राज्यपाल की पसंद-नापसंद तय करेगी सरकार? जब येदियुरप्पा को नहीं रोका, तो विजय का रास्ता क्यों काटा जा रहा है?
Yediyurappa Vs Vijay government formation: तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर बड़ा सियासी विवाद! जब येदियुरप्पा को बिना बहुमत शपथ दिलाई गई थी, तो अब विजय से 118 विधायकों के समर्थन का सबूत क्यों मांगा जा रहा है? जानिए राज्यपाल बनाम ‘थलापति’ की पूरी कहानी।
Yediyurappa Vs Vijay government formation: तमिलनाडु की राजनीति इस वक्त किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म के क्लाइमेक्स जैसी हो गई है। सिनेमाई पर्दे पर एक साथ सैकड़ों दुश्मनों को धूल चटाने वाले 'थलापति' विजय जब राजनीति के असली मैदान में उतरे, तो उनकी राह में एक ऐसा 'संवैधानिक स्पीड ब्रेकर' आया, जिसकी कल्पना शायद उन्होंने नहीं की थी। 2026 के विधानसभा चुनाव में 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) के मुखिया विजय जब कांग्रेस के समर्थन के साथ सरकार बनाने का दावा पेश करने लोक भवन पहुंचे, तो राजभवन के दरवाजे उनके लिए पूरी तरह नहीं खुले। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उन्हें तुरंत शपथ दिलाने से इनकार करते हुए एक ऐसी शर्त रख दी, जिसने पूरे देश में 'राज्यपाल की निष्पक्षता' पर बहस छेड़ दी है।
शपथ से पहले 'नंबर गेम': राज्यपाल की वो सख्त शर्त
जब विजय अपने समर्थकों और कांग्रेस के साथ राज्यपाल से मिलने पहुंचे, तो उन्हें उम्मीद थी कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते उन्हें सरकार बनाने का न्योता मिलेगा। लेकिन राज्यपाल ने साफ कह दिया "पहले 118 विधायकों के समर्थन वाला हस्ताक्षर पत्र लेकर आइए, उसके बाद ही शपथ की बात होगी।" वर्तमान में विजय के पास अपनी 107 सीटें (एक सीट छोड़ने के बाद) और कांग्रेस के 5 विधायकों को मिलाकर कुल 112 का आंकड़ा है, जो बहुमत के जादुई आंकड़े 118 से महज 6 दूर है। राजभवन की इस 'फिजिकल गारंटी' वाली शर्त ने विजय के विजय रथ को फिलहाल रोक दिया है।
कर्नाटक 2018: जब येदियुरप्पा को मिली थी 'शाही छूट'
अब सवाल यह उठता है कि क्या नियम सबके लिए एक जैसे होते हैं? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें मई 2018 के कर्नाटक चुनाव की यादें ताजा करनी होंगी। उस वक्त 224 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन बहुमत (112) से दूर थी। दूसरी तरफ, कांग्रेस (80) और जेडीएस (37) ने गठबंधन कर लिया था, जिनके पास 117 का स्पष्ट बहुमत था। लेकिन तत्कालीन राज्यपाल वजुभाई वाला ने बहुमत वाले गठबंधन को बुलाने के बजाय भाजपा के बी.एस. येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। उस समय येदियुरप्पा से शपथ से पहले 112 विधायकों की सूची नहीं मांगी गई, बल्कि उन्हें सदन में बहुमत साबित करने के लिए समय दिया गया। यह 'दोहरा पैमाना' आज विजय के मामले में चुभ रहा है।
'राजभवन टेस्ट' बनाम 'फ्लोर टेस्ट': SC का वो ऐतिहासिक फैसला
भारतीय संविधान और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के मुताबिक, सरकार का बहुमत राजभवन की बंद फाइलों में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल (Floor of the House) पर साबित होना चाहिए। 1994 का ऐतिहासिक 'एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ' मामला इसी बात की गवाही देता है। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने साफ कहा था कि बहुमत का फैसला विधानसभा में ही होना चाहिए। लेकिन तमिलनाडु के मामले में ऐसा लग रहा है मानो राज्यपाल फ्लोर टेस्ट से पहले ही 'राजभवन टेस्ट' लेना चाहते हैं। येदियुरप्पा को मौका देकर जोखिम उठाने वाला राजभवन, विजय के मामले में इतना 'सुरक्षित' खेल क्यों खेल रहा है?
अनुच्छेद 164 और राज्यपाल का विशेषाधिकार
संविधान का अनुच्छेद 164 राज्यपाल को मुख्यमंत्री नियुक्त करने की शक्ति देता है। परंपरा यह रही है कि सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को मौका दिया जाए और फिर उन्हें बहुमत साबित करने के लिए एक निश्चित समय मिले। लेकिन 'राज्यपाल की संतुष्टि' का पैमाना अक्सर राजनीति की भेंट चढ़ जाता है। येदियुरप्पा के मामले में राज्यपाल ने उन्हें समय देकर भाजपा को मौका दिया, लेकिन विजय के मामले में नियमों की सख्ती अचानक बढ़ा दी गई। कांग्रेस और टीवीके इसे जनादेश का अपमान बता रही हैं, जबकि राजभवन इसे संवैधानिक मर्यादा कह रहा है।
क्या पार होगा जादुई आंकड़ा? विजय के सामने बड़ी चुनौती
तमिलनाडु की विधानसभा में कुल 234 सीटें हैं और बहुमत के लिए 118 का आंकड़ा चाहिए। विजय के पास फिलहाल 112 विधायकों का साथ है। अब सबकी नजरें उन 6 विधायकों पर टिकी हैं जो विजय को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा सकते हैं। क्या वीसीके (VCK) जैसे छोटे दल विजय के साथ आएंगे? अगर विजय 118 विधायकों के हस्ताक्षर जुटा लेते हैं, तो राजभवन को अपना फैसला बदलना होगा। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह मामला लंबी कानूनी लड़ाई में तब्दील हो सकता है।
लोकतंत्र में निष्पक्षता की कसौटी
विजय और येदियुरप्पा के मामलों की तुलना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति भी राजनीतिक पसंद-नापसंद से प्रभावित होते हैं। एक तरफ येदियुरप्पा को बिना बहुमत के शपथ दिला दी गई, तो दूसरी तरफ विजय को बहुमत के बिल्कुल करीब होने के बावजूद 'सबूत' लाने को कहा जा रहा है। तमिलनाडु की यह सियासी जंग अब केवल सरकार बनाने की नहीं, बल्कि संवैधानिक बराबरी की लड़ाई बन गई है। क्या 'थलापति' विजय राजभवन की इस चुनौती को पार कर पाएंगे? इसका फैसला अगले कुछ दिनों में हो जाएगा।