कुर्सी छोड़ी, कंट्रोल नहीं…नीतीश के ‘श्रवण दांव’ से बिहार में बड़ा सियासी खेल!
Shravan Kumar JDU Legislature Leader: नीतीश कुमार भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ चुके हों, लेकिन बिहार की राजनीति से उनकी पकड़ ढीली पड़े, ऐसा वो बिल्कुल नहीं चाहते। यही वजह है कि उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद साथी श्रवण कुमार को जेडीयू विधायक दल का नेता बनाकर एक बड़ा और सोचा-समझा दांव चला है।
Shravan Kumar JDU Legislature Leader: नीतीश कुमार भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ चुके हों, लेकिन बिहार की राजनीति से उनकी पकड़ ढीली पड़े, ऐसा वो बिल्कुल नहीं चाहते। यही वजह है कि उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद साथी श्रवण कुमार को जेडीयू विधायक दल का नेता बनाकर एक बड़ा और सोचा-समझा दांव चला है। इस फैसले के जरिए नीतीश कुमार ने साफ संकेत दिया है कि भले ही वे अब सीधे सत्ता में न हों, लेकिन फैसलों पर उनकी पकड़ पहले जैसी ही बनी रहेगी।
राज्यसभा जाने के फैसले के बाद जब बीजेपी के सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने और जेडीयू कोटे से विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र यादव को डिप्टी सीएम बनाया गया, तब यह सवाल उठने लगा था कि अब पार्टी के अंदर नीतीश की पकड़ कैसी रहेगी। जिसके बाद इसी सियासी सवाल का जवाब श्रवण कुमार की नियुक्ति में छिपा नजर आ रहा है। तो कैसे सीएम न रहते हुए भी नीतीश कुमार बिहार की सत्ता में परोक्ष रूप से काबिज हैं। आइए इसकी पड़ताल करते हैं।
कौन हैं जेडीयू में नंबर-2 श्रवण कुमार
दरअसल पार्टी ने नए संकट मोचन कहे जा रहे श्रवण कुमार बिहार की राजनीति का एक जाना-पहचाना चेहरा हैं और जेडीयू के उन पुराने नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने पार्टी के साथ हर दौर में मजबूती से खड़े रहकर काम किया है। उनकी राजनीतिक यात्रा कोई आज की नहीं, बल्कि करीब पांच दशक पुरानी है।
श्रवण कुमार ने साल 1974 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले जेपी आंदोलन से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। इसी आंदोलन में नीतीश कुमार भी सक्रिय थे और यहीं से दोनों के बीच राजनीतिक रिश्ता मजबूत होता चला गया। जिसके बाद यह रिश्ता आज भी उतना ही मजबूत बना हुआ है, जितना शुरुआत में था।
श्रवण कुमार को नीतीश कुमार का सबसे करीबी और भरोसेमंद नेता माना जाता है। वह साल 1995 से नालंदा विधानसभा सीट से लगातार विधायक हैं, जो उनकी जमीनी पकड़ को साफ तौर पर दिखाता है। उन्होंने ग्रामीण विकास और संसदीय कार्य जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी भी संभाली है और पार्टी संगठन को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई है।
समता पार्टी के दौर से ही वह नीतीश कुमार के साथ जुड़े रहे हैं और हर राजनीतिक उतार-चढ़ाव में उनके साथ खड़े नजर आए हैं। यही वजह है कि पार्टी के अंदर उनकी पहचान एक चट्टानी समर्थक के रूप में बनी हुई है।
कुर्मी वोटबैंक को साधने की सियासी चाल
दरअसल नीतीश कुमार का यह फैसला सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी है। नीतीश खुद कुर्मी समाज से आते हैं, जो जेडीयू का कोर वोटबैंक माना जाता है। इसी समाज के सहारे उन्होंने लंबे समय तक सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखी है।
जिसके बाद अब जब डिप्टी सीएम पद पर एक यादव और एक भूमिहार नेता को जगह दी गई है, तो कुर्मी समाज को साधे रखना नीतीश के लिए जरूरी हो गया है। ऐसे में श्रवण कुमार को आगे लाकर उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि कुर्मी समाज की हिस्सेदारी और अहमियत पार्टी में बरकरार है।
श्रवण कुमार भी नालंदा जिले से आते हैं, जो नीतीश कुमार का गृह जनपद है और वह उनकी जाति से भी ताल्लुक रखते हैं। इस तरह यह फैसला राजनीतिक के साथ-साथ सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश भी माना जा रहा है।
नीतीश से हो गए थे नाराज
श्रवण कुमार का राजनीतिक सफर हमेशा सीधा नहीं रहा, इसमें उतार-चढ़ाव भी आए हैं। साल 2005 में जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली थी और वह जेडीयू के मुख्य सचेतक बने रहे।
इसके बाद साल 2014 में जब जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने, तब भी शुरुआत में उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। इस बात से नाराज होकर उन्होंने सरकारी वाहन तक लौटा दिया था, जिससे उनकी नाराजगी खुलकर सामने आई थी।
हालांकि बाद में जब मांझी ने मंत्रिमंडल का विस्तार किया, तब उन्हें मंत्री बनाया गया और ग्रामीण कार्य, ग्रामीण विकास व संसदीय कार्य जैसे विभागों की जिम्मेदारी सौंपी गई। मंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने काम से ऐसा प्रभाव छोड़ा कि अपने विभाग का पूरा बजट खर्च कर दिया, जो उनकी कार्यशैली को दिखाता है।
यही वजह है कि समय के साथ नीतीश कुमार का भरोसा उन पर और मजबूत होता गया और अब उन्हें जेडीयू विधायक दल का नेता बनाकर एक बार फिर पार्टी में अहम जिम्मेदारी दी गई है।
नियंत्रण अब भी नीतीश के पास
अब अगर सियासी नजरिए से देखा जाए तो श्रवण कुमार की नियुक्ति को सिर्फ एक संगठनात्मक बदलाव मानना गलती होगी। यह दरअसल नीतीश कुमार का वह सियासी दांव है, जिसके जरिए वह यह दिखाना चाहते हैं कि भले ही पद बदल गया हो, लेकिन नियंत्रण अब भी उनके हाथ में है।
अपने सबसे भरोसेमंद और पुराने साथी को आगे कर उन्होंने न सिर्फ पार्टी के अंदर संतुलन बनाया है, बल्कि अपने कोर वोटबैंक को भी साधने की कोशिश की है। आने वाले समय में यह फैसला बिहार की राजनीति में कितना असर डालता है, यह देखना दिलचस्प होगा, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि नीतीश कुमार अभी भी इस खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी बने हुए हैं।
क्या बनेंगे संगठन-सरकार के बीच की मजबूत कड़ी?
आने वाले समय में श्रवण कुमार की भूमिका सिर्फ जेडीयू विधायक दल के नेता तक सीमित नहीं रहने वाली दिखती, बल्कि वे पार्टी और सरकार के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में उभर सकते हैं। जिस तरह से नीतीश कुमार ने उन्हें आगे बढ़ाया है, उससे यह साफ संकेत मिलता है कि वे संगठन की पकड़ बनाए रखने के साथ-साथ सत्ता के फैसलों पर भी नजर रखने की जिम्मेदारी निभा सकते हैं।
मौजूदा हालात में जब मुख्यमंत्री बीजेपी से हैं और जेडीयू गठबंधन का हिस्सा है, ऐसे में श्रवण कुमार की भूमिका और अहम हो जाती है। वे एक ऐसे चेहरे के तौर पर सामने आ सकते हैं, जो पार्टी के विधायकों की आवाज सरकार तक पहुंचाएं और साथ ही सरकार के फैसलों को संगठन के भीतर संतुलित तरीके से प्रस्तुत करें।
उनकी पुरानी राजनीतिक समझ, जमीनी पकड़ और नीतीश कुमार से नजदीकी उन्हें इस भूमिका के लिए मजबूत बनाती है। आने वाले दिनों में वे जेडीयू के अंदर अनुशासन बनाए रखने, विधायकों को एकजुट रखने और गठबंधन की राजनीति में संतुलन साधने वाले प्रमुख चेहरे के रूप में नजर आ सकते हैं, जो सीधे तौर पर नीतीश कुमार की रणनीति को जमीन पर उतारने का काम करेंगे।