तुर्की का डरावना पैंतरा, कमजोर हुए खाड़ी के देश

तुर्की का डरावना पैंतरा, कमजोर हुए खाड़ी के देश

दमिश्क: कुर्द बहुल उत्तर पूर्वी सीरिया में तुर्की ने हमला बोल कर कई संदेश दिये हैं। इस कार्रवाई का एक नतीजा तो स्पष्टï है – पहले से ही त्रस्त सीरिया में तुर्की ने आग में पेट्रोल डाल दिया है। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि अगर कुर्द सेनाओं पर हमले हुए तो तुर्की की आर्थिक बर्बादी तय है लेकिन अमेरिका की इस चेतावनी का क्या वाकई में कोई महत्व होगा इस पर संदेह है।
थ्योरी में तुर्की के हमले से इराक से सटी सीरिया सीमा पर ३० किमी चौड़ा व ४८० किमी लंबा सेफ जोन बनेगा। ये वही इलाका है जहां सीरिया के अधिकांश कुर्द रहते हैं। तुर्क सेना कुर्द लड़ाकों को दक्षिण की ओर धकेलेगी जिससे तुर्की के ऊपर का खतरा खत्म हो जायेगा। तुर्की का कहना है कि ये सेफ जोन बनने के बाद वह इस इलाके में २० लाख सीरियायी शरणार्थियों के लिये मकान, अस्पताल, स्कूल और पुनर्वास केंद्र बनाएगा। ताजा कार्रवाई के कारण तुर्की के खिलाफ ब्रिटेन, अमेरिका, इटली, इजरायल, जापान, आस्ट्रेलिया, मिस्र, सउदी अरब, यूएई, ईरान, जर्मनी, नीदरलैंड, नार्वे और फिनलैंड खड़े हो गये हैं। तुर्की के मुस्लिम दोस्त देश भी उसके खिलाफ बोल रहे हैं।

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शक्ति संतुलन बदला
तुर्की के हमले ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिससे पूरे मध्यपूर्व में शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है। तुर्की की सीमा से लगे सीरियाई शहरों पर तुर्की के लड़ाकू विमानों के हमलों के कारण हजारों लोग भाग रहे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तय्यप एर्दोवान का कहना है कि वे तुर्की के दक्षिण में कुर्दों के इलाके से आतंकवादी गलियारे को खत्म कर देना चाहते हैं और वहां शांति स्थापित करना चाहते हैं। लेकिन इसमें कामयाबी संदेहास्पद है। तुर्की की सैनिक कार्रवाई का असर पूरे पश्चिम एशिया में स्थिरता के अलावा क्षेत्रीय और स्थानीय राजनीतिक स्थिति पर भी होगा। विश्लेषकों का कहना है कि सैनिक कार्रवाई का नतीजा तकलीफ और बर्बादी होगा। सीरिया संकट और जटिल हो जाएगा और सीरिया में राजनीतिक समाधान ढूंढना शायद ही संभव रह जाएगा। तुर्की की सैनिक कार्रवाई के असर का अंदाजा लगाना कठिन है। इसमें सिर्फ कुर्दों का नुकसान नहीं होगा। ये आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में मिली कामयाबी को भी नुकसान पहुंचा सकता है। कुर्द इलाकों में कैद आतंकवादी संगठन आईएस के लड़ाके अफरातफरी का फायदा उठाकर भाग सकते हैं और पूरे इलाके में छुप सकते हैं। सीरिया पर हमला तुर्की को भी नुकसान पहुंचाएगा क्योंकि सरकार लोगों पर कुर्दों के खिलाफ एक अंतहीन युद्ध थोप रही है। अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित कुर्द लड़ाकों और तुर्की की लड़ाई लंबे समय तक चल सकती है।

जहां सब डरे वहां तुर्की ने हाथ डाला
तुर्की के राष्ट्रपति आर्दोवान का कहना है कि सीरिया में २०११ में जब गृह युद्ध शुरू हुआ तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान तुर्की को झेलना पड़ा। सीरिया से ३६ लाख शरणार्थी तुर्की में आ गए। तुर्की को ४० अरब डालर से ज्यादा इन शरणार्थियों की देख रेख में खर्च करना पड़ा। अब ये संकट चरम पर पहुंच चुका है। अगर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहयोग नहीं मिला तो हम शरणार्थियों को पश्चिमी देशों की ओर जाने से रोक नहीं पाएंगे। हमारी इन चेतावनियों का कोई असर तक नहीं पड़ा सो हमारे पर सीरिया में प्रवेश करने के अलावा कोई और चारा नहीं था।
ईरान और तुर्की के संबंध भविष्य में जैसे भी विकसित हों, सीरिया में असद शासन के खिलाफ जिहादियों को समर्थन देने वाले संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों को नुकसान झेलना होगा। उनका प्रभाव अब सैनिक कार्रवाई करने वाले तुर्की जैसा नहीं रह गया है। ऐसा इसलिए भी है कि खाड़ी के सल्तनतों का साथी अमेरिका पूरी तरह से न भी सही, लेकिन व्यापक रूप से उत्तरी सीरिया से वापस हट गया है। इसकी वजह साफ है। अब अमेरिका खाड़ी के तेल पर निर्भर नहीं है। इस बीच वह खुद ज्यादा खनिज तेल का उत्पादन कर रहा है। इसके अलावा अमेरिका को अब ताकतवर होते जाते चीन पर ज्यादा ध्यान देना पड़ रहा है। इसके अलावा होरमुस कांड और सऊदी अरब के तेल कारखानों पर हुए ड्रोन हमलों के दौरान अमेरिका ने भी पाया कि उसके सुरक्षा हथियार उतने अच्छे नहीं हैं जितना समझा जाता है। ट्रंप के इरादे साफ हैं, वे अपने साथियों को हथियार बेचना चाहते हैं, उनकी रक्षा नहीं करना चाहते।