NPA: क्या होता है एनपीए, कर्ज के एनपीए होने के बाद क्या करता है बैंक, जानें सब कुछ

NPA: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के मुताबिक, अगर किसी बैंक लोन की किस्त या लोन 90 दिनों तक यानी तीन महीने तक नहीं चुकाया जाता है तो उसे नॉन परफॉर्मिंग एसेट मान लिया जाता है।

Written By :  Krishna Chaudhary
Update: 2022-07-07 06:34 GMT

NPA| (Social Media)

Non Performing Assets: अगर बिजनेस और बैंक से जुड़ी खबरें पढ़ते होंगे तो मुमकिन है कि आपके सामने एनपीए (NPA) का जिक्र जरूर आया होगा। देश में बैंकों की खराब सेहत के पीछे एनपीए (NPA) का लगातार बढ़ते जाना एक प्रमुख कारण है। बैंक (Bank) लगातार एनपीए के बोझ के तले दबते जा रहे हैं। केंद्र सरकार का सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न बैंकों का आपस मर्जर कराने का निर्णय इसी आर्थिक बोझ से जुड़ा है। ऐसे में आप समझ ही गए होंगे कि एनपीए बैंकिंग सिस्टम में कितना बड़ी भूमिका निभाता है। तो आइए समझते हैं कि आखिर एनपीए होता क्या है और बैंक एनपीए होने के बाद क्या करते हैं ?

क्या होता है एनपीए

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के मुताबिक, अगर किसी बैंक लोन (Bank Loan) की किस्त या लोन 90 दिनों तक यानी तीन महीने तक नहीं चुकाया जाता है तो उसे नॉन परफॉर्मिंग एसेट (NPA) मान लिया जाता है। आम बोलचाल की भाषा में कहें तो यह वो संपत्ति है, जिससे बैंक को कोई आमदनी नहीं होती है। यदि किसी लोन की ईएमआई लगातार तीन महीने तक न जमा किया जाए, तो बैंक उसे एनपीए घोषित कर देते हैं। इसका मतलब ये हुआ है कि बैंक इसे फंसा हुआ कर्ज मान लेते हैं। अन्य वित्तीय संस्थाओं में एनपीए घोषित करने की समयसीमा 120 दिनों की होती है। वहीं विदेशों में यह समय सीमा 45-90 के बीच है।

एनपीए होने के बाद बैंक क्या करते हैं ?

जितना लोन एनपीए होता है उतना बैंक को अपने बही खाते में प्रोविजनिंग करनी पड़ती है यानी उतनी राशि को फंसा हुआ कर्ज मानते हुए एक किनारे पर रखनी पड़ती है। जब कई साल तक यह लोन नहीं मिलता है तो बैंक उसे राइट-ऑफ कर देता है यानी बट्टे खाते में डाल देता है। इसकी 10 प्रतिशत प्रोविजनिंग कर दी जाती है। तब इसे बैंक के बहीखाते में पुरी तरह से नुकसान के रूप में दर्ज कर लिया जाता है। इसका मतलब ये हुआ कि जितना कर्ज राइट-ऑफ हुआ उतना मुनाफे में से घटा लिया गया। इससे बैंकों का प्रॉफिट गिरता है। यही वजह है कि जब नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे बड़े डिफॉल्टर्स का कर्ज राइट-ऑफ किया जाता है तो बैंकों को उस साल भारी घाटा सहना पड़ता है।

बैंकों के इस राइट ऑफ पर इस साल जनवरी में रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कर्मिशयल बैंकों ने बीते 5 सालों में 9.54 लाख करोड़ रूपये का बेड लोन बट्टे खाते में डाला है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सबसे आगे रहे हैं। 9.54 लाख करोड़ रूपये में से 7 लाख करोड़ रूपये से अधिक का अमाउंट सरकारी बैंकों द्वारा बट्टे खाते में डाली गई।

एनपीए से सिबिल रेटिंग होती है खराब

यदि किसी कर्जधारक के लोन को एनपीए घोषित कर दिया जाए, तो उसकी सिबिल रेंटिंग खराब हो जाती है। सिबिल रेंटिंग खराब होना काफी नुकसानदेह है क्योंकि ऐसे ग्राहकों को फिर बैंक आगे कर्ज देने में बहुत हिचकिचाते हैं। उन्हें कर्ज लेने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। आजकल तो लोन की ब्याज दरें भी सिबिल रेंटिंग से जुड़ गई है, कर्ज लेने वाले की अच्छी सिबिल रेटिंग हुई तो बैंक आपसे कम ब्याज लेंगे अगर रेटिंग खराब हुई तो अधिक ब्याज लेंगे।

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