Bengal LoP Row: LoP नियुक्ति पर HC की तीखी टिप्पणी, स्पीकर के अधिकारों पर बड़ा सवाल

Bengal LoP Row: पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विवाद पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। टीएमसी विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय की याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पीकर के फैसले पर कई सवाल उठाए और निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने को लेकर जवाब मांगा।

Update:2026-06-17 22:15 IST

Bengal LoP Row: पश्चिम बंगाल विधानसभा (West Bengal Assembly) में विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) को लेकर चल रहे विवाद पर कलकत्ता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) ने बुधवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति कृष्णा राव (Justice Krishna Rao) की एकल पीठ ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय (Shobhandeb Chattopadhyay) की याचिका पर सुनवाई करते हुए विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र नाथ बोस (Rathindra Nath Bose) के 3 जून के फैसले पर कई अहम सवाल उठाए।

याचिका में अध्यक्ष के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें टीएमसी से निष्कासित विधायक ऋतब्रता बनर्जी (Ritabrata Banerjee) को विपक्ष का नेता मान्यता दी गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस फैसले के कानूनी आधार को लेकर विस्तार से सवाल किए।

विपक्ष का नेता बनाने पर अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने बार-बार यह सवाल उठाया कि जब तृणमूल कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष के नेता पद के लिए नामित किया था, तो फिर पार्टी से निष्कासित सदस्य को इस पद पर कैसे नियुक्त किया जा सकता है।

अदालत ने यह जानने की कोशिश की कि क्या किसी राजनीतिक दल के अधिकृत निर्णय को इस तरह दरकिनार किया जा सकता है। इस दौरान प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता (Additional Advocate General) बिलवादल भट्टाचार्य (Bilwadal Bhattacharya) ने विधानसभा अध्यक्ष का पक्ष रखा, जबकि टीएमसी के लोकसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी (Kalyan Banerjee) ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय की ओर से दलीलें पेश कीं।

कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?

मामले की शुरुआत 4 मई को हुए विधानसभा चुनाव (Assembly Election) के बाद हुई। चुनाव में भाजपा (BJP) ने 207 सीटें जीतकर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का दर्जा हासिल किया, जबकि टीएमसी को 80 सीटें मिलीं।

इसके बाद 1 जून को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) की शिकायत पर सीआईडी (CID) ने हस्ताक्षर जालसाजी (Signature Forgery) की जांच शुरू की। जांच शुरू होने के बाद ऋतब्रता बनर्जी और संदीपान साहा (Sandipan Saha) को टीएमसी से निष्कासित कर दिया गया।

दोनों निष्कासित विधायकों ने आरोप लगाया कि 19 मई को शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने वाले प्रस्ताव पर कई हस्ताक्षर जाली थे। इस मामले में टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) मुख्य आरोपी बन गए।

स्पीकर के फैसले से बढ़ा विवाद

विवाद के बीच 3 जून को विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र नाथ बोस ने 294 सदस्यीय सदन में टीएमसी के 58 बागी विधायकों को प्रमुख विपक्षी दल मानते हुए ऋतब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त कर दिया।

अध्यक्ष के इसी फैसले को चुनौती देते हुए शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना है कि पार्टी के अधिकृत फैसले को नजरअंदाज कर विपक्ष के नेता की नियुक्ति की गई है।

अदालत ने जालसाजी के आरोपों पर भी उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि क्या हस्ताक्षर जालसाजी का आरोप विधानसभा अध्यक्ष को टीएमसी के आधिकारिक प्रस्ताव को अनदेखा करने का अधिकार देता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जालसाजी का आरोप अभी तक अदालत में साबित नहीं हुआ है।

अदालत ने अतिरिक्त महाधिवक्ता के उस तर्क पर भी सवाल उठाए, जिसमें कहा गया था कि ऋतब्रता बनर्जी का निष्कासन टीएमसी का आंतरिक मामला है। न्यायालय ने इस पहलू पर भी विस्तार से चर्चा की।

कल्याण बनर्जी ने रखा टीएमसी का पक्ष

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालत में दलील दी कि विधानसभा अध्यक्ष किसी राजनीतिक दल के आधिकारिक निर्णय को नजरअंदाज नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि विधायक किसी राजनीतिक दल का हिस्सा होते हैं और दल के फैसले को मान्यता देना आवश्यक है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी राजनीतिक दल ने अपने अधिकृत प्रतिनिधि को विपक्ष का नेता नामित कर दिया है, तो स्पीकर उस निर्णय को कैसे अनदेखा कर सकते हैं। अब इस पूरे मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिस पर राजनीतिक हलकों की नजरें टिकी हुई हैं।

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