जनसुराज की हार पर PK का छलका 'दर्द'! ले ली हार की जिम्मेदारी... फिर बोले लड़ाई अभी बाकी है...

Prashant Kishor Bihar: बिहार चुनाव में करारी हार के बाद प्रशांत किशोर पहली बार मीडिया के सामने आए और हार की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली।

Update:2025-11-18 12:40 IST

Prashant Kishor Bihar: जनसुराज अभियान चलाने वाले प्रशांत किशोर ने बिहार में चुनाव परिणामों के बाद पहली बार मीडिया के सामने आकर जो कहा, उसने पूरे राजनीतिक माहौल को शांत कर दिया और साथ ही एक नया सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या बिहार बदलाव के लिए अभी तैयार ही नहीं था?

चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद प्रशांत किशोर ने हार की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। इस दौरान उनका चेहरा साफ बता रहा था कि वे अंदर से कितने भारी मन से यह स्वीकार कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “हमने ईमानदार कोशिश की, लेकिन यह पूरी तरह असफल रहा। इसे स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है।”

उन्होंने यह भी बताया कि जनसुराज के खाते में सिर्फ साढ़े तीन फीसदी वोट आए, लेकिन प्रेस वार्ता में जुटी भारी भीड़ ने उन्हें यह यकीन दिलाया कि उनका काम पूरी तरह व्यर्थ भी नहीं था। उन्होंने माना कि कोशिश सही थी, मगर जनता का भरोसा जीतने में वे चूक गए।

नहीं मिला जनादेश

प्रशांत किशोर ने याद किया कि तीन साल पहले वे बिहार में सिर्फ चुनाव लड़ने नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन का सपना लेकर निकले थे। लेकिन चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया कि न सिर्फ व्यवस्था बदलने की चाह अधूरी रह गई, बल्कि सत्ता परिवर्तन भी नहीं हो सका। उनके शब्दों में झलकता था दर्द, लेकिन साथ ही अद्भुत साफगोई “व्यवस्था परिवर्तन की बात तो छोड़िए, हम सत्ता परिवर्तन भी नहीं कर पाए। गलती हमारी रही… जनता ने हमें क्यों नहीं चुना, इसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी।” उन्होंने किसी पर आरोप लगाए बिना बेहद साफ कहा कि गलती जनता की नहीं, उनकी टीम की रही है। उन्होंने आगे कहा कि हमारी सोच में, हमारी रणनीति में कुछ कमी रही होगी, तभी जनता ने हमें नहीं चुना। प्रशांत किशोर ने कहा कि वे अपने साथियों को जीत नहीं दिला सके, जनता का विश्वास नहीं जगा सके। और यह उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है।

हिम्मत नहीं हारे प्रशांत किशोर

हार स्वीकारने के साथ-साथ उनके शब्दों ने यह भी बताया कि लड़ाई खत्म नहीं हुई है। जनसुराज का अभियान शायद चोटिल हुआ है, लेकिन टूटा नहीं। बिहार की राजनीति में बदलाव की चाह अभी जिंदा है बस उसे दिशा देने वाले कदमों को शायद नए सिरे से उठाने की जरूरत है। प्रशांत किशोर की विनम्रता और साफगोई ने यह जरूर साबित कर दिया कि राजनीति में हार स्वीकारना भी एक बड़ी जीत होती है।

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