फ्रीज़ कर दी जाएंगी, आवागमन पर प्रतिबंध लग जाएगा, सभी वीज़ा रद्द कर दिये जाएंगे, चीन को किसी प्रकार का लोन नहीं दिया जाएगा और अमेरिकी शेयर बाज़ारों में चीनी कंपनियों की लिस्टिंग प्रतिबंधित कर दी जाएगी।

ठोंक दिये मुकदमे

कोरोना वायरस से हुये नुकसान पर भारत, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों के कई संगठनों ने चीन के खिलाफ मुकदमे ठोंक दिये है। इनमें भारत के कानूनी संगठन, जर्मनी का अखबार समूह, अमेरिकी संसद, वकील और कंपनियाँ तक शामिल हैं। अमेरिकी वकील ने तो 20 ट्रिलियन डालर के हरजाने का मुकदमा किया है जो चीन की जीडीपी से भी ज्यादा रकम का है। अमेरिका की संघीय अदलतों में कम से कम 6 मुकदमे चीन के खिलाफ दर्ज किए गए हैं। अमेरिका के कई सांसदों ने एक विधेयक तैयार किया जिसके तहत चीन से अमेरिकी अदालतों में मिली इम्यूनिटी छीन लेने का आदेश जारी किया जा सकेगा।

 

 

चीन से हटेंगी कंपनियाँ

चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने के लिए वहाँ से विदेशी कंपनियाँ हटाने का काम ज़ोरों पर है। वैसे इसी तैयारी ट्रेड वार से ही शुरू हो गई थी लेकिन अब इस काम में तेजी आ गई है। भारत, विएतनाम, ताइवान और कोरिया को अब चीन के मुक़ाबले खड़ा करने की योजना है। जापान ने तो अपने देश की कंपनियों को चीन से हटने के लिए 243.5 बिलियन येन (2.2 बिलियन डालर) का पैकेज देने का ऐलान किया है। जापान का कहना है कि अब जापान में ही कंपनियों लौट आना चाहिये ताकि कोरोना महामारी जैसी भविष्य की किसी स्थिति में सप्लाई चेन टूटने का खतरा न रहे।

अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन भी चाहता है कि अब चीन से अमेरिकी यूनिट्स को कहीं और चले जाना चाहिए। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेओ ने कहा है कि ट्रम्प सरकार सप्लाई चेन के पुनर्निर्माण पर भारत, आस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैंड, साउथ कोरिया और वियतनाम के साथ मिल कर काम कर रहा है। ट्रम्प प्रशासन ग्लोबल सप्लाई चेन को चीन से शिफ्ट करने के लिए एक्सप्रेस गति से लगा हुआ है। इस स्थिति को कैश कराने के लिए भारत ने बड़े पैमाने पर तैयारी की है और एक हजार विदेशी कंपनियों से बातचीत भी की गई है।

अमेरिका पर निर्भर चीन

चीन की आर्थिक स्थिति काफी कुछ अमेरिका पर निर्भर है। 2018 में चीन और अमेरिका का व्यापार 659.8 बिलियन डालर का था। चीन ने 539.5 बिलियन डालर कीमत का सामान अमेरिका को निर्यात किया था। अब दोनों देशों के बीच तनातनी के कारण चीन की खुदरा बिक्री 20.5 फीसदी और औद्योगिक उत्पादन 13.5 फीसदी घट चुका है। अब 200 बिलियन डालर की ट्रेड डील भी खटाई में पड़ी हुई है।

चारों ओर से घिरा चीन

कोरोना वायरस के लिए चीन पर सीधे और घुमाफिरा कर आरोप लग रहे हैं। चूंकि वायरस चीन से निकल कर दुनिया में फैला और इसने सब जगह तबाही मचाई इसलिए दोष चीन पर जा रहा है।

–    अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि चीन ने जानबूझ कर वायरस बाकी दुनिया में फैलने दिया, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

–    आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा है कि कोरोना वायरस के प्रसार की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। विदेश मंत्री मरिसे पाइने ने इस बारे में अमेरिका, जर्मनी औरफ्रां स के नेताओं से बात भी की है।

–    ब्राज़ील के शिक्षा मंत्री ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी और चीन की वैश्विक कब्जेदारी की योजना के बीच संबंध है।

–    यूरोपीय यूनियन ने कहा कि इस बात के सबूत हैं कि चीन कोरोना वायरस महामारी के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए पूरा प्रयास कर रहा है। अब वह यह भी दिखाने में लगा है कि उसने बाकी दुनिया की बहुत मदद की है।

–    जर्मनी के गृह मंत्रालय ने कहा है कि चीनी राजनयिक जर्मनी के सरकारी अधिकारियों से मिल कर उनसे चीन के बारे में पॉज़िटिव बयान देने को कह रहे हैं। जर्मनी ने साफ कहा कि ‘संघीय सरकार ऐसे किसी आग्रह को नहीं मानेगी।‘

–    ब्रिटेन के मंत्री माइकल गोव ने कहा है चीन ने कोरोना वायरस के बारे में बहुत सी बातें छिपायी हैं और उसे इस संकट के गुजर जाने के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सवालों और जांच का सामना करना पड़ेगा।

– अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेओ ने कहा है कि भारी सबूत हैं कि कोरोना वायरस चीन की प्रयोगशाला से निकला था।

 

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एटमी युद्ध की भी आशंका

एक ओर दुनिया कोरोना वायरस से जूझ रही है वहीं चीन की सैन्य गतिविधियां लगातार जारी हैं। अमेरिका और चीन के बीच दक्षिण चीन सागर में तनाव बढ़ रहा है। चीन में विशेषज्ञ अब परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाने की राय दे रहे हैं जिससे आशंका जताई जाने लगी है कि क्या दुनिया में भीषण परमाणु युद्ध होने वाला है। कोरोना काल में दक्षिण चीन सागर में दबदबे की लड़ाई के बीच इस क्षेत्र में चीन और अमेरिका घातक हथियारों का जखीरा इकट्ठा कर रहे हैं और चीन ने अमेरिका के परमाणु ताकत के मुकाबले की तैयारी शुरू कर दी है। इस आशंका के पीछे है चीन की ताकत बढ़ाने की सनक, अपनी सीमाओं के विस्तार की चाहत और दुनिया में दबदबा बनाने की हसरत. इसी वजह से कोरोना काल में भी चीन को एटम बमो के जखीरे को बढ़ाने की सनक सवार हो रही है। बताया जा रहा है कि चीन अपने एटमी हथियार भंडार में तीन गुना बढ़ोतरी करने का मंसूबा बना रहा है ताकि वो अमेरिका को और कड़ी टक्कर दे सके। दरअसल, चीन के निशाने पर सीधे-सीधे अमेरिका है। चीन अमेरिका को दुनिया के सुपरपावर के तख्त से हटा कर खुद वहां बैठना चाहता है। इसके लिए चीन न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामरिक मोर्चे पर भी चक्रव्यूह तैयार कर रहा है। चीन ने अपने न्यूक्लियर हथियारों में 300 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी का इरादा जता कर साफ कर दिया है कि वो अमेरिका को अपने लिए सबसे बड़ी चुनौती मानता है। चीन ने दक्षिण चीन सागर के विवादित द्वीपों पर अपनी संप्रभुता का दावा ठोंक दिया है, और अपने नौसैनिक जहाज लगा दिये हैं। दक्षिण चीन सागर के अलावा चीन ने युद्धक विमानों की उड़ानों और नौसेना के जरिए ताइवान को धमकाया है।

अमेरिका का निशाना

अमेरिका के इतिहास को छोड़ कर अगर सिर्फ 20वीं और 21वीं सदी की बात करें तो भी उसके निशाने पर दसियों देश रहे हैं। सीआईए की सीक्रेट कार्रवाई हो या अमेरिकी सरकार की ऐलानिया जंग, बहुत से देशों में सरकारें पलट दी गईं, भौगोलिक स्थिति बदल गई और तमाम देश बर्बाद हो गए। अगर सिर्फ सत्ता परिवर्तन की बात करें तो दुनिया भर में दोस्ताना सरकारें स्थापित की हैं।

पिछले 25 साल की बात करें तो इन देशों को अमेरिका ने बदल डाला है :

–    2000 : यूगोस्ल्विया की स्लोबोदान मिलोसेविक सरकार को उखाड़ फेंका।

–    2003 : इराक पर अमेरिका का पूर्ण सैन्य हमला, सद्दाम हुसैन को मार कर दोस्ताना सत्ता स्थापित की। इस युद्ध में अब तक 3 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और देश पूरी तरह तबाह हो चुका है।

–    2006 से अब तक सीरिया सैन्य संघर्ष झेल रहा है। लाखों लोग बेघर हो गए हैं और बेहिसाब मौतें हुईं हैं। अमेरिका ने सीरिया के राष्ट्रपति अल असद के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई में करोड़ों डालर खर्च किए हैं। आज सीरिया भी पूरी तरह बर्बाद है।

–    2007 : ईरान से बदला लेने के लिए अमेरिका ने ऐसे कदम और प्रतिबंधों का जाल बिछा दिया है कि ईरान बुरी तरह फंस चुका है। आर्थिक प्रतिबंधों के कारण ईरान भी बर्बाद हो गया है।

–    2009 : होण्डुरास में सत्ता परिवर्तन में कराया। ओबामा और क्लिंटन दोनों राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में अमेरिका के पड़ोसी देशों में व्यापक हस्तक्षेप कराये गए।

–    2011 : लीबिया में तानाशाह मुअम्मर गद्दाफ़ी की सत्ता के खिलाफ अमेरिका ने सैन्य कारवाई की और अंततः गद्दाफ़ी को मार डाला गया। ये देश भी पूरी तरह बर्बाद हो गया।

–    2015 से यमन में संघर्ष जारी है। यमन में सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई चल रही है जिसमें अमेरिका का पूरा साथ मिला हुआ है। गृह युद्ध से यमन बर्बाद हो चुका है।

–    2019 से वेनेजुएला में हालात बाद से बदतर होते गए हैं। अमेरिका की गुप्त कार्रवाई के चलते देश में पूरी तरफ अफरातफरी है और कभी समृद्ध देश अब कंगाल हो चुका है। सिर्फ इसलिए कि अमेरिका को वहाँ की सरकार और राष्ट्रपति पसंद नहीं हैं।

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