शाह से बंसल तक…यूपी की जमीन ने तैयार किए बीजेपी के सबसे बड़े रणनीतिकार, जिन्होंने जिताया बंगाल

BJP Bengal Victory Strategy: उत्तर प्रदेश को देश की राजनीति का सबसे बड़ा ट्रेनिंग ग्राउंड कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यहां की राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नेताओं को ऐसा राजनीतिक अनुभव देती है जो उन्हें राष्ट्रीय स्तर के बड़े मुकाबलों के लिए तैयार करता है।

Update:2026-05-07 17:23 IST

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BJP Bengal Victory Strategy: उत्तर प्रदेश को देश की राजनीति का सबसे बड़ा ट्रेनिंग ग्राउंड कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यहां की राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नेताओं को ऐसा राजनीतिक अनुभव देती है जो उन्हें राष्ट्रीय स्तर के बड़े मुकाबलों के लिए तैयार करता है। यही वजह है कि यूपी को अब राजनीति की एक यूनिवर्सिटी की तरह देखा जाने लगा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की इसी राजनीतिक ताकत की ओर देश का ध्यान खींच दिया है।

खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की जमीन से ऐसे रणनीतिकार तैयार किए हैं, जिन्होंने देश के कई बड़े चुनावी मुकाबलों में अपनी अहम भूमिका निभाई है। अमित शाह, जेपी नड्डा, धर्मेंद्र प्रधान और सुनील बंसल जैसे बड़े नेताओं को बीजेपी की चुनावी रणनीति का मजबूत चेहरा माना जाता है। बंगाल चुनाव में भी इन नेताओं की भूमिका काफी अहम मानी गई।

यूपी की राजनीति नेताओं को देती है बड़ा अनुभव

केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को बीजेपी ने बंगाल चुनाव का प्रभारी बनाया था। इससे पहले वह साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी अहम जिम्मेदारी निभा चुके थे। उस समय उन्होंने ओम माथुर के नेतृत्व में बीजेपी के चुनाव प्रचार को संभाला था। इससे साफ संकेत मिलता है कि उत्तर प्रदेश आज भी नेताओं को राष्ट्रीय राजनीति के लिए तैयार करने का सबसे बड़ा मंच बना हुआ है।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश की राजनीति कहीं ज्यादा जटिल और सक्रिय मानी जाती है। यहां सामाजिक समीकरण, जातीय संतुलन और चुनावी रणनीति इतनी गहराई से जुड़ी होती है कि नेताओं को हर स्तर पर अपनी राजनीतिक समझ विकसित करनी पड़ती है।

राजनीति और समाज का सबसे मजबूत मेल

बीजेपी नेता सुनील बंसल ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा कि उत्तर प्रदेश में राजनीति और समाज एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने इसकी तुलना गुजरात जैसे राज्यों से की, जहां आमतौर पर राजनीतिक माहौल चुनाव के समय ही ज्यादा सक्रिय दिखाई देता है।

सुनील बंसल फिलहाल बीजेपी के ओडिशा और तेलंगाना के भी प्रभारी हैं। ओडिशा में उन्होंने नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजेडी की दो दशक से ज्यादा पुरानी सत्ता को खत्म कराने में अहम भूमिका निभाई थी। बीजेपी की वहां सरकार बनने के पीछे उनकी रणनीति को काफी प्रभावी माना गया।

यूपी की जमीन पर तैयार होते हैं बड़े रणनीतिकार

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पश्चिम बंगाल के अपेक्षाकृत शहरी और पढ़े-लिखे वोटर हों या फिर बिहार की राजनीतिक उथल-पुथल, उत्तर प्रदेश की राजनीति इन सबसे अलग है। यहां जाति, समुदाय और जमीनी स्तर पर लोगों को जोड़ने की गहरी राजनीति देखने को मिलती है।

यही कारण है कि बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने उत्तर प्रदेश को राजनीति की नर्सरी बताया। यहां नेताओं को सिर्फ भाषण देना नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करना और समाज के हर वर्ग तक पहुंचना भी सीखना पड़ता है।

प्रियंका गांधी के लिए भी यूपी बनी राजनीतिक पाठशाला

उत्तर प्रदेश सिर्फ बीजेपी के नेताओं को ही नहीं, बल्कि दूसरे दलों के नेताओं को भी राजनीतिक अनुभव देने का काम करता है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी अपने सक्रिय राजनीतिक सफर की शुरुआत उत्तर प्रदेश से ही की थी।

साल 2019 में उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके बाद 2020 में पूरे राज्य की कमान उनके हाथों में दे दी गई। खास बात यह भी है कि कई बड़े नेता मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले नहीं हैं, लेकिन उन्होंने इसी राज्य की राजनीति से अपने राजनीतिक कौशल को निखारा।

बंगाल चुनाव में यूपी से भेजे गए थे बीजेपी के ‘रणबांकुरे’

बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश हमेशा से सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला रहा है। यहां तैयार किए गए नेताओं को समय-समय पर देश के अलग-अलग राज्यों में भेजा जाता रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव भी इसका बड़ा उदाहरण बना।

चुनावी अभियान की शुरुआत में ही यूपी बीजेपी के जेपीएस राठौर और सुरेश राणा जैसे नेताओं को बंगाल में अहम जिम्मेदारियां दी गई थीं। जेपीएस राठौर ने मेदिनीपुर क्षेत्र की करीब 35 विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी संभाली थी। वहीं सुरेश राणा को उत्तर 24 परगना की 28 सीटों का प्रभारी बनाया गया था।

बंगाल के चुनावी मैदान में उतरी थी बीजेपी की पूरी फौज

बाद में सांसद महेश शर्मा, सतीश गौतम और रमेश अवस्थी भी इस चुनावी अभियान का हिस्सा बने। इनके अलावा स्वतंत्र देव सिंह, स्वाति सिंह, पीएन पाठक और उपेंद्र तिवारी जैसे वरिष्ठ बीजेपी नेताओं को भी अलग-अलग जिम्मेदारियों के साथ बंगाल भेजा गया था।

बीजेपी ने बंगाल चुनाव को बेहद गंभीरता से लिया था। पूरे देश से करीब 9,500 बीजेपी कार्यकर्ताओं को बंगाल में चुनावी अभियान के लिए तैनात किया गया था। पार्टी ने बूथ स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लगातार काम किया।

युवाओं को जोड़ने के लिए बनाई गई खास रणनीति

बंगाल चुनाव में बीजेपी ने सिर्फ पारंपरिक राजनीति पर भरोसा नहीं किया, बल्कि युवाओं तक पहुंचने के लिए अलग रणनीति भी अपनाई। बंगाल में फुटबॉल की लोकप्रियता को देखते हुए बीजेपी ने ‘नरेंद्र कप’ नाम का टूर्नामेंट आयोजित कराया।

सुनील बंसल के मुताबिक इस प्रतियोगिता में पुरुषों की 1,200 टीमों ने हिस्सा लिया, जिसमें करीब 18 हजार खिलाड़ी शामिल थे। वहीं महिलाओं की 253 टीमें भी इस टूर्नामेंट का हिस्सा बनीं। इन खिलाड़ियों की उम्र 18 से 25 साल के बीच थी। बीजेपी ने इस आयोजन के जरिए युवाओं से सीधा जुड़ाव बनाने की कोशिश की।

चुनाव प्रचार में बीजेपी ने झोंक दी पूरी ताकत

बीजेपी ने बंगाल में जनसंपर्क अभियान को भी बड़े स्तर पर चलाया। पार्टी ने 19 हजार से ज्यादा क्लबों और एनजीओ से संपर्क किया। इसके साथ अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में 600 से ज्यादा कार्यक्रम आयोजित किए गए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में 19 रैलियों और रोड शो को संबोधित किया। वहीं अमित शाह ने करीब 40 रैलियां कीं। बीजेपी शासित राज्यों के नौ मुख्यमंत्रियों ने भी मिलकर 100 से ज्यादा चुनावी सभाओं को संबोधित किया।

इसके अलावा बीजेपी कार्यकर्ताओं ने पूरे राज्य में 6 हजार से ज्यादा धार्मिक और आध्यात्मिक संगठनों से संपर्क साधा। पार्टी ने हर वर्ग तक पहुंचने के लिए अलग-अलग स्तर पर रणनीति बनाई थी।

अब यूपी के चुनाव पर टिकी बीजेपी की नजर

अब बीजेपी की नजर अगले बड़े चुनावी मुकाबले पर है। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है। ऐसे में सबकी निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि बीजेपी अपने अनुभवी नेताओं और रणनीतिकारों को किस तरह मैदान में उतारती है।

बीजेपी के सामने समाजवादी पार्टी की ओर से आगे बढ़ाए जा रहे पीडीए यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक के नैरेटिव की चुनौती भी होगी। ऐसे में माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश एक बार फिर देश की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा का केंद्र बनने जा रहा है।

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